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यक्ष ने युधिष्ठिर से पूछा था-‘धरती से भारी कौन’?पलक झपकाए बगैर युधिष्ठिर ने दिया था उत्तर’माँ’।

 

धरती से भारी माँ
– बहादुर मिश्र

यक्ष ने युधिष्ठिर से पूछा था-
‘धरती से भारी कौन’ ?
पलक झपकाए बगैर
युधिष्ठिर ने दिया था उत्तर-
‘माँ’।

” भला यह कोई उत्तर है!
धरती से भारी कैसे हो सकती है माँ!”-
बचकानी बुद्धि ने कहा था।

फिर सोचा-
कभी युधिष्ठिर ने तोला होगा धरती को।
मगर, कहाँ से लाए होंगे इतना बड़ा तराजू?
कैसा रहा होगा बाट?

ज्यों-ज्यों बड़ा हुआ,
बूढ़ी होती गई माँ।
फिर बीमार।
और एक दिन बालारुण के रथ पर सवार हो चली गई-
वहाँ,
जहाँ से कोई लौटकर नहीं आ पाता।

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अब मांँ नहीं थी-
थीं उसकी यादें, सीखें, लोकोक्तियाँ, कहावतें, हँसी-मजाक,
किस्से और कहानियाँ।

अपने जीवन-काल में ही
बँट गई थी माँ-
चार टुकड़ों में।
बड़े, मँझले, सँझले, छोटे ने उठा लिया था-
एक-एक टुकड़ा।
ठठरी बनी माँ-
भारी हो गई थी।

अब जाकर कहीं समझ पाया था-
युधिष्ठिर की बात।
युधिष्ठिर ज्ञानी थे।
मालूम था उन्हें,
शब्दशक्ति का मर्म।

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