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भूख ! बड़ा बेहद निर्मम शब्द है “भूख” इंसानियत को खा जाती है : निशा अग्रवाल 

 

भूख

 “भूख”शब्द छोटा पर इतना गहरा कि कब मानव को दानव बना दे पता ही नहीं चलता। बड़ा बेहद निर्मम शब्द है “भूख”
भूख देखी है तुमने ?? या महसुस की है ?? या तो बेहद स्वार्थी होती है या बेहद दर्दनाक। जिनके उदर भरे हों उन्हें लगती है तो इंसानियत को खा जाती है।
स्वार्थ का नंगा नाच नचाती है। और जब उदर रिक्त हो तो मानव को पशु बना देती है । वो छीनता है, झपटता है, चाटता है कुड़ों का ढेर।।
ये प्रकृति का नियम है जब  सब सीमा में हो तो स्थिरता बनी रहती है। लेकिन जब सीमा का अतिक्रमण हो तो सारी व्यवस्थाएं  दम तोड़ देती है। इंसान का लालच उसे इतना स्वार्थी, इतना पतित बना देता है कि वो अपने नैतिक मूल्यों को अपने जीवन से दूध में पड़ी मख्खी की तरह निकाल फेंकता है। एक वर्ग की ये अंधी भूख इतनी तीव्र हो जाती है कि दुसरा वर्ग भूखा रह जाता है। और ये भूख उसे पशु से बदतर बना देती है।
जब हम छोटे थे मांँ से कहते – मांँ भूख लगी है और मांँ खाना परोस देती । स्कुल से आते तो कहने से पहले  ही मांँ मुंह में निवाले डाल देती। कहने का तात्पर्य ये है कि हम संभ्रांत घरवालों ने कभी महसूस ही नही किया कि असल में भूख होती क्या है?
जब बड़े हुए कभी व्रत उपवास किया तो दिमाग को पता होता था कि 12 बजे कृष्ण जन्म लेगें और हम छप्पन भोग खाएंगे। कभी जाना ही नही भूख भयावह भी हो सकती है।।
और जब इंसान को रोटी की जगह धन की भूख लगती है तो उसका पेट अन्धे कुएंँ की भांति गहरा हो जाता है। जिसमें जितना भी डाल दो कभी पता ही नही चलता। उसकी भूख बढती जाती है, वो अपने सारे मूल्यों को ताक पर रख कर, खुद के इंसान होने के भाव तक को भूल कर अपने से कमजोरों का खून चूसने लगता है। इनका अंधा कुआँ दुसरे वर्ग के इंसानों से दो वक्त की तो क्या एक वक्त की रोटी भी छीन लेता है। फिर एक तरफ होता है बडे़ बड़े *दांतों वाला* खून चूसने वाला समाज और दुसरी तरफ भीतर तक धंसी *आंतों वाला* भूखा समाज।।
जब मैं थोड़ी बड़ी हुई तो शहर जाने का मौका मिला। वहां एक दिन हम होटल में खाना खाने गए। खाना खाया, बाहर आई तो जो दृश्य जीवन में पहली बार देखा, मेरी रूह तक कांप गयी। होटल के बाहर कुडे़दान के पास बचा झूठा फेंका खाना एक अधनंगे बच्चों का भोजन बन रहा था। वो झपट रहे थे, बिना देखे मुंह में डाल रहे थे। क्या है? कोई मतलब नही। कैसा है? कोई फिक्र नही। जिह्वा का स्वाद तो उदर वाले देखते हैं, यहां तो पीठ और पेट चिपक कर एक हो गये हैं।। उन्हें तो मशीन चलाने हेतु ईंधन भर चाहिए।। सितम ये है कि गली के कुत्ते भी इनपर गुर्रा रहे थे। मानो कह रहे हो कि फेंका खाना तो हमारा हिस्सा होता है, हमें दो वर्ना हम तुम्हें खा जाएंगे। छोटे मासूम तो एकाध टुकड़े भी नही उठा पा रहे थे। झूठन कम थी भीड़ ज्यादा।
दुःखद, अत्यंत दुःखद और दयनीय स्थिति। यहां पशु और इंसान के बीच का भेद मिट सा गया था। तभी नजरें घूमी और दूर तक फैली गगनचुंबी अट्टालिकाओं पर पड़ी। मानों सब हाथों में हाथ मिलाए बड़े बड़े दांत निकाले खीसें निपोर  रही हों। उनके अट्टहास का स्वर मेरे कानों को चुभने लगा।
मैने डर से अपने दोनो हाथ कानों पर रख लिए। नजरें झुकीं तो खुद का अंतरमन टटोलने लगीं। फिर एक प्रश्न। क्या हम कम दोषी हैं? हम जो नज़रअंदाज किए किस्मत को दोष देते हुए, कर्मो की दुहाई देकर आत्मसंतुष्ट हो निकल जाते है। उन्हीं हालातों पर उन्हें छोड़कर।।
एक दिन सड़क पर बड़ा हल्ला उठा। एक आवाज जिसने सबका ध्यान अपनी ओर खींच लिया- चोर चोर पकड़ो चोरऽऽऽऽ। और फिर एक भीड़ जो किसी की सगी नही, जिसकी आंखों के सामने कोई बाहुबली किसी का सरेआम कत्ल कर दे या बलात्कार, अंधी गुंगी अपाहिज होकर खड़ी रहती है, वही भीड़ अचानक जाग उठी। कृशकाय, चिथड़ों में लिपटे उस मासूम को पकड़ थप्पड़ो और गालियों की बौछार कर देती है। साले चोर इन्हीं के कारण सड़क पे निकलना मुश्किल हो गया है, सारा माहौल बिगाड़ रखा है। भीड़ ने अपने हाथ साफ किए अन्दर की झल्लाहट निकाली। पर वो बच्चा चुपचाप चिथड़ों में वो पैकेट छुपाए आंखों से पानी बहाता मार खाता रहा। पर हाथ पैकेट पर लपेटे रखा। तभी किसी ‘इंसान’ ने उस न्यायप्रिय भीड़ से पूछा भई क्या चुराया है इसने। आवाज आई मेरी दुकान से ब्रेड का पैकेट लेकर भागा है। उसने पैसे चुकाए और भीड़ छंटने लगी। वो बच्चा क्षणिक कृतज्ञता का भाव लिए एक नजर उस इंसान पर डाल अपने रास्ते लपका। वो भी न जाने क्युं पर उसके पीछे हो लिया। शायद कुछ था उन नजरों में जो उसे खींच रहा था। थोड़ी देर में एक टुटी, अधमरी सी झोपड़ी का फटा पर्दा सरका वो अंदर गया और इतनी मेहनत से लायी उस ब्रेड का एक टुकड़ा अपने छोटे भाई के मुंह में ठूंस सा दिया। एक टुकड़ा हाथ में थमा बाकी पैकेट लिए वो खटिया की तरफ मुड़ा और अपनी बीमार भुखी मां के मुंह में ब्रेड का टुकड़ा पानी में भींगा डाल दिया। भूखा तो वो भी होगा पर अपनों को खिलाने की तड़प  में खुद को भूल सा गया था। इससे ज्यादा देख पाने की ताकत नही थी उसमें शायद। अपने कुर्ते की जेब में हाथ डाल जितने थे सब निकाल कर उस बच्चे को थमा वो नम आंखों और बोझिल ह्दय से बाहर निकल गया।।।
उफ। कितनी निर्मम होती है ये भूख। इस भूख को मिटाने में इंसान मिट जाता है।, पर भूख नही मिटती। जिस संतुष्टी की तलाश में वो पहले दुसरों की थाली छिनता है और बाद में उनका खून चूसता है, वो संतुष्टी उसे कभी नही मिलती। ताउम्र छीन कर भी वह भूखा ही रह जाता है।
अपने आपको निर्दोष साबित करने के लिए जो तुम दान, धर्म  पूजा अनुष्ठान, भंडारे करते हो न  मत करो। मत बांटो कम्बल मत खिलाओ मुफ़्त का खाना। मंदिरों में सोने के सिंहासन, सोने के छत्र, चांदी का रथ या नोटों से भराबैग मत चढाओ। ईश्वर को जरूरत नही।। ये सब उसी  का है। कुछ उसने दिया है कुछ तुमने दुसरों का छीना है। तो दाता या विधाता बनने की कोशिश मत करो। बस इंसान बन जाओ। करना है तो इतना करो कि ईमानदारी  से जितना कमा सकते हो कमाओ।। भ्रष्टाचार मत फैलाओ। अपनी अंधी दौड़ में कमजोरों को मत कुचलो।
प्रकृति के पास इतना है कि वो अपनी हर संतान का पालन कर सके। तुम बस अपनी थाली खाओ। दुसरों की मत छीनों। तुम भी दानव नही बनोगे और कोई पशु बनने से बच जाएगा।।।
अन्त में…
ईश्वर ने इस सृष्टि में पशु पक्षी कीड़े मकोड़ों सबको पेट देने के साथ साथ भोजन की भी व्यवस्था की है फिर हम तो इंसान है। हम तो धरती से पैदा करना जानते है। हम कैसे भूखे रह सकते है। हम सबके हिस्से का अन्न पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है बशर्ते कि हम अपने हिस्से का खाएं।
संग्रह उतना ही करो जो सडे़ नही। आज आपका किया गया अनुचित संग्रह एक वर्ग को वर्तमान में रोटी का मोहताज बना देता है साथ ही आपके कुल को भी अपाहिज।
साईं इतना दिजीए जामें कुटुम्ब समाय।
मैं भी भूखा न रहूं साधू न भूखा जाय।।
हरिॐ
निशा अग्रवाल
निशा अग्रवाल
धरान

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