Wed. Aug 5th, 2020

मधुश्रावणी पूजा में वैज्ञानिकता

  • 439
    Shares

 

अंशु झा

हमारे पूर्वज बहुत ही समझदार और ज्ञानी थे जिन्होंने अपनी संस्कृति के माध्यम से अपने संतति के लिये किसी न किसी प्रकार से शिक्षा को छोड गये हैं । और प्रत्येक त्योहारों में वैज्ञानिकता छुपी हुई है । उसी में मधुश्रावण्ी व्रत भी आता है । मधुश्रावणी पर्व मिथिलांचल में प्रत्येक वर्ष श्रावण माह के कृष्ण पक्ष पन्चमी तिथि से प्रारम्भ होकर शुक्ल पक्ष के तृतीया तिथि तक मनाया जाता है । यह पर्व मिथिलांचल के ब्राम्हण, कायस्थ, क्षत्रि, और वैश्य जाति के लोग बडे ही हर्षोल्लास के साथ मनाते हैं । मिथिलांचल अपनी संस्कृति और त्योहार को लेकर विश्व में प्रसिद्ध है । मधुश्रावणी पूजा भी उसमें से एक महत्वपूर्ण त्योहार है जिसे नवविाहिता धूमधाम से मनाती है । इस व्रत का अनुष्ठान १४ दिनों तक का होता है जो मिथिलांचल के विभिन्न त्योहारों में सबसे अधिक दिनों तक मनाये जाने वाला व्रत है । इस व्रत के माध्यम से विशेष रुप से नवविाहिता को कामशास्त्र के साथ साथ एक कुशल गृहिणी होने का प्रशिक्षण दिया जाता है ।

 

कामशास्त्र एक ऐसा विषय है जिसका विश्लेषण हमारे समाज में नहीं के बराबर होता है । अन्य विषयों पर लोग काफी चर्चा करते हैं पर यह विषय हमारे समाज में उपेक्षित जैसा बना हुआ है । अब इसे अनुशासन कहें या जो भी । परन्तु हमारे समाज में इस विषय के मामले में लोग अन्धकार में ही होते । पर हमारे पूर्वज बहुत ही चतुर थे । उन्होंने बडे ही चातुर्यता के साथ वह त्योहार का निर्माण कर डाले जो इस विषय को केन्दीत कर किया जाने लगा ।

यह भी पढें   उत्तर प्रदेश की कैबिनेट मन्त्री कमला रानी की कोरोसंक्रमण से मौत

तीन चार दशक पूर्व तक हमारे समाज में बाल विवाह होता था । वह दम्पति गाह्रस्थ जीवन से अनभिज्ञ होते थे । उन्हें अपने परिवार चलाने के लिये किसी भी प्रकार का ज्ञान नहीं होता था । और परिवार चलाने में पुरुष से भी अधिक महिला का योगदान होता है । मेरे खयाल से बस इसी को ध्यान में रखते हुये यह मधुश्रावणी पर्व का प्रारम्भ हुआ होगा । क्योंकि इसमें १४ दिनों तक जो कथा वाचन और पूजा होती है वह काम और घर गृहस्थी से ही जुडा हुआ है । इस पूजा में उन हरेक सूक्ष्म से सूक्ष्म विषयों का वर्णन किया जाता है जिससे नवविवाहिता अनभिज्ञ होती है । इस पर्व में घर के पुरुषों की सहभागिता नहीं के बराबर रहती है । यह पूजा अपवाद ही है जिसमें पण्डित महिला ही होती है । ताकी वह सारी गोप्य बातें नवविाहिता को समझा पाएं जो उनके जीवन यापन में सहयोगी होगी । विशेष रुप से इस पर्व में विषहारा अर्थात नाग नागिन की पूजा होती है । क्योंकि इस समय सर्प का प्रकोप अधिक बढा होता है तो मिथिलांचल में १४ दिनों तक उनका गुनगान कर उनके भय से बचने का उपाय किया जाता है ।

यह भी पढें   अर्जुनधारा में फिर से लकडाउन

इस पर्व में महादेव अर्थात् शिव और पार्वती को नायक नायिका बनाकर बहुत सारे कथा की रचना की गई है । कुछ कथा तो शिवपुराण से है परन्तु कुछ कथा खुद से बनाई गई है । जिसका वाचन मधुश्रावणी के १४ दिनों की अवधि में की जाती है । इसमें विभिन्न दोहा, बिनी, चौपाई के माध्यम से शिव और पार्वती के विभिन्न अंग प्रत्यंग का वर्णन होता है । कथा वाचिका हरेक उन पहलू का परत खोलती है जिसके सम्बन्ध में समाज में खुले आम बर्णन करने की अनुमति नहीं होती है । प्रत्येक शाम को नवविवाहिता फूल एकत्रित करने के लिये पुष्पवाटिका के तरफ अपनी संगी सहेलियों के साथ जाती है जिसमें कुछ सहेलियां बडी तथा अनुभवी भी होती है । वह भी उस नवविाहिता को बहुत कुछ सीखाती है । मधुश्रावणी के अन्तिम दिन नवविवाहिता का धैर्य का भी परीक्षण होता है । उसमें घी के दीपक से नवविवाहिता के घुटनों व पैरों पर दागा जाता है । हांलाकि इस प्रथा में अब परिमार्जन कर शीतल टेमी का प्रावधान कर दिया गया है ताकी नवविवाहिता को किसी भी प्रकार का कष्ट न हो ।

इसी प्रकार मैं अपने पिताजी से एकबार पूछ बैठी थी, यह मधुश्रावणी पर्व क्यों मनाया जाता है ? तो उन्होंने मुझे बताये थे कि इस श्रावण महीना में धान रोपनी का लगभग अन्त हो जाता है । इस खेती पाती में महिला भी घर में बहुत काम कर थकी होती हंैं । उस समय मनोरन्जन का भी कोई साधन नहीं था । श्रावण माह का समय वैसे भी बर्षा का होता है तो वह कहीं जा भी नहीं सकती थी । इसलिये उन्होंने इस प्रकार का पर्व का निर्माण किया होगा ताकी यह समय व्यतित होने में सहजता हो और कुछ मनोरन्जन भी हो जाय । वैसे यह पर्व शिक्षाप्रद है ।

यह भी पढें   सभामुख सापकोटा के साथ–साथ उनके सभी कर्मचारियों का रिपोर्ट निगेटिव

वैसे वर्तमान युग में इतने लम्बे समय तक व्रत का अनुष्ठान कुछ दुरुह सा हो गया है । नवविाहिता अब छोटी नहीं होती, प्रायशः नौकरी कर रही होती है जिसके लिये यह १४ दिवसीय व्रत का अनुष्ठान करना असम्भवा सा हो गया है । फिर भी अभी तक यह संस्कृति निभाई जा रही है । औपचारिक ही सही परन्तु प्रत्येक नवविाहिता इस व्रत को अभी तक कर रही है । हमारी हरेक संस्कृति और परम्परा सराहनीय है । इसको सदैव साथ लेकर चलना चाहिये । अगर उसमें कुछ कठिनाई अनुभव हो तो उसका परिमार्जन किया जा सकता है ।

आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Loading...
%d bloggers like this: