Thu. Oct 22nd, 2026
English मे देखने के लिए क्लिक करें

मधुश्रावणी पूजा में वैज्ञानिकता

 

 

अंशु झा

हमारे पूर्वज बहुत ही समझदार और ज्ञानी थे जिन्होंने अपनी संस्कृति के माध्यम से अपने संतति के लिये किसी न किसी प्रकार से शिक्षा को छोड गये हैं । और प्रत्येक त्योहारों में वैज्ञानिकता छुपी हुई है । उसी में मधुश्रावण्ी व्रत भी आता है । मधुश्रावणी पर्व मिथिलांचल में प्रत्येक वर्ष श्रावण माह के कृष्ण पक्ष पन्चमी तिथि से प्रारम्भ होकर शुक्ल पक्ष के तृतीया तिथि तक मनाया जाता है । यह पर्व मिथिलांचल के ब्राम्हण, कायस्थ, क्षत्रि, और वैश्य जाति के लोग बडे ही हर्षोल्लास के साथ मनाते हैं । मिथिलांचल अपनी संस्कृति और त्योहार को लेकर विश्व में प्रसिद्ध है । मधुश्रावणी पूजा भी उसमें से एक महत्वपूर्ण त्योहार है जिसे नवविाहिता धूमधाम से मनाती है । इस व्रत का अनुष्ठान १४ दिनों तक का होता है जो मिथिलांचल के विभिन्न त्योहारों में सबसे अधिक दिनों तक मनाये जाने वाला व्रत है । इस व्रत के माध्यम से विशेष रुप से नवविाहिता को कामशास्त्र के साथ साथ एक कुशल गृहिणी होने का प्रशिक्षण दिया जाता है ।

 

कामशास्त्र एक ऐसा विषय है जिसका विश्लेषण हमारे समाज में नहीं के बराबर होता है । अन्य विषयों पर लोग काफी चर्चा करते हैं पर यह विषय हमारे समाज में उपेक्षित जैसा बना हुआ है । अब इसे अनुशासन कहें या जो भी । परन्तु हमारे समाज में इस विषय के मामले में लोग अन्धकार में ही होते । पर हमारे पूर्वज बहुत ही चतुर थे । उन्होंने बडे ही चातुर्यता के साथ वह त्योहार का निर्माण कर डाले जो इस विषय को केन्दीत कर किया जाने लगा ।

यह भी पढें   सऊदी अरब के तेल क्षेत्र पर ड्रोन हमला: एक नेपाली सहित दो विदेशी श्रमिकों की मौत

तीन चार दशक पूर्व तक हमारे समाज में बाल विवाह होता था । वह दम्पति गाह्रस्थ जीवन से अनभिज्ञ होते थे । उन्हें अपने परिवार चलाने के लिये किसी भी प्रकार का ज्ञान नहीं होता था । और परिवार चलाने में पुरुष से भी अधिक महिला का योगदान होता है । मेरे खयाल से बस इसी को ध्यान में रखते हुये यह मधुश्रावणी पर्व का प्रारम्भ हुआ होगा । क्योंकि इसमें १४ दिनों तक जो कथा वाचन और पूजा होती है वह काम और घर गृहस्थी से ही जुडा हुआ है । इस पूजा में उन हरेक सूक्ष्म से सूक्ष्म विषयों का वर्णन किया जाता है जिससे नवविवाहिता अनभिज्ञ होती है । इस पर्व में घर के पुरुषों की सहभागिता नहीं के बराबर रहती है । यह पूजा अपवाद ही है जिसमें पण्डित महिला ही होती है । ताकी वह सारी गोप्य बातें नवविाहिता को समझा पाएं जो उनके जीवन यापन में सहयोगी होगी । विशेष रुप से इस पर्व में विषहारा अर्थात नाग नागिन की पूजा होती है । क्योंकि इस समय सर्प का प्रकोप अधिक बढा होता है तो मिथिलांचल में १४ दिनों तक उनका गुनगान कर उनके भय से बचने का उपाय किया जाता है ।

यह भी पढें   राष्ट्रीय सरस मेला-2026: एक दृष्टि में : गौरीशंकर वैश्य

इस पर्व में महादेव अर्थात् शिव और पार्वती को नायक नायिका बनाकर बहुत सारे कथा की रचना की गई है । कुछ कथा तो शिवपुराण से है परन्तु कुछ कथा खुद से बनाई गई है । जिसका वाचन मधुश्रावणी के १४ दिनों की अवधि में की जाती है । इसमें विभिन्न दोहा, बिनी, चौपाई के माध्यम से शिव और पार्वती के विभिन्न अंग प्रत्यंग का वर्णन होता है । कथा वाचिका हरेक उन पहलू का परत खोलती है जिसके सम्बन्ध में समाज में खुले आम बर्णन करने की अनुमति नहीं होती है । प्रत्येक शाम को नवविवाहिता फूल एकत्रित करने के लिये पुष्पवाटिका के तरफ अपनी संगी सहेलियों के साथ जाती है जिसमें कुछ सहेलियां बडी तथा अनुभवी भी होती है । वह भी उस नवविाहिता को बहुत कुछ सीखाती है । मधुश्रावणी के अन्तिम दिन नवविवाहिता का धैर्य का भी परीक्षण होता है । उसमें घी के दीपक से नवविवाहिता के घुटनों व पैरों पर दागा जाता है । हांलाकि इस प्रथा में अब परिमार्जन कर शीतल टेमी का प्रावधान कर दिया गया है ताकी नवविवाहिता को किसी भी प्रकार का कष्ट न हो ।

यह भी पढें   आज का पंचांग: आज दिनांक 20 अक्टुबर 2026 मंगलवार शुभसंवत् 2083

इसी प्रकार मैं अपने पिताजी से एकबार पूछ बैठी थी, यह मधुश्रावणी पर्व क्यों मनाया जाता है ? तो उन्होंने मुझे बताये थे कि इस श्रावण महीना में धान रोपनी का लगभग अन्त हो जाता है । इस खेती पाती में महिला भी घर में बहुत काम कर थकी होती हंैं । उस समय मनोरन्जन का भी कोई साधन नहीं था । श्रावण माह का समय वैसे भी बर्षा का होता है तो वह कहीं जा भी नहीं सकती थी । इसलिये उन्होंने इस प्रकार का पर्व का निर्माण किया होगा ताकी यह समय व्यतित होने में सहजता हो और कुछ मनोरन्जन भी हो जाय । वैसे यह पर्व शिक्षाप्रद है ।

वैसे वर्तमान युग में इतने लम्बे समय तक व्रत का अनुष्ठान कुछ दुरुह सा हो गया है । नवविाहिता अब छोटी नहीं होती, प्रायशः नौकरी कर रही होती है जिसके लिये यह १४ दिवसीय व्रत का अनुष्ठान करना असम्भवा सा हो गया है । फिर भी अभी तक यह संस्कृति निभाई जा रही है । औपचारिक ही सही परन्तु प्रत्येक नवविाहिता इस व्रत को अभी तक कर रही है । हमारी हरेक संस्कृति और परम्परा सराहनीय है । इसको सदैव साथ लेकर चलना चाहिये । अगर उसमें कुछ कठिनाई अनुभव हो तो उसका परिमार्जन किया जा सकता है ।

About Author

आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You may missed

WP2Social Auto Publish Powered By : XYZScripts.com