Fri. Jul 3rd, 2020

एक नेता का कबूलनामा (व्यंग्य) : राजीव मणि

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चुनाव की घोषणा हो चुकी थी। सीट बंटवारे की पहली लिस्ट पार्टी जारी कर चुकी थी। कई नेताओं के नाम इस लिस्ट में नहीं थे। सभी असंतुष्ट नेता पार्टी कार्यालय में आकर हंगामा मचा रहे थे। कुछ नेता ‘पार्टी अध्यक्ष मुर्दाबाद’ के नारे लगा रहे थे, तो कुछ गमला-मेज-कुरसी पटक रहे थे। लोटन दास अपनी धोती खोलकर प्रवेश द्वार पर बिछा धरने पर बैठ गये। अन्य नेताओं से चिल्लाकर बोले, ‘‘भाइयों, आप भी इस मनमानी के खिलाफ हमारा साथ दें। पैसे देकर खरीदे गये हैं टिकट ! इसके खिलाफ हम यहां नंग-धड़ंग धरना देंगे, प्रदर्शन करेंगे।’’
लोटन दास की बात सुनकर कुछ और नेता वहां आ गये। सभी धोती-कुरता खोलने लगे। भीड़ में से आवाज आयी, ‘‘नहीं चलेगी, नहीं चलेगी, सौदेबाजी नहीं चलेगी।’’
कुछ ही देर में मीडियाकर्मी वहां पहुंच गये। दर्जनों कैमरा देख नेताओं में और जोश आ गया। कुछ तो अपनी चड्डी उतारने लगे, लेकिन बगलवाले ने ऐसा करने से रोका। फुसफुसाकर नेता को बताया, ‘‘चैनल पर लाइव आ रहा है।’’
दूसरी तरफ शनिचर महतो मैदान में लोट रहे थे। चिल्ला-चिल्ला कर कह रहे थे, ‘‘एक बीघा जमीन बेचकर पैसे दिये थे। मेरी तीनों पत्नियां मना कर रही थीं। बेटा घर छोड़कर चला गया। बेटी एक कार्यकर्ता के साथ भाग गयी। फिर भी मैं टिकट के लिए रात-दिन लगा रहा। पैसे लेकर भी मुझे टिकट नहीं दिया गया। अब मैं कौन-सा मुंह लेकर घर जाऊं।’’ इतना बोलते ही शनिचर की हालत खराब हो गयी। … और फिर, हृदयगति रुक जाने से उनकी मौत हो गयी।
इसपर पार्टी कार्यालय में जमकर हंगामा मचा। भारी संख्या में पुलिस आ गयी। डंडे चले। टीवी पर लाइव चलता रहा। और देखते ही देखते यमराज को शनिचर महतो की मौत की खबर मिल गयी। पलक झपकते यमराज वहां पहुंच गये और अपने भैसा पर शनिचर महतो की आत्मा को जबरन बैठा चलते बने।
यमराज ने चित्रगुप्त के दरबार में लाकर शनिचर को पटक दिया। चित्रगुप्त ने इशारे से पूछा, ‘‘कौन है यह ?’’
‘‘महाराज, अभी-अभी मरा है। नाम शनिचर महतो है। खुद को वहां नेता बताता था। चुनाव में टिकट नहीं मिलने का दरद बर्दाश्त नहीं कर सका। हृदयगति रुक जाने से इसकी मृत्यु हो गयी।’’ यम ने हाथ जोड़कर कहा।
‘‘ठीक है, शनिचर, तुम कठघरे में आ जाओ। तुम्हारे पाप-पुण्य का हिसाब-किताब हो जाने पर ही यह निर्णय लिया जाएगा कि तुम्हें स्वर्ग भेजना है या नरक।’’ चित्रगुप्त ने कड़ककर कहा।
शनिचर महतो दुखी मन से कठघरे में आ गये। उनसे कुछ पूछा जाता, इससे पहले ही बोल पड़े, ‘‘महाराज, या तो हमें स्वर्ग भेजिए या फिर से धरती पर। हम जिन्दगी भर जनता की सेवा किये हैं। हमें यह मौका मिलना ही चाहिए …।’’
बीच में ही चित्रगुप्त महाराज बोल उठे, ‘‘कमबख्त, दुष्ट, इसे भी क्या तुम धरती समझते हो ? जब कुछ पूछा जाए तो बोलना।’’ फिर कुछ फाइल निकालकर चित्रगुप्त देखने लगे। कुछ देर बाद नाराज होते हुए तेज आवाज में बोले, ‘‘दुष्ट, तुम पर पहला आरोप यही है कि तुमने अबतक जनता को लूटा है।’’
‘‘नहीं महाराज, यह गलत है, बल्कि लूटा तो मैं गया हूं। सारे खेत बेचकर टिकट के लिए पैसे दिये थे, टिकट भी नहीं मिला ! और इसी गम में मुझे अपने प्राण गंवाने पड़े।’’ शनिचर ने विनम्र भाव से कहा।
‘‘तुमने अपने स्वार्थ में खेत बेचकर टिकट पाने के लिए पैसे दिये थे। इसमें जनता का क्या भला ? पापी, तुमने यह भी नहीं सोचा कि तुम्हारे बीवी-बच्चों का क्या होगा ?’’ चित्रगुप्त नाराज हुए।
‘‘क्षमा महाराज, मैं तो …।’’
‘‘दुष्ट, तुमने आजतक जनता के लिए क्या किया ? अपनों के बीच ठेके बांटे, कमीशन के पैसों से जमीन-जायदाद बनाया। गरीब-असहायों की जमीन हड़प ली। मकान पर कब्जा जमाया। अबलाओं की इज्जत लूटी। बेशरम !’’ चित्रगुप्त क्रोधित हो गये।
‘‘यह सब झूठ है महाराज, किसी ने गलत खबर दी है। पूरा इलाका जानता है कि …।’’
चित्रगुप्त बीच में ही बोले, ‘‘क्या यह सच नहीं कि तुमने तीन शादियां की हैं ?’’
‘‘सच है महाराज।’’
‘‘क्या तुमने बलात्कार के आरोप से बचने के लिए दूसरी शादी नहीं की थी ?’’
शनिचर कुछ देर सिर झुकाए खड़ा रहा। फिर बोला, ‘‘की थी महाराज।’’
‘‘तो क्या तीसरी शादी के बारे में भी मुझे ही भेद खोलना पड़ेगा।’’
‘‘मैं अपना गुनाह कबूलता हूं महाराज।’’
चित्रगुप्त कुछ देर शनिचर महतो को देखते रहे, फिर कुछ सोचकर बोले, ‘‘शनिचर, तुम मान चुके हो कि तुम्हारे ऊपर लगाया गया पहला आरोप सही है। अब मैं तुम्हें दूसरा आरोप बताता हूं।’’ चित्रगुप्त कुछ क्षण शनिचर का चेहरा देखते रहे। वे कठघरे में खड़ा-खड़ा डर रहे थे, ना जाने चित्रगुप्त क्या आरोप लगा बैठे। मन में सोच रहे थे, आखिर चित्रगुप्त को यह सब जानकारी कहां से मिल गयी। धरती पर तो आजतक किसी ने इस तरह आरोप लगाने का साहस नहीं किया। तभी पूरे दरबार में कड़क आवाज गूंजी, ‘‘तुमपर दूसरा आरोप है कि तुमने अपने जीवन में जमकर अय्यासी की। इसी अय्यासी के कारण अपने घर-परिवार को उपेक्षित रखा।’’
शनिचर अंदर तक कांप गये। जिस बात की आशंका थी, वही हुई। वे धीमी आवाज में बोले, ‘‘महाराज, अभी आपने जो जिक्र किया था, उसके अलावा कुछ नहीं किया।’’
शनिचर की बात सुनकर चित्रगुप्त फिर क्रोधीत हो गये, ‘‘नालायक, तुम क्या समझते हो, यह तुम्हारी धरती है, पार्टी कार्यालय है ? तुम क्या-क्या गुल खिलाकर यहां आये हो, मुझे पता नहीं ? अगर तुम ऐसा सोचते हो, तो यह तुम्हारी भूल है। मैं सब जानता हूं। यहीं से सारा खेल देखा करता हूं। लेकिन, फैसला सुनाने से पहले मैं तुम्हारे ही मुंह से यह सब सुनना चाहता हूं। बाद में यह ना कहना कि मुझे सफाई का मौका नहीं दिया गया। यह चित्रगुप्त का दरबार है, और यहां सबको अपनी बात रखने का बराबर मौका दिया जाता है। इस दरबार के न्याय की चरचा तीनों लोक, दसों दिशाओं में होती है। क्या तुम भूल रहे हो ?’’
‘‘क्षमा महाराज, क्षमा ! मैंने कुछ और युवतियों की इज्जत लूटी है। कभी रैली के बहाने राजधानी ले जाने पर, कभी काम करवाने का लालच देकर। लेकिन, मुझे ठीक-ठीक संख्या नहीं मालूम। स्मरण नहीं है महाराज।’’
चित्रगुप्त को अंदर से काफी गुस्सा आ रहा था। ऐसा जान पड़ता था कि अपनी खड़ाऊं फेंककर ही शनिचर को मार बैठेंगे। लेकिन, उन्होंने संयम से काम लिया। सहज होते हुए पूछा, ‘‘तुम्हारी बेटी क्यों तुम्हारे ही कार्यकर्ता के साथ भाग गयी ?’’
‘‘मैं अपना दायित्व ठीक से नहीं निभा सका, महाराज। मैं तो वरुण सोनार को भला आदमी समझता था। उसके लिए क्या नहीं किया। अधिकांश ठेके उसी को दिये। जब वह सामने आता था, हाथ जोड़े रहता था। उसके मुंह से तो कोई आवाज ही नहीं निकलती थी। मेरे कदमों में बैठा रहता था। मेरे एक इशारे पर घर-बाहर का सारा काम कर दिया करता था। उसकी बनावटी ईमानदारी ने मुझे धोखा दिया, महाराज। मुझे क्या मालूम था कि वह घर का काम करने के बदले कौन-सा काम कर रहा है।’’ इसके आगे शनिचर कुछ बोल ना सका। मुंह लटकाये खड़ा रहा।
‘‘क्या तुम वरुण सोनार से हर ठेके में कमीशन नहीं खाते थे ?’’
‘‘खाता था महाराज।’’
‘‘तो फिर किस मुंह से कह रहे हो कि जनता के सेवक हो ?’’
‘‘हूं महाराज, मैंने जनता की काफी सेवा की है। गलियां, सड़कें, पुल, पुलिया, काफी कुछ बनवाया हूं।’’ शनिचर के चेहरे पर थोड़ी चमक दिखी।
‘‘मुझे भी ठगने चला है शैतान।’’ चित्रगुुप्त डांटते हुए बोले, ‘‘क्या तुमने खुद कमाकर ये सारी चीजें बनवायी थीं ? जनता के पैसों से बनवाया, उसमें भी कमीशन खाकर हीरो बनता है। दुष्ट, अगर सेवा की भावना ही होती, तो टिकट ना मिलने पर अपनी जान क्यों देता। क्या जनता की सेवा के लिए चुनाव लड़ना जरूरी था ? तुम बिना चुनाव लड़े जनता की सेवा नहीं कर सकते थे, किसी ने मना किया था ?’’
‘‘नहीं महाराज, किसी ने मना नहीं किया था।’’ इससे ज्यादा शनिचर कुछ बोल ना सका।
‘‘तो तुम मान रहे हो कि जनता को लूटने के लिए ही तुमने राजनीति की राह ली ?’’
शनिचर के मुंह से कुछ नहीं निकल सका। सिर्फ ‘हां’ में सिर हिलाकर रह गया।चित्रगुप्त ने राहत की सांस ली। रुककर बोले, ‘‘तुम्हारे ऊपर लगा यह आरोप भी सच साबित होता है। दरअसल तुम धरती के भार थे। तुम्हारे मरने से धरती पर एक पापी कम हो गया। अब बताओ, तुम्हारा पुत्र घर छोड़कर क्यों गया ?’’
‘‘उसे मेरा राजनीति में आना पसंद नहीं था, महाराज। वह हमेशा मुझे इससे दूर रहने की सलाह देता था। लेकिन, मैं उसकी बात …।’’ इतना कहकर शनिचर चुप हो गया।
‘‘देखा पापी, तुम्हारा बेटा भी तुम्हें पसंद नहीं करता था। बीवी तुमसे घृणा करती थी। और तुम जनता के सेवक बने फिरते थे।’’ चित्रगुप्त ने गुस्से में कहा।
चित्रगुप्त का क्रोध देखकरशनिचर की सारी नेतागिरी हवा हो गयी। उसेअब काफी डर लग रहा था कि चित्रगुप्त ना जाने क्या आरोप लगा दें। उनके कैसे-कैसे प्रश्नों का सामना करना पड़े। चित्रगुप्त के प्रश्नों से बचने के लिए शनिचर बीच में ही बोल पड़ा, ‘‘महाराज, अब मैं ना स्वर्ण जाना चाहता हूं और ना ही धरती पर, मुझे नरक में ही भेज दें। मैं अपने सारे गुनाह कबूल करता हूं। मैं पापी हूं, दुष्ट, नालायक और वह सबकुछ हूं, जो इस तरह के व्यक्ति को कहा जाता है। कृपया मुझे नरक भेज दें, महाराज।’’
शनिचर की बात पर चित्रगुप्त उसे तीरछी नजर से देखने लगे और बोले, ‘‘यह तुम्हारा अनुरोध है या मुझे आदेश दे रहे हो !’’
‘‘मैं आपसे अनुरोध कर रहा हूं महाराज।’’
‘‘हूं … ठीक है। जाओ, मैं तुम्हें नरक भेजता हूं। वहां तुम्हारे कई साथी व कार्यकर्ता पहले से ही सजा भोग रहे हैं। तुम भी उनके साथ जाकर काम में लग जाओ। और हां, देखो ध्यान रहे, वहां कोई ऐसा काम ना करना जिससे नरक की व्यवस्था बिगड़ जाये।’’ सभा यहीं खत्म की जाती है। चित्रगुप्त उठकर चल देते हैं। जाते-जाते नीचे धरती पर झांककर देखते हैं, शनिचर महतो के सम्मान में एक शोकसभा का आयोजन किया गया था। एक वक्ता काफी गंभीर हो बोल रहा था, ‘‘शनिचर जैसा राजनेता का यूं चले जाना हमारे समाज के लिए काफी दुखदायी है। वे एक सच्चे, ईमानदारव महान नेता थे। स्वर्ग में ईश्वर उन्हें शान्ति दे।’’

राजीव मणि
संस्थापक/प्रबंध संपादक
नये पल्लव प्रकाशन, पटना

 

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