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चीन के ऋणजाल में उलझता नेपाल : ललित झा

 

ललित झा, मधुबनी । भारत के पड़ोसी तथा दुनिया के अन्य देशों को, चीन किस तरह से विकास का झूठा सपना दिखाता है और फिर आर्थिक सहयोग के नाम पर अपने ऋण जाल में फँसाता है, उसका एक जीवंत उदाहरण हैं, नेपाल वायु सेवा निगम द्वारा हाल ही में सेवा से हटाये गये छः चीनी विमानों का मामला। दरअसल हुआ ये है कि अभी कुछ ही दिनों पूर्व, नेपाल के नागरिक उड्डयन एबम् पर्यटन मंत्रालय के निर्देश पर नेपाल वायु सेवा निगम ने आंतरिक उड़ान के लिए चीन से खरीदे गये छह एम ए 60 और वाई 12 विमान को सेवा से हटाने का फैसला किया है। करीब आठ वर्ष पूर्व, सरकार ने आंतरिक उड़ान सेवा को मजबूत करने के लिए, चीन से छह विमान ख़रीदा था, ताकि नेपाल के अंदर वायु सेवा को गतिशील और सुचारु बनाया जा सके।

नेपाल को विमान बेचने के लिए चीन ने नेपाल नागरिक उड्डयन प्राधिकरण को दो विमान बतौर अनुदान मे देने का पेशकश किया साथ ही शेष चार विमानों की राशि भी चीन के EXIM बैंक ने बतौर सहूलियत ऋण के रूप में प्रदान करने की पेशकश किया,, यानी नेपाल को तत्काल इसमें कुछ पैसा नहीं लगाना था। इस आकर्षक प्रलोभन में CAAN ने चीन से विमान खरीदने का समझौता कर लिया जबकि इस विमान के गुणवत्ता और रख रखाव को लेकर विशेषज्ञ कई बार चेतावनी दे चुके थे। बाबजूद इसके चीन से विमान खरीदा गया। समझौते के अनुसार चीन ने छह में से दो विमान बतौर अनुदान में साथ ही शेष चार विमान खरीद के लिए कुल 4 अरब 32 करोड़ रुपया बतौर सहूलियत ऋण के रूप मे कर्ज दिया। नेपाल के नागरिक उड्डयन मंत्रालय द्वारा जारी तथ्यों के अनुसार यह विमान जबसे संचालन में आया, तभी से भारी आर्थिक घाटा मे चल रहा था। आमदनी से अधिक इसका संचालन खर्च बहुत अधिक था, जिस कारण वायु सेवा निगम को काफी आर्थिक नुकसान हो रहा था। तथ्यों के अनुसार बिगत के तीन बित्तीय बर्ष में, इस विमान के संचालन में, नेपाल वायु सेवा निगम को करीब 1 अरब 90 करोड़ का घाटा हुआ है और यदि आर्थिक घाटा की गणना बित्तीय बर्ष 2071-72 से किया जाय तो,, आर्थिक घाटा 4 अरब के करीब हो जाता है। अंततः प्रति वर्ष हो रहे इस आर्थिक नुकसान से तंग आकर , नेपाल वायु सेवा निगम को, इस विमान को सेवा से हटाने का फैसला करना पड़ा है। और इसके बदले नये विमान खरीदने पर विचार हो रहा है।

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चीन द्वारा प्रदत्त सहूलियत ऋण के जाल की कहानी यहीं खत्म नही होती हैं बल्कि यहाँ से चीन के ऋण कूटनीति का नया खेल आरंभ होता है। विमान खरीद के समय हुए समझौते के अनुसार, वर्ष 2020 यानी बि. सं. २०७७ तक, चीन द्वारा सहूलियत ऋण के रूप में दिये गये 4 अरब 32 करोड़ रुपया का किस्त नहीं देना था, लेकिन वर्ष 2021 से नेपाल को इस विशाल धन राशि को पूर्व से तय किश्तों में लौटाना होगा। अब गौरतलब बात यह है कि इस विमान के संचालन में अबतक नेपाल वायु सेवा निगम को पहले ही 4 अरब से अधिक का आर्थिक घाटा हो चुका है, ऊपर से 4 अरब 32 करोड़ के ऋण का बोझ भी नेपाल पर लद गया है। जिस कारण वायु सेवा निगम की आर्थिक हालत खस्ताहाल है।

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इस संदर्भ में एक लोकप्रिय मुहावरा हैं- “बैल तो बैल गया, साथ में नौ हाथ का पगहा भी”, चीन के आर्थिक सहायता की सच्चाई यही है। इसी तरह का मामला श्रीलंका के साथ हमबंटोटा बंदरगाह निर्माण मे भी हुआ था। श्रीलंका सरकार को चीन ने बंदरगाह निर्माण के लिए सहूलियत ऋण के रूप में, विशाल धनराशि आर्थिक सहयोग दिया था, और बाद में तय शर्तों के अनुसार राशी नहीं लौटाने पर, मजबूर होकर श्रीलंका को अपने बंदरगाह को 99 वर्षों की लीज पर चीन को देना पड़ा था । कमोवेश ऐसा ही मलदीव और पाकिस्तान के साथ भी हुआ है। चीन की अति महत्वाकांक्षी BRI परियोजना का नेपाल भी एक साझेदार देश है। इस परियोजना के तहत नेपाल में भी चीन, विशाल धन राशी, बतौर सहूलियत ऋण के रूप में, आर्थिक सहयोग दे सकता है, जिसका परिणाम क्या होगा यह हम सभी जानते हैं। आर्थिक विशेषज्ञों ने पूरे विश्व में चीन के आर्थिक निवेश का विश्लेषण किया है जिससे प्राप्त तथ्यों के आधार पर कहा जा सकता है कि चीन के आर्थिक सहयोग से, दुनियाँ का कोई भी देश, आज तक समृद्ध और सुखी नही हुआ है, बदले में मजबूरन उसे कई तरह का अनचाहा समझौता करना पड़ता है। इसलिए दक्षिण एशिया के देशों को सचेत रहना चाहिए।

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ललित झा, मधुबनी । (भारत नेपाल संबंध के जानकार और बरिष्ठ पत्रकार है)

 

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