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कविताएं १. प्राण रस २. अहिंसा के परिपालक : डा.उषारानी राव

 

प्राण रस

सिकुड़ती नदियां 

घटता जल नलों में 

आंखों की सूखती

संवेदना है

जैसे कलाकार की कूँची से चित्र

का उभर आता है रंग

सूर्य की किरणों से खिलते हैं

 फूल के पटल

 वैसे ही

हमारी कोशिकाओं में बहता जलज

 जीवन प्रणाली है

 जल के बिना नहीं पूरा होता

 कोई संकल्प 

कोई अनुष्ठान

भीतर की अव्यक्त शक्ति है

व्यक्त सृष्टि का बीज भी 

जहां रहता है जल सदा 

बनी रहती है अग्नि भी!

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 क्षुधा है अग्नि 

पेट की,मन की ,बुद्धि की 

जल परितृप्ति है अग्नि की

समष्टि चेतना का अविछिन्न 

प्रवाह हैै जल 

कराहते समय में 

सूरज के डूबने के बाद भी

जागृत कर संवेदना को

करे संरक्षण

 प्राण रस का

 जल का

  अहिंसा के परिपालक 

 

विराट संकल्प शक्ति से 

आपूरित ..

 गांधी के मनोभूमि में 

सत्य और अहिंसा पर आधारित 

स्थिर समाज के 

आकाश पर 

अवस्थित था

प्रजातंत्र का अनुभव..

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अन्याय से..

अनाचार से ..

आपूरित संसार की 

शस्त्र शक्ति को 

किया निष्क्रिय 

रक्तहीन विप्लव से हिंसाहीन पथ हुआ निर्मित !

 

मानवीय तत्वों को अंतस्थ कर 

सामाजिक समरूपता की 

अंतर्दृष्टि

अकाट्य चेतना में 

हो जाती है रुपांतरित

 

करुणा की अनंत धारा में 

अनुभूत सत्य को 

अहिंसा में

 प्रतिपादित कर 

बुद्ध हो गए थे भेदशून्य 

अभेद…

 

सर्वग्राही बुद्धत्व में 

लीन गांधी ने 

नूतन प्राण का 

संचार कर मानवीयता को 

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किया प्रतिष्ठित…

 

यह तो कोई 

अनासक्त योग का
परिपालक ही कर सकता था
लोक में वरण अलौकिकता का!

डा.उषारानी राव

 

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