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किस्सा दूरदर्शन का, रामायण और महाभारत का मुकाबला करती ‘रुई का बोझ’

 
डॉ श्रीगोपाल नारसन एडवोकेट
कोरोना के कारण देश दुनिया मे लॉक डाउन के चलते घर पर बैठे करोड़ो दर्शको को फिर से दूरदर्शन के साथ जोड़ने में प्रसार भारती को व्यापक सफलता मिली है।दूरदर्शन के प्रति जनसाधारण को आकर्षित करने के लिए जहां रामानन्द सागर के चर्चित धारावाहिक ‘रामायण’  व बलदेवराज चौपड़ा के मशहूर धरावाहिक ‘महाभारत’ का पुनः प्रसारण किया जा रहा है ,वही रुड़की निवासी फ़िल्म निर्देशक डॉ सुभाष अग्रवाल द्वारा निर्देशित  फिल्म ‘रुई का बोझ ‘ भी लॉक डाउन में लोगो के मनोरंजन व सामाजिक प्रेरणा का माध्यम बन रही है।सन1997 में रिलीज़ हुई इस फ़िल्म की पूरी शूटिंग डॉ सुभाष अग्रवाल ने जनपद हरिद्वार के अपने पैतृक गांव मुलदासपर तेलीवाला में की थी।फ़िल्म ‘रुई का बोझ ‘ का प्रसारण डीडी भारती पर प्रायः हर रोज हो रहा है।जिससे इस फ़िल्म की लोकप्रियता का पता चलता है।फ़िल्म के कथानक को देखे तो संयुक्त परिवार और उससे जुड़ी मान्यताओं में तेज़ी से विघटन हो रहा है। एकल परिवारों के दौर में बूढ़े-बुज़ुर्गों को बोझ समझने वालों की कमी नहीं है। बुज़ुर्गों की सच्चे मन से सेवा करने वाले भी हैं, लेकिन इनकी संख्या बहुत कम है। मां-बाप की संपत्ति पर तो सब हक जताते हैं, लेकिन एक बार सम्पत्ति मिल जाए तो फिर बुजुर्ग बोझ नज़र आने लगते हैं। वे यह भूल जाते है कि बचपन में कितनी मुसीबतें उठाकर मां-बाप बच्चों की परवरिश करते हैं।
फिल्म निर्देशक सुभाष अग्रवाल ने ऐसे ही एक परिवार में द्वंद से गुज़र रहे एक बूढ़े बाप ‘किशुन शाह’ की कथा पर सम्वेदनशील फिल्म बनाई थी।   फिल्म ‘रूई का बोझ’ चंद्रकिशोर जायसवाल के उपन्यास ‘गवाह गैर हाज़िर’ पर आधारित है। सुभाष की यह फिल्म एनएफडीसी के सहयोग से बनी थी। पकंज कपूर, रीमा लागू और रघुवीर यादव ने फिल्म में मुख्य भूमिकाए निभाई है।
फ़िल्म की कहानी में किशनु के परिवार में सभी प्यार के साथ रहते हैं।  लेकिन जैसे-जैसे परिवार में भाइयों की शादियां होती जाती हैं, तस्वीर बदलती जाती है। खुदगर्ज़ी के फेर में रिश्तों में दीवार खिंचनी शुरू हो जाती है। स्वार्थ हेतु शह और मात का खेल शुरू हो जाता है।
रोज़ घर में ऐसी खिचखिच शुरू हो जाती है कि घर के सबसे बड़े सदस्य यानि पिता किशनु (पंकज कपूर) ने निर्णय लिया कि वह अपनी संपत्ति का बंटवारा कर देंगे। सब अलग-अलग रहें, एक-दूसरे की ज़िंदगी में किसी का दखल नही होगा और घर में शांति हो जाएगी। बंटवारा हो जाता है लेकिन पिता कौन से बेटे के साथ रहेंगे? यह तय होना अभी बाकी था, पिता ने लड़कों को यह तय करने को कहा। अगले दिन पिता बेटों से पूछता है कि उन्होंने उसके बारे में क्या फैसला किया? इस पर बड़े व मंझले लड़के कहते हैं कि सबसे छोटे भाई को आपकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत पड़ेगी, इसलिए पिताजी छोटे के साथ रहें।
इसके बाद किशुनशाह, छोटे लड़के रामशरण (रघुवीर यादव) के साथ ही रहने लगे। ज़मीन का मात्र एक टुकड़ा अपने लिए रखने के अलावा सारी संपत्ति बेटों में बांटकर वह स्वयं को निश्चिंत समझते हैं। शुरू के कुछ दिन तो सब ठीक चला लेकिन जल्द ही मामला बिगड़ने लगता है। किशुनशाह के पुराने  दोस्त कभी-कभार मिलने आते तो वह बहू से चाय के लिए कहते तो जवाब मिलता है कि घर में दूध खत्म है, चाय नहीं बन सकती।
असहाय किशुन मन मसोसकर ही रह जाते हैं, लेकिन तब दोस्त समझाता है कि बूढ़ा बाप रूई के गट्ठर समान होता है, शुरू में उसका बोझ नहीं महसूस होता, लेकिन बढ़ती उम्र के साथ रुई भीगकर बोझिल होने लगती है। इस पड़ाव पर हर बेटा अपने बाप को बोझ बना देता है।
“पंकज कपूर ने किशुन के किरदार में एक मजबूर बुज़ुर्ग की पीड़ा को पूरे मर्म से निभाया।”
जब आप फिल्म को बाप एवं बेटे दोनों के नज़रिए से देखेंगे तो किशुनशाह जैसे बेशुमार बुज़ुर्गों की पीड़ा समझ आएगी।  सुभाष अग्रवाल की यह फिल्म पिता-पुत्र के दरकते रिश्तों पर प्रकाश डालती है। किशुनशाह अपना सब कुछ बच्चों को देकर उनके मोहताज बन जाते हैं।
हर चीज़ के लिए बेटे पर आश्रित हो चुके किशुन, रामशरण से नए कुर्ते के लिए कहते हैं लेकिन वह अनसुना  कर देता है। कुर्ता तो नहीं मिला, हां ,बहू की तीखी बोली ने बुज़ुर्ग को अकेला ज़रूर कर दिया। बेटा-बहू को किशुनशाह ने सीधे तो कुछ नहीं कहा, लेकिन यह खीझ कहीं तो निकलनी ही थी जो कुछ इस तरह से थी, “मैं बूढ़ा हूं इसलिए सही खा-पी नहीं सकता, सही कपड़े नहीं पहन सकता। क्या इस दुनिया में अकेला हूं जो बूढ़ा हुआ? क्या तुम सब कभी बूढ़े नहीं होगे?”
पंकज कपूर ने किशुन में एक मजबूर बुज़ुर्ग के हाशिए पर आ जाने की पीड़ा को पूरे मर्म से निभाया।
  किशुनशाह के अनुभव के ज़रिए फिल्म में सन्देश दिया गया कि बूढ़ों के लिए कोई मौसम अच्छा नहीं होता। सारे मौसम उनके दुश्मन होते हैं ।
 बहरहाल जब किशुनशाह को बेटे-बहू का बेगानापन  तकलीफ देने लगा तो वह घर छोड़ने को मजबूर हो गए।
किशुनशाह जैसे बुज़ुर्गों का घर से ताल्लुक मोह से अधिक जीवन-मरण का मसला हो जाता है।
घरवालों से अलग रहने का विचार बूढ़े बाप को परेशान करने वाला होता है। लेकिन मजबूर होकर उन्हें खुद के प्रति बेहद कठोर निर्णय लेना पड़ता है। किशुन घर से आश्रम की ओर निकल तो पड़े लेकिन बीच रास्ते से लौट आएं। सब कुछ छोड़कर वह फिर से परिवार के मोह से मुक्त क्यों नहीं हो सके? वापस बेटे-बहू के पास घर क्यों लौट आएं? किशुन शाह का अन्तर्द्वन्द बाहर के सुख को स्वीकार करने की तुलना घर -परिवार के दु:ख को कुबूल करता है, ‘रूई का बोझ’ की कड़वी हकीक़त को किशुनशाह ने शायद नियति मान लिया था।
यह फ़िल्म जितनी बार देखी जाए कम है।तभी तो डीडी भारती पर इसके प्रसारण व पुनः प्रसारण की मांग किसी भी स्तर पर रामायण व महाभारत जैसे धारावाहिक से कम नही है।

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