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परंपरा की आड़ में हैसियत की बर्बादी : दिव्या तिवारी

 

दिव्या तिवारी, दिल्ली । शादी नाम की रस्म से हम भारतीयों के मोह का जवाब नहीं। यह मोह एक बार फिर खुलकर अपनी नुमाइश करने पर आमादा है। शादी पर दो–दो फिल्में एक के बाद एक हिट हो चुकी हैं, टीवी वाले शादी पर लुटाने के लिए तीन–तीन करोड़ रुपये बांटते फिर रहे हैं। और दिल्ली में दो पॉलिटिकल परिवारों के बीच रिश्ता जुड़ता है तो 100 करोड़ से ज्यादा का बिल बन जाता है, जिसमें एक हेलिकॉप्टर भी शामिल है।
नोट कीजिए कि यह सब ऐसे माहौल में हो रहा है जब हर तरफ महंगाई का रोना है और घनघोर आर्थिक गैरबराबरी के बीच इस मुल्क में सादगी की शादी के लिए बरसों से कोशिशें हो रही हैं। जिन लीडर महोदय के घर यह सौ करोड़ी शादी हुई थी, वह खुद कुछ वक्त पहले महंगाई के खिलाफ बैनर लटकाए साइकिल पर असेंबली की ओर जाते फोटो खिंचवा चुके थे।
लेकिन जब भी शादी का मामला आता है, कोई दूसरी बात मायने नहीं रखती, सिवाय इज्जत और खुशी के। अब तो वे किस्से भी छपने और सुने जाने बंद हो गए हैं, जिनमें तीन कपड़ों में या चार लोगों की मौजूदगी ने शादी हो जाने की बात होती थी। समुदाय और धर्म के लेवल पर जो कोशिशें फिजूलखर्ची रोकने की हो रही थीं, उनका भी कोई खास असर नहीं दिखता। शादियों की भव्यता बढ़ती जा रही है, एक शहरी औसत शादी के आयोजन का बजट इतना हो गया है कि उसमें सैकड़ों गरीबों की शादी निपट सकती हैं। किसी भी परिवार में मकान खरीदने के बाद यह सबसे बड़ा वन टाइम खर्च
परंपरा की पहचान यही हैं और उनके बिना परंपरा जिंदा नहीं रह सकती। दूसरी बात यह कि परंपरा में यह अहमियत शादी को अपने कमिटमेंट के ऐलान का सबसे बड़ा मौका बना देती है। दूसरे शब्दों में, सामुदायिक दिखावे और इज्जत के सारे पैमाने इससे जुड़ जाते हैं। अगर आप की हैसियत ऊंची है, आपके पास पैसा है, तो उसे आप कब दिखाएंगे। जाहिर है शादी में ही। और कहां?
एक औसत भारतीय मानता है कि हैसियत अगर दिखाई न जाए, तो उसका कोई मतलब नहीं होता। कमोवेश दुनिया के सभी लोग ऐसा मानते होंगे, लेकिन हमारे यहां फर्क यह है कि हैसियत न हो तो भी उसे दिखाने की मशक्कत हम करते हैं। क्यों? इसलिए कि शादी को इतनी अहमियत हमारे सिस्टम में मिली है। अगर हमारी कमजोरी उसमें झलक गई, तो इससे बड़े शर्म की कोई बात नहीं हो सकती। परंपरा का तकाजा है, तो इस शर्म से हर हाल में बचना है। परंपरा के पैमाने ऊंचे क्लास को झंडे फहराने का मौका देते हैं और निचले क्लास की मुसीबतों में इजाफा होता जाता है।
कैपिटलिस्ट मार्केट में खर्च की बड़ी महिमा गाई जाती है। अगर लोग अपनी कमाई को खर्च न करें, तो डिमांड नहीं पैदा होगी और इकॉनमी सुस्त पड़ जाएगी। शादियों पर होने वाले खर्च को आप इस लिहाज से ठीक मानें तो मानें, वरना मुझे इसकी तारीफ की कोई वजह नजर नहीं आती। परंपरा के नाम पर इस रिवाज को बढ़ावा देना इसलिए गलत है कि इससे सोसायटी में कोई अच्छी शुरुआत नहीं होती।
ज्यादातर पैसा उन कामों में बर्बाद होता है, जो जवाब में कुछ पैदा नहीं करते। मुझे इस बात से निराशा होती है कि फिजूलखर्ची को रोकने की कोई संजीदा कोशिश अब नहीं हो रही। धार्मिक संस्थाएं भी थक चुकी हैं। सरकार कोई कानून बनाए, ऐसी उम्मीद करना बेकार होगा, क्योंकि जनता की आजादी पर हमले का आरोप झट से लग जाएगा। क्या नौजवान पीढ़ी इस बात को समझेगी और परंपरा से बगावत करेगी, जैसा कि वह दहेज के मामले में करती दिख रही है? शायद मच्योरिटी का वह वक्त आएगा, लेकिन जल्दी तो नहीं।

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दिव्या तिवारी

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