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कोरोना वायरस प्राकृतिक नहीं, इसे लैब में तैयार किया गया है : ल्यूक मॉन्टेनियर

 

 

2008 में चिकित्सा का नोबेल पुरस्कार जीतने वाले फ्रांस के ल्यूक मॉन्टेनियर ने कहा है कि कोरोना वायरस प्राकृतिक नहीं है बल्कि इसे किसी लैब में बनाया गया है. यह बात उन्होंने एक फ्रेंच चैनल के साथ साक्षात्कार में कही है. ल्यूक मॉन्टेनियर के मुताबिक उनका शोध बताता है कि कोरोना वायरस में कुछ हिस्से एचआईवी वायरस के भी हैं. उनका यह भी कहना है कि अब और भी शोधकर्ता इसी निष्कर्ष पर पहुंच रहे हैं. ल्यूक मॉन्टेनियर ने आरोप लगाया है कि इससे जुड़े सबूत और शोध पत्र दबाए जा रहे हैं. साक्षात्कार का हिंदी अनुवाद.

तो आप इन दिनों इस वायरस पर काम कर रहे हैं.

ल्यूक मॉन्टेनियर : हां मैं इस पर काम कर रहा हूं. लेकिन जरूरी नहीं कि यह काम लैब में ही हो रहा हो क्योंकि हम मुख्य तौर पर अपने सहयोगी के साथ कंप्यूटरों पर काम करते हैं. हमने कई प्रयोग नहीं किए हैं, लेकिन हमारे अनुभव खुद बीमारी से आते हैं. हम उन प्रक्रियाओं को देखते हैं जो प्रयोगशालाओं में अपनाई जा रही हैं या फिर जिन्हें मरीजों के साथ आजमाया जा रहा है.

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और आप कुछ नतीजों पर पहुंचे हैं.

हां, हमारा निष्कर्ष यह है कि इस वायरस के साथ छेड़छाड़ की गई है.

मतलब?

पूरा तो नहीं, लेकिन वायरस के एक हिस्से के साथ छेड़छाड़ की गई है. मेरा मतलब है कि इस वायरस की बनावट काफी कुछ वैसी ही है जैसी चमगादड़ों में पाए जाने वाले इस तरह के वायरसों की होती है लेकिन, उन्होंने इसमें एचआईवी यानी एड्स वायरस के भी कुछ हिस्से जोड़े हैं.

उन्होंने से आपका मतलब किससे है?

ये मुझे पता नहीं!

यह वायरस प्राकृतिक नहीं है. क्या आप यही कह रहे हैं?

नहीं, यह प्राकृतिक नहीं है. यह किसी पेशेवर मॉलीक्यूलर बायोलॉजिस्ट का लैब में किया हुआ काम है. काम बहुत सटीक है. किसी घड़ीसाज के काम जैसा महीन.

लेकिन इसका मकसद क्या है?

मकसद क्या है, पता नहीं. मेरा काम तथ्य बताना है. मैं किसी पर आरोप नहीं लगा रहा. मुझे पता नहीं यह किसने किया. न ही मैं यह बता सकता हूं कि क्यों. हो सकता है वे एड्स के खिलाफ कोई वैक्सीन बनाना चाह रहे हों. इसलिए उन्होंने उस वायरस के कुछ हिस्से लिए और उन्हें कोरोना वायरस के साथ मिला दिया.

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पता नहीं मैं ठीक से समझ रहा हूं या नहीं, आपके कहने का मतलब है कि इस वायरस में कुछ हिस्सा एचआईवी का भी है?

सही कहा. अगर हम इस वायरस की जीन संबंधी सामग्री देखें तो यह आरएनए की एक लंबी चेन है…जैसी डीएनए में होती है, लेकिन ये आरएनए है. इस चेन में उन्होंने एचआईवी की कुछ छोटी-छोटी कड़ियां जोड़ दी हैं. और इन्हें छोटा रखने का एक मकसद है. इससे एंटीजेन साइट्स (वायरस की बाहरी सतह जिससे इसका मुकाबला करने वाली हमारे शरीर की एंटीबॉडीज टकराती हैं ) में बदलाव किया जा सकता है जिससे वैक्सीन बनाने में मदद मिलती है.

ऐसी चर्चाएं पहले से चल रही हैं कि इस वायरस को बनाया गया है, लेकिन वैज्ञानिक संस्थान इन्हें खारिज कर रहे हैं.

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इस मुद्दे पर जो काम हो रहा है, उसने दबाने की कोशिश भी हो रही है. हम पहले नहीं हैं. कुछ चर्चित भारतीय शोधकर्ताओं का एक समूह भी इसी नतीजे पर पहुंचा था. उन्होंने अपनी रिपोर्ट भी प्रकाशित की थी लेकिन, उन पर दबाव बनाया गया और फिर उन्होंने इसे वापस ले लिया.

दबाव कैसे बनाया गया?

यह (रिपोर्ट) रद्द कर दी गई. अगर आप उनका काम (इंटरनेट पर) खोजेंगे तो आपको एक कैंसलेशन बैंड दिखेगा.

लेकिन ज्यादातर वैज्ञानिक आपके दावे के उलट बात कह रहे हैं.

उनकी संख्या अब कम होती जा रही है. यह साल की शुरुआत की बात है और अब समय बीतने के साथ हमारे निष्कर्ष वालों की संख्या बढ़ रही है. मेरी उम्र हो चुकी है और मुझे नोबेल भी मिल चुका है तो मैं स्वतंत्र होकर काम कर सकता हूं. इसलिए मुझ पर कोई दबाव नहीं डाला जा सकता.

सत्याग्रह से साभार

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