Thu. Jul 2nd, 2020

वर्तमान परिप्रेक्ष्य में साहित्यकारों का दायित्व राजकुमार जैन ‘राजन’

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‘यदि आप आसमान में चमकते तारों को छू नहीं सकते तो उनकी ओर देख तो सकते हो’ यह कथन हिब्रु लेखक एमोस ओजÞ का है और उनका यह मानना है कि मनुष्य के लिए जÞरूरी है कि वह तारों तक भले ही नहीं पहुंच पाये, पर जरूरी है कि वह उन्हें आंखों से ओझल न होने दे । वे कहते हैं कि तारों को सिर्फ आंखों से ओझल नहीं होने देना है, उन्हें जी भरकर देखना है ।
ये तारे उन आशाओं और सपनों के हैं, जिनके सहारे आदमी जीता है । बेहतर कल के सपने, बेहतर कल की आशाएं । ये सपने और आशाएं जब विश्वास बनते हैं, तब कोई आग रोशनी में बदलती है । साहित्य इस आग को रोशनी में बदलने की इसी प्रक्रिया का नाम है । साहित्य को समाज का दर्पण कहा गया है । लेकिन यह एक ऐसा दर्पण होता है जो समाज की हकीकत को सिर्फ दिखाता ही नहीं, उस दिशा का संकेत भी देता है । जिसकी ओर चलकर समाज अपने आप को बेहतर भी बना सकता है। यही साहित्य का एक बड़ा प्रयोजन भी है ।
साहित्य की ढेरों परिभाषाएं की गई है । दर्पण के साथ–साथ इसकी तुलना जलती हुई मशाल से भी की गई है । कभी इसे मनुष्य के भीतर पलने वाली संवेदनाओं का प्रस्फुटिकर्ण कहा गया है और कभी इसे जीवन के अधूरेपन को भरने की एक कोशिश की संज्ञा दी गई है । सब परिभाषाएं अपनी अपनी जगह सही है । ये सब परिभाषाएं जीवन में साहित्य की आवश्यकता और महता को ही उजागर करती हैं ।
भारतीय संस्कृति की यह विशेषता ही है कि वह चिंतन और सूक्ष्म अनुभूतियों पर आधारित है । हमारी संस्कृति ऋषियों की तपस्या से संचालित होकर विस्तार पाती रही है । उन्होंने मनुष्य होने का अर्थ खोजा और उस अर्थ को सार्थक परिणामों तक पहुंचाने का रास्ता बताया । देखिये, इस यात्रा का कैसा सहज निरूपण भारतीय साहित्य में किया गया है–

‘असतो मा सद्गमय
तमसो मा ज्योतिर्गमय
मृत्योर्मा अमृतं गमय’

तो क्या साहित्य का उद्देश्य किसी आदर्श को परिभाषित कर उसे प्राप्त करना ही है ? तो क्या साहित्य का सृजन लोक कल्याण की किसी परिकल्पना को साकार करने के लिए ही होता है ? नहीं, रचनाकार यह सोचकर नहीं लिखता है कि इससे किसी का भला होगा, किसी को राह दिखेगी । लेकिन परहित का भाव उसके सृजन में निहित होता है । प्रेमचंद ने साहित्य को जलती हुई मशाल कहा था । उनका यह कथन वर्तमान परिप्रेक्ष्य में भी साहित्यकारों को अपने दायित्व का बोध कराता है । साहित्यकार का दायित्व है कि उनके सृजन को मशाल कहा गया है तो उसकी आग रोशनी देने वाली हो, जलाने वाली नहीं । आकाश के तारों को आंखों से ओझल न होने देने की आकांक्षा या चेतावनी का अर्थ भी यही है कि भीतर कहीं रोशनी देने की भावना पलती रहे । वर्तमान परिवेश में साहित्य की यह रोशनी ही जीवन के अधूरेपन को, चाहे वह कैसा भी अधूरापन क्यों न हो भरने का माध्यम बनती है । तभी जीवन के खंडित सपनों को पूरा करने की एक लालसा पैदा होती है । तब साहित्य–सृजन सार्थक बनता है ।

वर्तमान परिवेश में देखें तो साहित्य एवम सामाजिक सरोकार के बीच गहरा नाता है । गए वे दिन जब अरण्य में बैठकर साहित्य की रचना होती थी । आज साहित्यकार, समाज के केंद्र में रहकर, समय को उसकी समस्त समकालीनता में पकड़कर रचना करता है । समय चाहे कितना ही समस्याग्रस्त, त्रस्त, और पस्त हो, साहित्यकार बेहतर समय का स्वप्न देखता है और दिखता है । परिवर्तन की कामना हमेशा बनी रहे, आंखों में बेहतर कल के सपने जिंदा रहें, इसके लिए जरूरी है कि समाज मे साहित्य व साहित्य के पठन–पाठन के लिए जगह बनी रहे ।
वर्तमान परिवेश में हमारे समाज का राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक ढांचा कुछ ऐसा हो चला है कि साहित्य की स्थिति, उसके सरोकार और हस्तक्षेप अत्यंत धुंधले और बेमानी से लगने लगे हैं । प्रेमचंद आज के समय में भी क्यों प्रासंगिक बने हुए हैं ? कारण बहुत स्पष्ट है । उनके द्वारा रचित साहित्य में हम उस युग के आम आदमी की सच्ची तस्वीर देख सकते हैं । उनके समूचे लेखन ने उनको सामाजिक सरोकारों से जोड़े रखा । उनके लेखन में वे सारी चिन्ताएं सापÞm तौर पर उभर कर सामने आयीं थी जो उस समय के समाज में थी और जिनकी भविष्य में आशंका थी । आज साहित्यकारों से इसी प्रकार के कालजयी लेखन की अपेक्षाएं बढ़ गई है ।
इसी संदर्भ में कहें तो, कबीर सैंकड़ों साल पहले जितने प्रासंगिक थे उससे भी कहीं अधिक आज हैं । कबीर सामाजिक सरोकार के बहुआयामी उदाहरण हैं । आज के संदर्भ में साहित्यकारों के लिए इन्हीं कसौटियों पर लेखन करना चुनौती है । मुझे नही लगता कि वर्तमान परिवेश में कोई भी संवेदनशील रचनाकार अपने समय की विसंगतियों और समाज, देश के इस परिदृश्य से निरपेक्ष बना रह सकता है और साहित्य के सरोकारों को समाज तक ले जाने में कोताही करेगा । रचनाकार यदि अपने आस पास से आंखें मूंद लेता है तो उसका साहित्य केवल पाखंड ही कहलायेगा ।

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जीवन मे हो या साहित्य में, परिवर्तन निरन्तर होते रहते हैं, किंतु कोई चीज अचानक नए सिरे से शुरू नहीं होती । उसका एक सिरा अपने से पहले किसी परिपाटी या परम्परा से जुड़ा होता है इसी से जीवन और साहित्य दोनों आगे बढ़ते हैं । भूमंडलीकरण के साथ–साथ आये निजीकरण, उदारीकरण, डिजिटलाइजेशन के कारण भी वर्तमान परिवेश में साहित्यकारों का दायित्व बढ़ जाता है । भारतीय समाज और साहित्य में कई परिवर्तन हो रहे हैं । अनेक नए–नए विषय उठाये जा रहे हैं और नए यथार्थ को नये ढंग से सामने लाने के अनेक तरीके अपनाए जा रहे हैं । उदाहरण के लिए, इधर सेरोगेसी, सोलमेट, लिव इन रिलेशनशिप, देह शोषण नई समस्याएं बनकर उभरी है, जिनका सम्बन्ध समस्त भूमंडलीय यथार्थ से है । सामाजिक समरसता, सहिष्णुता भी ऐसे विषय है जिनपर साहित्यकारों द्वारा जिम्मेदाराना लेखन कर यथार्थ को सामने लाना चाहिए । आज के साहित्यकारों को समाज में हो रहे बदलावों पर भी पैनी आलोचनात्मक दृष्टि रखनी चाहिए और उनके अंधेरे–उजले सभी पहलुओं को सकारात्मक सोच के साथ अपने लेखन के द्वारा सामने लाना चाहिए । वर्तमान परिवेश में साहित्यकारों को निराशा, हताशा, वैमनष्यता पैदा करने वाले लेखन से बचना चाहिए । साहित्यकारों के सृजन के कथ्य और शिल्प के ताने–बाने में हर प्रकार से सूक्ष्म आशावाद गूंथा हुआ दिखाई देना चाहिए । उनका लेखन संकेत देना चाहिए कि दुनिया बदल रही है और उसमें मौजूद तमाम बुराइयों के बावजूद उसे और बेहतर बनाया जा सकता है ।

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सदियों तक हमारी परंपरा में साहित्य को सिर्फ आनन्द का ही नहीं ज्ञान का भी प्रकार माना जाता था । आधुनिकता की झोंक में और विज्ञान के बढ़ते विशेषीकरण के दौर के साहित्य और साहित्यकार ही ऐसा जरिया बचता है जहां मनुष्य को खंड–खंड में नहीं संपूर्णता में देखने की कोशिश होती है । साहित्य भी समय, सच्चाई, समाज, व्यक्ति को जानने, समझने की विधा है । वर्तमान परिवेश में साहित्य और समय के बीच खासा जटिल सम्बन्ध व संवाद होता है । साहित्यकारों के लिए कई तरह के सम्बन्ध एक साथ हो सकते है । वर्तमान में जब नागरिक स्वतंत्रताओं पर रोजाना किसी न किसी बहाने जमकर हमले हो रहे हैं, साहित्यकारों का दायित्व इस स्वतंत्रता के बचाव के लिए आवजÞ उठाना भी है । वर्तमान परिवेश विद्रूपताओं, विरोधों का है, सर्वग्रासी अमानवीयता छाई हुई है । ऐसे दुरावसर पर साहित्यकारों का दायित्व होता है वे समाज को कठिन से कठिन समय ओर परिस्थिति में मनुष्यता बनाये रखने को प्रेरित करें ।
साहित्यकार समाज का पथ ( प्रदर्शक होता है। उसका पूरा व्यक्तित्व तब निखरता है जब वह समग्र रूप से परिवर्तन चाहने वाली जनता के आगे पुरोहित की तरह आगे बढ़ता है। इसी रूप में वह हिन्दी(साहित्य को उन्नत एंव समृद्व बना सकेगा। साहित्यकार को मानव(समाज के लिए कल्याणकारी दृष्टिकोण को सदैव ध्यान में रखना चाहिए ।

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डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी जी का मानना था कि साहित्यकार को मनुष्यता का उन्नायक होना चाहिए । जब तक वह मानव मात्र के मंगल के लिए नहीं लिखता, तब तक वह अपने दायित्व से पलायन करता है । साहित्यकार अपने साहित्य में वर्तमान को सामने रखकर भविष्य की रूपरेखा तय करता है । समाज की, राष्ट्र की सोयी हुई विवेक–शक्ति को जागृत करना साहित्यकार का बुनियादी लक्ष्य है । अपने समय के सच को उजागर करने के साथ ही ऐसा साहित्यकार सदैव प्रासंगिक बना रहता है तथा जनमानस को आलोक स्तम्भ के समान दिशा और प्रकाश देता है । वो जरूरत पड़ने पर हमें हमारे इतिहास से परिचित कराता है ।
किसी भी राष्ट्र के निर्माण और उसके उत्थान में अन्य कारकों की तरह उसका साहित्य भी एक बड़ी और महत्वपूर्व भूमिका निभाता है और किसी भी देश को उत्कृष्ट और यथार्थ साहित्य देने का दायित्व उसके साहित्यकारों का ही होता है । इतिहास गवाह रहा है कि जब–जब कोई राष्ट्र अपने पथ से भटका तो उसके साहित्यकारों ने ही उसे राह दिखाई । जब कभी भी वो झुका तो उसके साहित्यकारों ने ही उसका पुनरुत्थान किया । ज्यादा दूर जाने की जरूरत नहीं । जब भारत अपनी स्वतंत्रता के लिए संघर्ष कर रहा था तो वो प्रेमचन्द, निराला, दिनकर, भारतेन्दु हरिश्चन्द्र जैसे साहित्यकार ही थे जिन्होंने अपनी रचनाओं से राष्ट्र को एक नई ऊर्जा, एक नया जोश, एक नवीन दृष्टि दी । साहित्यकार वक्त–वक्त पर समाज की तंद्रा, उसकी जड़ता को तोड़ने का काम करते हैं । जरूरत पड़ने पर वो राष्ट्र को एक नई चेतना, एक नया प्रवाह देते हैं । साहित्यकारों ने ही जरूरत पड़ने पर राष्ट्र के निर्माण, पुनर्निर्माण और उत्थान की नींव रखी है ।
साहित्यकार ही संस्कृति के संवाहक, संरक्षक एवम पोषक होते हैं । एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में नैतिक मूल्यों का हस्तांतरण अपने लेखन के द्वारा करते हैं । वर्तमान परिवेश की आवश्यकतानुरूप साहित्य सृजन करना साहित्यकारों का दायित्व है । साहित्य सृजन के साथ–साथ साहित्य धर्म अपनाना आज की जरूरत है । कुल मिला कर कहा जा सकता है कि वर्तमान परिवेश में साहित्यकारों का दायित्व इस तरह के सृजन से है जिसमें लोकतंत्र एवम समाज का व्यापक चेहरा पहचाना जाए । उनका सृजन ऐसा दर्पण बन पाए कि जिसमें समाज के सभी हिस्सों के चेहरे दिखाई पड़े और देश, समाज में सत्यम, शिवम, सुंदरम की स्थापना की भावना दृष्टिगोचर हो ।

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