वह शीशे के घरौंदे में भी उकेर देना चाहती है, अपने अरमानों की आकृतियाँ : वंदना गुप्ता
कुछ अलग करने की चाह
अक्सर उसे पागल किए रहती
शब्द और अर्थ को
अपनी कामनाओं के
कसीदे में सजाकर
वह सृजित करना चाहती है कुछ विशिष्ट
धरती आकाश से परे
क्षितिज की धुंध को
नाखूनों से खुरच
वह बनाना चाहती हैं
एक तस्वीर अपनी चाहत की
आसमान की चादर पर
बिखेर देना चाहती है
इन्द्रधनुषी सपने
जो उसकी नींद की
कुलबुलाहट में भी रचते हैं
एक नया इतिहास
वह शीशे के घरौंदे में भी
उकेर देना चाहती है
अपने अरमानों की आकृतियाँ
जो उसकी रचनात्मकता की
विशिष्ट पहचान बन सके
वह आसमान के पैरहन पर
टांक देना चाहती है
दो फूल अपनी प्रसिद्धि के।
# डॉ वन्दना गुप्ता


