अब ढूंढो एक प्रेम का नगर जहां न घृणा हो, न हो द्वेष, न कपट हो, न कोई क्लेश, : अंशु झा
रे पंछी अब ढूंढो,
एक प्रेम का नगर,
जहां न घृणा हो,
न हो द्वेष,
न कपट हो,
न कोई क्लेश,
रे पंछी अब ढूंढो,
एक प्रेम का नगर ।
जहां स्वच्छ हवा हो,
स्वच्छ हो जल,
मधुर सांस भरुं पल पल,
प्रकृति की मनोरम दृश्य रहे,
झर–झर झरना और नदी बहे,
रे पंछी अब ढूंढो,
एक प्रेम का नगर ।
न हो वहां कोई महल अटारी,
अमिर नहीं कोई,
और न ही भिखारी,
झोपडी हो वहां छोटी–छोटी,
मेहनत से मिले,
दो वक्त की रोटी,
रे पंछी अब ढूंढो,
एक प्रेम का नगर ।
जहां एक आपस में हो सद्भाव,
जब कोई मिले,
पूछे हाल चाल,
न हो किसी का मन मैला,
सबके हृदय में हो,
परोपकार का भाव,
रे पंछी अब ढूंढो,
एक प्रेम का नगर ।
जहां न त्रास हो,
न हो दमन,
सब रहे संतुष्ट,
प्रफुल्लित रहे मन,
लोभ की न हो क्षुधा,
जीवन जीने की हो,
हर सुविधा,
रे पंछी अब ढूंढो,
एक प्रेम का नगर ।
जहां वृद्ध का न हो तिरस्कार,
बच्चों को भी मिले उचित प्यार,
स्त्री–पुरुष हो एक समान,
कंधे से कंधा मिला,
करे हर काम,
रे पंछी अब ढूंढो,
एक प्रेम का नगर ।



