Mon. Aug 10th, 2020

बुद्धम् शरणम् गच्छामि, बुद्ध धर्म वैज्ञानिक : कैलाश महतो

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कैलाश महतो, नवलपरासी | वैशाख २४ गते (मइ ६) के दिन नरसिंह अवतार दिवस रहा । मेरे किसी मित्र द्वारा मेसेन्जर पर भेजे गए तथाकथित भगवान विरोधी खलनायक हिरण्यकश्यप, विष्णुभक्त कहे जाने बाले हिरण्य पुत्र प्रल्हाद और नरसिंह रुप में अवतार लेकर हिरण्य को बध करने बाले विष्णु भगवान का उग्र रुप धारित एक भिडियो फिल्म देखा था ।
 देखा कि उस छोटे से फिल्म में हिरण्य सम्राट के दरबार में सबके सामने एक छोटा सा प्रल्हाद नाम का सम्राट का बेटा भगवान का जप करते हुए यत्र, तत्र, सर्वत्र विष्णु होने की बात बतातकर पिता को क्रोधित करता है । सम्राट पिता उसके सामने कोई भगवान न होने का दावा करता है । वह खुद को ईश्वर मानता है । बेटा में रहे विष्णु भक्तपन को विरोध करते हुए अपने ही बेटा को एक खम्भे से बाँधकर तलबार से ज्योहीं उसकी शर काटने के लिए प्रहार करता है, शरीर मानव और शर खुंखार जानवर के रूप में नरसिंह कहे जाने बाले विष्णु का अवतार एक ईंट के सुन्दर खम्भे को फाडकर सामने आता है और राजा हिरण्य कश्यप को महल के चौखट पर लाकर अपने गोद में रखकर नाखूनों से उसके पेट फाडकर उसका हत्या करता है । नरसिंह अब भी क्रोधित है । उन्हें शान्त करने के लिए ब्रम्हा, महेश, राम और पार्वती समेत आते हैं । उन्हें कोई शान्त नहीं कर पाता है । बाद में प्रल्हाद के कहने पर विष्णु शान्त होकर विष्णु के अपने वास्तविक रुप में आते हैं ।
वैसे किसी के विश्वास पर हमारा कोई प्रश्न नहीं है । विज्ञान को अगर हर जगह विज्ञान ही माना जाय तो कल्पना विज्ञान, ख्वाब विज्ञान और भ्रम विज्ञान आदि भी हो सकते हैं । मगर विज्ञान के कसौटी पर कुछ सवाल खडे होते हैं । सवाल खडा यह होता है कि क्या एक वो राजा खुद को भगवान मान सकता है जो खुद ब्रम्हा का तपस्वी रहा हो ? क्या एक अवोध बालक अपने सम्राट पिता के खिलाफ आवाज उठा सकता है ? क्या राजा के उस महल में एेसा कोई गुरु या पंडित रहा होगा जो प्रल्हाद को भगवान विष्णु के सर्वशक्तिमान होने का पाठ पढाया हो ? क्या राजा अपने बिगडे औलाद को दरबार में रहने दे सकता है जो तलवार से उसका शर काटने दौडा हो ? क्या वह सम्राट अपने विरोधी बेटा को राजशी पोशाक व ठाटबाट में उस समय भी रखेगा जब उसका वह विरोध कर रहा हो ? क्या कोई मानव रुपी ईश्वर किसी दीवार से प्रकट होने का वैज्ञानिक आधार हो सकता है ? क्या हिरण्य कश्यप के समय में आलिशान महल, सजावट, कार्पेट, सोने का श्रीपेच, मुकुट, लोहे का हथियार, राजगद्दी, पोशाक, वस्त्र आदि थे जबकि लोहे का आविष्कार आजसे तकरीबन तीन हजार इ. पू. माना जाता है ? वह भी इराक के मेसोपोटामिया  और मिश्र के कुछ भागों में ?
वैसे ही आर्कियलजिष्टों को माने तो सोने का पहचान २४५०- २६०० इ.पू होने की बात है । फिर यह बडी आश्चर्य की बात है कि हमारे ब्रम्हा, विष्णु, राम, रावण, हनुमान, कृष्ण, कंश, कौरव, पाण्डव, हिरण्य कश्यप जैसे पूर्वजों के माथे और शरीरों पर सोने के कालिगढी से लिप्त पोशाके मौजूद होते हैं । सवाल अनेक एेसे भी किया जा सकता है कि जब उन युगों में हमारे पूर्वज लोग कालिगढी मे इतने निपूण थे तो फिर आजके विज्ञान के युग में हम दूर दराजों के वैज्ञानिक खोजों पर इतने निर्भर कैसे हो गयें ? हमने कितने वैज्ञानिक आविष्कार किये ? हमारे वे परमात्मा कहाँ चले गये जिनके कृपा से हम आज भी जीने के काम में हैं ?
हम अपने तथाकथित परमात्माओं के आविष्कार से कितने ओजस्वित हैं, यह खोज और अनुसंधान की बात होगी, मगर मानव जगत बुद्ध के वैज्ञानिक धर्म से नहाया जरुर हैं । बुद्ध अपने आप में वो विज्ञान है जिसे कोई भी विज्ञान झूठला नहीं सकता । बुद्ध के जमाने में मानव विकसित समाज के जरुर रहे होंगे । लोगों ने उन्हें भी विष्णु का ही अवतार माना है । मगर वे विष्णु के अन्य पूर्व अवतारों से बिल्कुल पृथक दिखते हैं । राज कुमार के रुप में भी सीधे सादे, बिना कोई सोने चाँदी व हीरा मोती के सजावट में । बुद्ध पूर्व के सारे अवतारों से अलग, शान्त एवं सभ्य मानव स्वाभाव के दिखते हैं । चेहरे पर कोई जातीय, वर्गीय, लिङ्गीय अहंकार, घमण्ड, लोभ, लालच, हथियार, सेना, मुकुट, क्रोध व बदले की भावना नहीं है बुद्ध के । आवाज और स्वाभाव में पहले बाले सारे अवतारों से साम्य, सौम्य व शान्त दिखते हैं । वे सिर्फ व सिर्फ अपने को मानव कहे और महामानव बन गये ।
बुद्ध ना तो आस्तिक है, ना नास्तिक । बुद्ध से ज्यादा किसी ने कुछ बोला नहीं और बुद्ध से ज्यादा कोई चूप रहे भी नहीं । बुद्ध जितना भरा हुआ कोई धरती पर आया भी नहीं, बुद्ध जितना खाली आजतक कोई मिला भी नहीं । बुद्ध जैसा शुन्य कोई रहा भी नहीं, बुद्ध जैसा पूर्ण आजतक पृथ्वी पर कोई जन्मा भी नहीं । बुद्ध जितना असत्य कोई दिखेगा नहीं, और बुद्ध जैसा सत्य कहीं मिलेगा भी नहीं । बुद्ध के जितना पूर्ण और बुद्ध जितना अपूर्ण मानव इस संसार में आजतक नहीं हुआ ।
पश्चिमी के विश्लेषक एक्वीवेल्स ने कहा है, “बुद्ध जैसा ईश्वरी और उनके जितना ईश्वर विरोधी धरती पर खोजना असंभव है । बुद्ध जैसा न कोई आस्तिक हुआ, न कोई नास्तिक हो पाया । बुद्ध ने कभी किसी पर कोई जोड नहीं डाला कि वह जो कहता है, वही सत्य है । उन्होंने हमेशा लोगों से यह कहता रहा कि वो जो कुछ कहता है, उसपर पूरा विश्वास न करें । व्यक्ति अपने ढंग से समझें, परखें, खोज करें और जब समझ में आ जाये तो विश्वास करें । बुद्ध ने पारम्परिक आस्था को तोडकर खोजने की राह सुझायी है । जब व्यक्ति समझ लेगा, पहचान लेगा तो उसके अन्दर आस्था खुद जाग उठेगा, उसमें श्रद्धा भी खिल उठने की बात कही है । भरोसा नहीं, परीक्षण पर बुद्ध ने जोड दिया है । अनुभव पहले, श्रद्धा बाद में । बुद्ध का धर्म ही सन्देह पर खडा है । वे कहते हैं, ” सन्देह करो, प्रश्न करो, विश्लेषण करो, और जब उत्तर ठीक मिले तो विश्वास करो ।”
बुद्ध हिन्दु परिवार में जन्म लिए । मगर वो हिन्दु न बन पाये । वे बुद्ध बने और बुद्ध ही रहकर महापरिनिर्वाण को उपलब्ध हुए । बुद्ध ने परमात्मा की खोज की और परमात्मा पर ही सवाल दागे । परमात्मा होने के बात को इंकार किया, फिर परमात्मा में ही जीने की बात कही । बुद्ध ने “अप् दीप भव !” कहा, जिसका अर्थ है, “अपनी रोशनी खुद पैदा करो ।” उनका कहना था कि कबतक और कितने दिनोंतक कोई किसी के सहारे, किसी उधार प्रकाश के उजाले में चलता रहेगा । इसिलिए यह भी कहा जाता है कि जहाँ उपनिषद समाप्त होता है, बुद्ध वहाँ शुरु होता है । ईश्वर को तलासने बाला जहाँ पर हिम्मत हार जाता है, वहाँ से बुद्ध राह और सार बनता है ।
विट्किष्टिन ने बुद्ध पर चर्चा करते हुए कहा है, “जिस सम्बन्ध में कुछ कहा ही नहीं जा सकता, कुछ कहो ही मत ।”
लाओत्से कहते हैं, “सत्य कहा ही नहीं जा सकता । कहो तो वह असत्य हो जायेगा ।”
बुद्ध और कुछ भी नहीं है । है तो केवल सत्य, एक आन्तरिक बोध । बुद्ध अपने को कभी पूर्ण नहीं कहा । मगर उनके जितना पूर्ण न बुद्ध से पूर्व, न बुद्ध के बाद कोई जन्म ले पाया । बुद्ध के धर्म शुन्यबादी है जहाँ से सत्य की खोज और परम् अस्तित्व की यात्रा शुरु होती है । यात्रा कभी अन्त नहीं होती । हम एेसे भी कह सकते हैं कि बुद्ध का धर्म वैज्ञानिक है । वह वैज्ञानिक खोज, अनुसन्धान और परीक्षण पर आधारित है ।
बुद्ध कितना बुद्ध हैं, यह जानने के लिए उनके जन्म से जुडी एक घटना से हम अवगत हो सकते हैं । बुद्ध के छट्ठी होने से पूर्व ही महाराज शुद्धोदन के परम् मित्र असिता (सन्तनु) हिमालय के तपस्या को छोडकर शुद्धोदन के दरबार के बाहर आते हैं । असिता हिमालय पर जाने के बाद पहली बार मानव बस्ती में आते हैं । वह महाराज का वचपन का साथी साथ में पढा लिखा होता है । शुद्धोदन खुद ही समय समय पर उनसे मिलने हिमालय पर जाते रहते थे । महल के बाहर मित्र असिता के आने की खबर पाकर हर्षित होकर दौडौ दौडे महाराज उनके पास आकर हालचाल लेते हैं । पूछते है कि कोई दिक्कत तो नहीं ? जबाव में असिता कहते हैं, “वे महाराज के घर जन्म लिए उनके पुत्र रुपी बुद्ध का दर्शन करने आए हैं । “
असिता के बातों से शुद्धोदन हैरान होकर जानना चाहते हैं कि यह खबर उनको मिली कैसे और वो कहना क्या चाहते हैं । असिता के सामने बालक सिद्धार्थ को लाया जाता है । उनको देखते ही असिता बालक के पैरों से अपना माथा लगाते हैं और उन्होंने सत्य का रहस्योद्घाटन करते हुए कहा, “यह दिव्य पुरुष सिद्धार्थ है – “सिद्ध पुरुष” । ये मानव के युगों युग के अभिलाषाओं को पूर्ति करने बाले दिव्य जन्म है । इनके आगमन की सूचना मैंने आकाशवाणी से पाया है ।” यह कहते हुए वो पहले हँसे, बाद में रोने लगे । उनके हँसने और रोने पर जब शुद्धोदन ने कारण पूछा तो असिता ने बताया, ” हँसा इसिलिए हूँ कि कम से कम मेरे मरने से पहले इस दिव्य पुरुष की दर्शन करने को मिला, और रोना इसलिए आ गया कि जब ये महापुरुष अपने दिव्य वचन से संसार को नहलायेगा, मैं जिन्दा न रहूँगा ।”
कहा जाता है कि ऋषि सन्तनु (असिता) के शब्दोच्चारण पर ही महाराज शुद्धोदन ने अपने पुत्र का नामाकरण “सिद्धार्थ” किया था ।
खोजना यह होगा कि कौन सा रुप ईश्वर का हो सकता है : ग्रन्थों/सिरियलों के कहानियों में पढे/सुने/दिखे जाने बाले विष्णु के अवतार या सिद्ध पुरुष “सिद्धार्थ” जो बुद्ध बनकर मानव के लिए सदा सत्य है ! बुद्धम् शरणम् गच्छामि ।

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