जालिम ख़बरों की पड़ताल, सिमा पर आया भूचाल : मुरली मनोहर तिवारी
मुरली मनोहर तिवारी (सीपू),बीरगंज, 11 अप्रैल 2020।भारतीय मीडिया में जालिम मियां द्वारा कोरोना मरीज को भारत भेजने का साजिशकर्ता के तौर पर बताया गया। जालिम मिया का नाम ऐसा उछला की गूगल में जालिम लिखते ही जालिम मिया का फ़ोटो भर जाता है। ये खबर आते ही दोनो देशों में भूचाल आ गया। भारत मे जालिम मिया को खूंखार आतंकी के रूप में दिखाया गया तो नेपाल में जालिम मिया को निर्दोष बताते हुए भारतीय मीडिया पर हमला करते हुए देखा गया।
इसमे कौन सही, कौन गलत के नतीजे पर नही जाकर, कुछ बातों पर गौर करना आवश्यक है। जहाँ तक भारतीय मीडिया का सवाल है तो ऐसा देखा गया है कि भारतीय मीडिया नेपाल के खबरों को कोई ख़ास अहमियत नही देती। कुछ देशव्यापी खबरों (भूकंप-मोदी भ्रमण) को छोड़कर भारतीय मीडिया कभी नेपाल की खबरे नही दिखाती। यहाँ तक कि नेपाल के प्रधानमंत्री भारत जाते है तो वह खबर भी हैडलाइन में नही आती। अगर भारतीय मीडिया को नेपाल की खराब तस्वीर ही पेश करनी होती तो अन्य बहुत खबरे है जैसे कोरोना महामारी के समय भ्रष्टाचार, चीन से सामान आना वगैरह वगैरह। फिर सवाल उठता है कि जालिम मिया की ख़बर क्यो आई ?
कुछ लोग कह रहे है, भारत या नेपाल में सामाजिक-सद्भाव बिगाड़ने के लिए। अगर ऐसा होता हो रक्सौल के कवारेंटाइन से लेकर दिल्ली तक के कवारेंटाइन में इलाजरत किसी नेपाली के नाम से कोई सनसनीखेज खबरे बन सकती थी, फिर पर्सा के दुर्गम क्षेत्र से जालिम मिया का नाम क्यो आया ?
जालिम मियां का नाम आने का एक कारण हो सकता है उनकी पूर्व की आपराधिक पृष्ठभूमि। सबसे अच्छी बात है कि जालिम मिया भूमिगत होने के बजाए, इन खबरों का सामना किया, उसका खंडन किया और हर तरह के जांच में सहयोग करने को कहा। अब जालिम मिया का नाम महत्वपूर्ण नही है। महत्वपूर्ण बात ये है कि अगर ये खबरें बिल्कुल झूठे है तब तो कोई बात नही। अगर इसमे सच्चाई हुई तो सबसे पहले कौन प्रभावित होगा ?
अगर ये खबर सच है और इसी प्रकार कोरोना मरीज भेजने की साज़िश हो तो कितनी भयावह स्थिति होगी ? शायद मुम्बई हमला से ज्यादा घातक होगा। इसके प्रभाव से अगर भारत में कोरोना फैला तो, हमारे ही सगे सम्बन्धी प्रभावित होंगे। इतने बड़े खतरे को नजरअंदाज करने पर बेटी और रोटी के संबंध का क्या औचित्य रह जाता है ?
गौर करने योग्य बात ये है कि भारतीय मीडिया ने खुद आकर इन खबरों को नही बनाया, बिहार पुलिस और गृहमंत्रालय के आला अफसर का वक्तव्य आया है, साथ मे जालिम मियां का नाम उल्लेख के साथ DM का पत्र भी है। उन्हें जो ख़ुफ़िया बातें पता चली हो उसके आधार भी है।
ख़ुफ़िया खबरे रहस्यमयी होती है, कई बार देखा गया है, हमारे साथ रहने वाला, साधारण सा दिखने वाले व्यक्ति का, रहस्य खुलने पर, कुछ और निकलता है। ये भी संभव है कि ख़ुफ़ियातंत्र से कोई चूक हुई हो, नाम मे, जगह में ! लेकिन पूरी की पूरी खबर ही कपोलकल्पित तो नही हो सकती ?
आमतौर पर ऐसी खबरें मीडिया में नही दी जाती। जब संदिग्ध हाथ से छूट जाए या सम्पर्कविहीन हो जाए तब मीडिया को ख़बर दी जाती है कि लोग सतर्क हो जाए और संदिग्ध के रास्ते बंद हो जाए। इसलिए इसमे जालिम मियां का नाम आना संयोग भी हो सकता है और लक्ष्य असली अपराधी को उलझाना हो।
ऐसी ख़बरों को जमात की हरकत से ज्यादा बल मिला। ज्यादा संदेह करने का कारण बना जमात के लोगो का रवैया। जमात में जाना कोई अपराध नही है, अनजाने में रोगग्रस्त होना भी अपराध नही है। अपराध तो तब शुरू हुआ जब ये लोग छुपने लगे। अगर बिना छुपे ख़ुद डॉक्टर के पास जाते, इलाज कराते तो कोई समस्या नही थी। समस्या और संदेह तब होने लगे जब बारा जिला में खेतों में छुपे जमाती मिले, पर्सा के पटेरवा सुगौली, रौतहट, बिराटनगर, सप्तरी से ऐसे खबरे आने लगे। लॉकडाउन के समय मस्जिद में प्रहरी से झगड़ा करने की ख़बर से चिंता होना स्वाभाविक है।
खबरों की पड़ताल हो, ये भारत के लिए ही नही अपितु नेपाल के लिए भी हितकर होगा। हमलोग एकतरफा रूप से ये नहीं कहें कि कोई एकदम पाकसाफ है, दोनो देशों के अधिकारियों की नियमित बैठक भी होती है, दोनो देश के अधिकारी मिलकर अपने-अपने ख़ुफ़िया रिपोर्ट को रखें और दोनो मिलकर सूक्ष्म तरीके से गहन पड़ताल करें।


