Wed. Aug 5th, 2020
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अब ढूंढो एक प्रेम का नगर जहां न घृणा हो, न हो द्वेष, न कपट हो, न कोई क्लेश, : अंशु झा

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रे पंछी अब ढूंढो,

एक प्रेम का नगर,

जहां न घृणा हो,

न हो द्वेष,

न कपट हो,

न कोई क्लेश,

रे पंछी अब ढूंढो,

एक प्रेम का नगर ।

जहां स्वच्छ हवा हो,

स्वच्छ हो जल,

मधुर सांस भरुं पल पल,

प्रकृति की मनोरम दृश्य रहे,

झर–झर झरना और नदी बहे,

रे पंछी अब ढूंढो,

एक प्रेम का नगर ।

न हो वहां कोई महल अटारी,

अमिर नहीं कोई,

और न ही भिखारी,

झोपडी हो वहां छोटी–छोटी,

मेहनत से मिले,

दो वक्त की रोटी,

रे पंछी अब ढूंढो,

एक प्रेम का नगर ।

जहां एक आपस में हो सद्भाव,

जब कोई मिले,

पूछे हाल चाल,

न हो किसी का मन मैला,

सबके हृदय में हो,

परोपकार का भाव,

रे पंछी अब ढूंढो,

एक प्रेम का नगर ।

जहां न त्रास हो,

न हो दमन,

सब रहे संतुष्ट,

प्रफुल्लित रहे मन,

लोभ की न हो क्षुधा,

जीवन जीने की हो,

हर सुविधा,

रे पंछी अब ढूंढो,

एक प्रेम का नगर ।

जहां वृद्ध का न हो तिरस्कार,

बच्चों को भी मिले उचित प्यार,

स्त्री–पुरुष हो एक समान,

कंधे से कंधा मिला,

करे हर काम,

रे पंछी अब ढूंढो,

एक प्रेम का नगर ।

अंशु झा, काठमांडू।

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