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क्या आप जानते हैं कि भगवान श्री कृष्ण के कितने गुरु थे ?

 

भगवान श्री कृष्ण ने जीवन में प्रत्येक व्यक्ति से कुछ न कुछ सिखा है। उन्होंने अपने जीवन में प्रत्यक्ष रूप से कुछ लोगों को अपना गुरु माना और कुछ को बनाया था। उन गुरुओं के कारण ही उन्हें अपार शक्ति मिली थी।

1. सांदीपनी : भगवान श्रीकृष्ण के सबसे पहले गुरु सांदीपनी थे। उनका आश्रम अवंतिका (उज्जैन) में था। देवताओं के ऋषि को सांदीपनि कहा जाता है। वे भगवान कृष्ण, बलराम और सुदामा के गुरु थे। उन्हीं के आश्रम में श्रीकृष्ण ने वेद और योग की शिक्षा और दीक्षा के साथ ही 64 कलाओं की शिक्षा ली थी। गुरु ने श्रीकृष्ण से दक्षिणा के रूप में अपने पुत्र को मांगा, जो शंखासुर राक्षस के कब्जे में था। भगवान ने उसे मुक्त कराकर गुरु को दक्षिणा भेंट की।

2. नेमिनाथ : कहते हैं कि उन्होंने जैन धर्म में 22वें तीर्थंकर नेमीनाथजी से भी ज्ञान ग्रहण किया था। नेमिनाथ का उल्लेख हिंदू और जैन पुराणों में स्पष्ट रूप से मिलता है। शौरपुरी (मथुरा) के यादववंशी राजा अंधकवृष्णी के ज्येष्ठ पुत्र समुद्रविजय के पुत्र थे नेमिनाथ। अंधकवृष्णी के सबसे छोटे पुत्र वासुदेव से उत्पन्न हुए भगवान श्रीकृष्ण। इस प्रकार नेमिनाथ और श्रीकृष्ण दोनों चचेरे भाई थे। आपकी माता का नाम शिवा था।

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3. घोर अंगिरस : उनके तीसरे गुरु घोर अंगिरस थे। ऐसा कहा जाता है कि घोर अंगिरस ने देवकी पुत्र कृष्ण को जो उपदेश दिया था वही उपदेश श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कुरुक्षेत्र में दिया था जो गीता के नाम से प्रसिद्ध हुआ। छांदोग्य उपनिषद में उल्लेख मिलता है कि देवकी पुत्र कृष्‍ण घोर अंगिरस के शिष्य हैं और वे गुरु से ऐसा ज्ञान अर्जित करते हैं जिससे फिर कुछ भी ज्ञातव्य नहीं रह जाता है।

4. वेद व्यास : यह भी कहा जाता है कि उन्होंने महर्षि वेद व्यास से बहुत कुछ सिखा था। पांडु, धृतराष्ट्र और विदुर को वेद व्यास का ही पुत्र माना जाता है। वेद व्यास ही महाभारत के रचनाकार हैं और वे कई तरह की दिव्य शक्तिों से सम्पन्न थे।

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5. परशुराम : पितामह भीष्म, आचार्य द्रोण और अंगराज कर्ण तीनों ही परशुराम के शिष्य थे। श्रीकृष्ण के पास कई प्रकार के दिव्यास्त्र थे। कहते हैं कि भगवान परशुराम ने उनको सुदर्शन चक्र प्रदान किया था, तो दूसरी ओर वे पाशुपतास्त्र चलाना भी जानते थे। पाशुपतास्त्र शिव के बाद श्रीकृष्ण और अर्जुन के पास ही था। इसके अलावा उनके पास प्रस्वपास्त्र भी था, जो शिव, वसुगण, भीष्म के पास ही था। इसके अलावा उनके पास खुद की नारायणी सेना और नारायण अस्त्र भी था।

शक्ति का स्रोत
अंत में भगवान श्रीकृष्ण का भगवान होना ही उनकी शक्ति का स्रोत है। वे विष्णु के 10 अवतारों में से एक आठवें अवतार थे, जबकि 24 अवतारों में उनका नंबर 22वां था। उन्हें अपने अगले पिछले सभी जन्मों की याद थी। सभी अवतारों में उन्हें पूर्णावतार माना जाता है।

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भगवान श्रीकृष्ण 64 कलाओं में दक्ष थे। उनके पास सुदर्शन चक्र था। एक ओर वे सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर थे तो दूसरी ओर वे द्वंद्व युद्ध में भी माहिर थे। इसके अलावा उनके पास कई अस्त्र और शस्त्र थे। उनके धनुष का नाम ‘सारंग’ था। उनके खड्ग का नाम ‘नंदक’, गदा का नाम ‘कौमौदकी’ और शंख का नाम ‘पांचजञ्य’ था, जो गुलाबी रंग का था। श्रीकृष्ण के पास जो रथ था उसका नाम ‘जैत्र’ दूसरे का नाम ‘गरुढ़ध्वज’ था। उनके सारथी का नाम दारुक था और उनके अश्वों का नाम शैव्य, सुग्रीव, मेघपुष्प और बलाहक था। जय श्रीकृष्णा।

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