Mon. May 25th, 2020

कहर और विवादों के बीच नेपाली जनता को नए नक्शे का उपहार : श्वेता दीप्ति

  • 485
    Shares

डॉ.श्वेता दीप्ति, काठमांडू,21 मई 2020। नेपाल में जब–जब आपदा आती है तब–तब यहाँ की सरकार कुछ अधिक सजग हो जाती है । जब यहाँ महाविनाशकारी भूकम्प आया था तब जनता को संविधान का मसौदा मिला था उपहार में, जिसकी वजह से देश के एक हिस्से में मौत का ताँडव खेला गया था । ऐन–केन–प्रकारेण देश के एक हिस्से ने अपने संविधान को पा लिया और दिवाली भी मना ली । दूसरा हिस्सा आज भी अपने संविधान और संशोधन का इंतजार कर रहा है । वहीं आज जब पूरा विश्व एक महामारी से जूझ रहा है लाशों के ढेर लग रहे हैं पूरा विश्व एक प्रकार से तीसरे विश्वयुद्ध के मुहाने पर खड़ा है, तब नेपाल की जनता को एक और तोहफा मिला है, वह है नेपाल का नया नक्शा । कुछ समय पहले प्रधानमंत्री की कुर्सी खतरे में थी, रोज उनसे इस्तीफा माँगा जा रहा था उसी वक्त उनके हाथ एक तुरुप का पत्ता आया जब भारत के रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने लिपुलेक अवस्थित सडक का उद्घाटन किया । शासक जानते हैं कि जनता आज तक राष्ट्रवाद के नाम पर ही शासक चुनती आई है । जब–जब सत्ता चाहिए या सत्ता पर खतरा मँडराया है तब–तब मित्र राष्ट्र भारत को गालियों का उपहार मिला है और जो जितना इस राष्ट्रवाद को भुना पाया है उसने सत्ता की कुर्सी का उतना ही आनंद लिया है ।
२०१५ में जब भारत और चीन में व्यापारिक समझौते हुए थे उस वक्त दोनों देशों के बीच लिपुलेक चर्चा में था पर नेपाल नहीं । २०१८ में इसी विषय पर विदेश मंत्री प्रदीप ग्यावली ने कहा था लिपुलेक त्रिदेशीय सीमा बिन्दु नहीं है । दार्चुला का कालापानी स्थित लिपुलेक नेपाल का है जिसपर भारत से विवाद है इसलिए उस स्थान को त्रिदेशीय सीमा बिन्दु नहीं माना जा सकता है । मन्त्री ज्ञवाली ने कहा था कि लिपुलेक त्रिदेशीय सीमा बिन्दु नहीं होने के कारण चीन और भारत के बीच उक्त स्थान का प्रयोग व्यापार करने के लिए सहमति पर नेपाल सरकार का विरोध यथावत् है । उन्होंने यह भी कहा था जब तक दो देशों के बीच इस विवाद को नहीं सुलझा लिया जाता तब तक हम त्रिदेशीय नही कह सकते हैं । अभी समग्र कालापानी क्षेत्र विवादित विषय है और नेपाल इसमें दावा रखता है । गौर कीजिए कि यहाँ दावा शब्द आया और जब तक यह दावा सिद्ध नहीं हो जाता तब तक वह क्षेत्र विवादित ही माना जाएगा ।
भारत और चीन के बीच हुए व्यापारिक समझौते जिसमें लिपुलेक के प्रयोग की बात थी उसपर नेपाल ने अपना विरोध जताया था । मजे की बात तो यह है कि उस वक्त भी सामाजिक संजाल में गालियाँ सिर्फ भारत को मिली थी । जबकि इसमें चीन की बराबर की भागीदारी थी क्योंकि उस समझौते में वह भी शामिल था । कालापानी और लिपुलेक पर अगर नेपाल दावा रखता है तो उसकी अनुपस्थिति में इस पर चर्चा का कोई औचित्य नहीं रह जाता है । गौरतलब यह है कि यह विषय फिर ठंडा हो गया । उसके बाद जब भारत ने कश्मीर मसले के बाद अपना नया नक्शा जारी किया तो एक बार फिर इसी मुद्दे ने सर उठाया और नेपाल ने फिर इसका पुरजोर विरोध किया । नेपाल का यह कहना था कि विवादित जमीन को, भारत को एकतरफा निर्णय करते हुए नक्शे में शामिल नहीं करना चाहिए । तो क्या आज जो नया नक्शा नेपाल ने पास किया है वह इसी बात का जवाब है ? इतने सालों से बन रही सड़क का संज्ञान हमारे प्रधानमंत्री जी को नहीं हुआ और अचानक जब सड़क का उद्घाटन होता है तो दो दिनों के अन्दर नक्शा तैयार हो जाता है । इस परिस्थितियों को देखते हुए भारत का इशारा चीन की तरफ है कि यह सब चीन की शह पर हो रहा है । क्योंकि यह सड़क २००२ से निर्माणाधीन थी । इस सड़क के बनने से जहाँ मानसरोवर की यात्रा सहज हुई है वहीं भारत के लिए सामरिक दृष्टि से भी यह काफी महत्तव रखती है । ऐसे में स्वाभाविक है कि चीन को यह बात गँवारा नहीं होगी क्योंकि भारत और चीन के कई सीमा पर विवाद जारी है । चीन की विस्तारवादी नीति से भी पूरा विश्व वाकिफ है । नेपाल पर चीन के बढते प्रभाव पर भी कोई शक नहीं है । कुछ दिनों पहले प्रधानमंत्री की कुर्सी जब खतरे में थी तो चीनी राजदूत की जो भूमिका नेपाल की राजनीति में रही और जिसकी वजह से प्रधानमंत्री की कुर्सी बची उसे इस परिप्रेक्ष्य में नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है । खैर यह अनदेखा पहलू है जिस पर कयास ही लगाए जा सकते हैं ।
जहाँ तक सवाल लिपुलेक और कालापानी का है तो जो बातें सबसे पहले समझ में आती है वो यह कि कालापानी एक तरह से डोकलाम की तरह है, जहां तीन देशों के बॉर्डर हैं । डोकलाम में भारत, भूटान और चीन हैं । वहीं कालापानी में भारत, नेपाल और चीन । ऐसे में भारत के लिए सैन्य नजरिये से यह ट्रायजंक्शन बहुत महत्वपूर्ण है । उस क्षेत्र में सबसे ऊंची जगह है ये । १९६२ युद्ध के दौरान भारतीय सेना यहां पर थी । डिफेंस एक्सपर्ट बताते हैं कि इस क्षेत्र में चीन ने भी बहुत हमले नहीं किए थे क्योंकि भारतीय सेना यहां मजबूत स्थिति में थी । इस युद्ध के बाद जब भारत ने वहां अपनी पोस्ट बनाई, तो नेपाल का कोई विरोध नहीं था । ये अलग बात है कि उस वक्त भारत और नेपाल के संबंध भी अब जैसे तनावपूर्ण नहीं थे । भारत का डर ये है कि अगर वो इस पोस्ट को छोड़ता है, तो हो सकता है चीन वहां धमक जाए और इस स्थिति में भारत को सिर्फ नुकसान हासिल होगा । इन्हीं बातों के मद्देनजर भारत इस पोस्ट को छोड़ना नहीं चाहता है । सामरिक दृष्टिकोण से यह क्षेत्र भारत के लिए अत्यन्त महत्तवपूर्ण है और भारत इसे अपना हिस्सा मानता है । वैसे इन विवादों के बीच चीन ने यह कह कर अपना पल्ला झाड़ लिया है कि यह भारत और नेपाल का मामला है और इसमें एकपक्षीय निर्णय से दोनों देशों को बचना चाहिए ।
भौगोलिक दृष्टिकोण से निर्जन एवं दुर्गम क्षेत्र का सही ढंग से सीमांकन न होने के कारण यह क्षेत्र हमेशा से विवादित रहा है । भारत और नेपाल के सर्वे अधिकारी कई सालों की साझा कोशिशों के बावजूद अभी तक कोई सर्वमान्य नक्शा नहीं बना पाए । दोनों देश के बीच सीमांकन आयोग का भी गठन हुआ था जो कि निष्क्रीय है ।
भारत और नेपाल के बीच लगभग १७५१ किमी सीमा है जिसका निर्धारण ईस्ट इंडिया कंपनी और नेपाल के बीच युद्ध की समाप्ति के बाद स्थाई शांति के लिए २ दिसम्बर १८१५ को हस्ताक्षरित सुगोली की संधि के द्वारा किया गया था । संधि को नेपाल के राजा ने ४ मार्च १९१६ को अनुमोदित किया था । संधि की शर्तों के अनुसार नेपाल ने तराई के विवादास्पद इलाके और काली नदी के पश्चिम में सतलज नदी के किनारे तक (आज के उत्तराखण्ड और हिमाचल प्रदेश) जीती हुई जमीन पर अपना दावा छोड़ दिया था । इस सधि में नेपाल के साथ सिक्किम तक की सीमाएं तय हैं जिसमें उत्तराखण्ड से लगी २६३ किमी लंंबी सीमा भी शामिल है । नेपाल कालापानी के उत्तर पश्चिम में १६ किलोमीटर दूर लिम्पियाधुरा से निकलने वाली कूटी यांग्ती (नदी) को उसकी लम्बाई एवं जलराशि के आधार पर काली नदी मानता है, जबकि भारतीय पक्ष कालापानी से निकलने वाली जलधारा को ही काली नदी मानता रहा है । इन दोनों जलधाराओं का गुंजी के निकट मनीला में संगम होता है और आगे चलकर यही काली नदी शारदा और काफी आगे मैदान में चलकर घाघरा कहलाती है । कूटी के अलावा काली नदी की स्रोत जल धाराओं में धौली, गोरी और सरयू भी शामिल हैं । सरयू पंचेश्वर में और गोरी नदी जौलजीवी में काली से मिलती है । सुगोली की संधि में काली नदी के पश्चिम वाला क्षेत्र भारत का और पूरब वाला नेपाल का माना गया है । जिस नदी को नेपाल में काली नही कहते हैं वह पश्चिम से पूरब की ओर बहती है । इसलिए नेपाल के दावे के अनुसार संधि में विभाजक दिशाएं पूरब–पश्चिम के बजाय उत्तर और दक्षिण मानी जानी चाहिए थीं । जबकि इस कूटी घाटी में नदी के दो किनारे उत्तर और दक्षिण दिशा की ओर हैं और घाटी के निचले आबादी वाले क्षेत्र में नदी के दोनों ओर भारत और नेपाल के गांव हैं । इधर भारत जिस नदी को काली मानता है वह उत्तर से दक्षिण की ओर बहती है । इसलिए संधि के हिसाब से पूरब में नेपाल के दार्चुला जिले के छांगरू, दिलीगाड़, तिंकर और कौआ गांव है, जबकि पश्चिम में भारत के उत्तराखण्ड राज्य के पिथौरागढ़ जिले की गुंजी, नपलच्यू, रौंगकौंग, नाबी, कूटी, गब्र्यांग और बुदी ग्राम सभाएं हैं । वर्तमान में इस नदी के दोनों ओर भाटिया जनजाति के लोग बसे हुए हैं । एक ही संस्कृति और नृवंश के चलते दोनों ओर के ग्रामवासियों के आपस में वैवाहिक और आर्थिक संबंध हैं ।
यह दोनों देशों के नागरिकों की स्थिति है । जहाँ सीमान्तों के बीच कोई मतभेद नहीं है । परन्तु सवाल इस बात का जरूर है कि आखिर अचानक नेपाल सरकार ने अफरातफरी में यह निर्णय क्यों लिया ? जबकि नेपाल के विरोध पर भारत ने यह कहा था कि अन्तर्राष्ट्रीय वायुसेवा सुचारु होने के बाद इस विषय पर वार्ता होगी इसके लिए हम तैयार हैं । इतना ही नहीं संसद से हमारे प्रधानमंत्री जी ने जिस शैली से भारत और भारत के राष्ट्रीय प्रतीक पर तंज कसा क्या उसे स्वाभाविक माना जा सकता है ? एक जिम्मेदार पद पर आसीन राष्ट्र प्रमुख के एक–एक शब्द मायने रखते हैं ।
वर्तमान में पूरा विश्व जिस कोरोना कहर से गुजर रहा है और जिसकी आहट नेपाल के जनमानस को डराने भी लगी है उस वक्त पड़ोसी मित्र राष्ट्र पर व्यंग्य और ताना मारना कितना औचित्य रखता है ? नए नक्शे के साथ ही दुकानों पर भीड़ लगने लगी है कि कहीं भारत की नाराजगी ना झेलनी पड़े । यह आम जनता का डर है जो घरों में बंद होकर जहाँ कोरोना की विभिषिका से डर रही है वहीं उस अनजानी पीड़ा से भी गुजर रही है क्योंकि भूखे पेट कोई लड़ाई नहीं जीती जा सकती ।
भारत ने नेपाल के इस नए नक्शे को मानने से इनकार कर दिया है । कल तक जो बातें वार्ता कर के सुलझाने की थी वो अब तनाव का रूप अख्तियार कर चुकी है । जाहिर है कि आने वाले समय में इसका स्वरूप और भी बदल सकता है । उम्मीद तो अब भी यही किया जाना चाहिए कि इस मसले को शांतिपूर्ण तरीके से निपटाया जाए और कोई मध्यममार्ग अपना कर सदियों की मित्रता को कायम रखा जाय । क्योंकि पड़ोसी बदले नहीं जाते और ये दोनों देश विवादों के बावजूद कई स्तरों पर हमेशा साथ–साथ खड़े रहे हैं ।

यह भी पढें   अमेरिका ने ब्राजील के नागरिकों के प्रवेश पर रोक लगाया

आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Loading...
%d bloggers like this: