शीश चढा दी इस मिट्टी पर : सुरेन्द्र लाभ
परीक्षा जितना दे दो तुम,
पास कभी क्या हो जाओगे ? ,
शीश चढा दी इस मिट्टी पर
खास कभी क्या बन पाओगे ?
माँ तो आखिर माँ होती है,
भाइयों ने ही द्वेष किया ,
ईर्षा , श्ंका सब फैलाया
अपनों ने ही विद्वेष किया ।
रावण को मारा अह्ंकार ने,
कौरव भी न बच पाया ,
हिटलर बदनाम है इस जग में,
गान्धी हर दिल को ज्ँच पाया ।



