Sat. Aug 15th, 2020

शादी बोझ या रिश्ता ? : दिव्या तिवारी

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दिव्या तिवारी, कन्टेन्ट राइटर

 

शादी, ये शब्द जब बचपन में सुनते हैं तो एक ही बात याद आती है कि सपनों का राजकुमार होगा या मेरी राजकुमारी होगी ऐसे ख्याल आते है लेकिन जैसे आप बड़े होते जब आपकों पता चलता शादी क्या है? क्यो करनी चाहिए ? कब करनी चाहिए? हमारे सनातन में कहा गया है कि विवाह, जिसे शादी भी कहा जाता है, दो लोगों के बीच एक सामाजिक या धार्मिक मान्यता प्राप्त मिलन है जो उन लोगों के बीच, साथ ही उनके और किसी भी परिणामी जैविक या दत्तक बच्चों तथा समधियों के बीच अधिकारों और दायित्वों को स्थापित करता है। कुछ लोगों की शादी इसलिए होती है की वो युवा अवस्था में प्रवेश कर चुके है क्योकी उनका मानना है की समाज में सदियों से ऐसा होते आ रहे है! कुछ लोग इसलिए शादी करते है कि रिश्तेदारों में छोटे की शादी हो गई इसलिए अब मेरे बेटे की शादी होनी चाहिए, या माँ या बाबु जी बीमार है तो इसलिए बेटे की शादी कर देनी चाहिए ताकि वह परिवार संभाल सके क्या शादी जब एक पवित्र बंधन है तो जिसके लिए ये बंधन बंध रहा उसका निर्णय जरुरी नही है? क्यों कुछ लोगों ने शादी को मजाक बना रखा है? शादी आप समाज के लिए नही करते है. समाज आपके जिम्मेदारियों और रिश्तों को नही निभाता आप खुद निभाते है रिश्ते शादी एक पवित्र बंधन है तो फिर क्यो इस बंधन को आपके गले मे गुलामी की जंजीरों की तरह बान्ध दिया जाता! जिसको इस पवित्र बंधन में बंधना उसका स्वतंत्र निर्णय जरुरी क्यो नहीं है कहते हैं कि
विवाह जीवन का महत्वपूर्ण सत्य है इसलिए एक-दूसरे की भावनाओं को समझने की शक्ति, जीवन भर साथ रहने की प्रतिबद्धता विवाह को समाज के साथ जोडकर चलती है। … दो अलग-अलग व्यक्ति जब समान उद्देश्यों की खातिर साथ रहते हैं तो एक संतुलित सामाजिक व्यवस्था बनती है और जीवन आगे बढता है। इसी जीवन को आगे बढाने के लिए शादी महत्वपूर्ण है। तो इस बंधन में बंधने वाले का निर्णय जरुरी है शादी जैसे पवित्र बंधन को ऐसे किसी के भी उपर थोपना जरूरी नहीं है हो सकता है आप अगर आप अंबानी या टाटा के परिवार के है आपकों ये लेख पढ के हंसी आ सकती है की मै 21वीं सदी शादी के लिए स्वतंत्र निर्णय की बात कर रही हूं लेकिन यह आज भी निचले वर्ग और मध्यवर्गीय परिवार में सिर्फ शादी जैसे पवित्र बंधन को थोपा जाता है जिससे कई जिंदगियां बरबाद होती है आप कितने लोगों की शादी की सही ऐज नही होती फिर भी जिदंगी की खिंचते नजर आते है फिर लोग आपसे सहानूभूति भरते हैं जब कूछ हाथ में नहीं होता है! इस रिश्ते में कई बार झूठ का सहारा लेकर रिश्ते को निभाने और बचाने की थकोशिश की जाती है तो कई बार अपनी कई ख्वाहिशों को भूलकर बस किसी एक के लिए सारी जिन्दगी निकाल दी जाती है। घर-परिवार की खुशियों के लिए अपनी ख़ुशी भूल जानी पड़ती है। लेकिन फिर भी कई त्याग करके भी ये रिश्ता नाम भर का रह जाता है या ख़त्म हो जाता है। कई बार शादी को जात-पात और धर्मो मे उलझा दिया जाता है खैर ये मेरे अपने विचार है! यही शादी फौरन में होती है तो रजिस्टर कराई जाती है लेकिन हमारे यहां की शादी की बात करे किसी रजिस्टर या सर्टीफिकेट के मोहताज नहीं हैं
हमारे यहां के रिश्ते भावनाओं से जुड़े होते हैं लोग पूरा जीवन निभा लेते है बिना किसी प्रमाण के
भारतीय परिवेश में विवाह को महत्वपूर्ण संस्कार माना जाता है। वर्तमान परिवेश में विवाह से जुड़े मायने और रीति रिवाज में भी परिवर्तन आना आरंभ हो गया है।  सप्तपदी यानी सात फेरे लेने की परंपरा आज भी निभाई जाती है। शुभ एवं सुखद वैवाहिक जीवन का आधार हैं सात फेरे जो सात वचनों के साथ लिए जाते हैं। अग्नि के सात फेरे लेकर सात वचनों के साथ दो तन, मन तथा आत्मा एक पवित्र बंधन में बंध जाते हैं।

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दिव्या तिवारी, कंटेंट राइटर

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