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शिक्षण अकेला वह पेशा है जो अन्य सभी पेशों को जन्म देता है : मुकेश भटनागर

 

*ज्ञान मार्ग बनाम शिक्षा प्रणाली*

मुकेश भटनागर । शिक्षण और शिक्षा प्रणाली को इसके प्राचीनतम स्वरूप में, वर्तमान व प्रस्तावित रूप या जैसा होना चाहिए उस स्वरूप में समझने का प्रयास करते है। शिक्षण उन लोगों को प्रदान किया जाता आ रहा है जो सीखने के लिए तैयार रहते हैं या सीखने की इच्छा रखते हैं। परन्तु यह सभी के लिए और किसी भी आयु वर्ग के लिए और जीवन पर्यन्त होना चाहिए। शिक्षा का उद्देश्य जागरूकता, सशक्तिकरण और उत्थान करना है। शिक्षाविदों के सामने मुख्य चुनौती यह रहती है कि जातिगत, पंथ या रंग के बावजूद, इसे कैसे सभी लोगों के लिए अधिक से अधिक समावेशी बनाया जाए। दुनिया योग्य और अनुभवी शिक्षकों की तलाश में है, जिन्हें शिक्षा प्रदान करने का शौक व जनून हो। इस बात से इन्कार नहीं कर सकता कि शिक्षा वह सबसे शक्तिशाली हथियार है जिसका उपयोग दुनिया को बदलने के लिए किया जा सकता है और गरीबी और अज्ञानता के चक्र को तोड़ने का सबसे प्रभावी तरीका हैं।

सरकार “शिक्षा अधिकार अधिकार अधिनियम, 2009” संविधान के अनुच्छेद 21 (ए) के तहत ले कर आई जिसके अंतर्गत 6-14 वर्ष की आयु के बच्चों के लिए नि: शुल्क और अनिवार्य शिक्षा के महत्व और अन्य तौर-तरीके पर जोर दिया गया। तथा इस प्रकार भारत, विश्व के 135 देशों में शुमार हो गया जहां पहले से ही शिक्षा, हर बच्चे के लिए एक मौलिक अधिकार था। इसका मुख्य उद्देश्य विशेष रूप से हाशिये पर जीवन यापन कर रहे परिवार के बच्चों को स्कूलों में रजिस्ट्रेशन और उन्हें अन्तिम जमात तक रोके रखने की प्रक्रिया को सुव्यवस्थित करना था। हालाँकि, समय-समय पर किए गए सर्वेक्षणों के अनुसार, यह तथ्य सामने आए कि समय से पहले स्कूलों से बाहर निकलने वाले बच्चों की संख्या, अधिनियम के तौर-तरीकों और उद्देश्यों पर सवाल उठा रही है। अब देश नई शिक्षा नीति 2020 लेकर आया है, जो भारतीय शिक्षा प्रणाली में एक महत्वपूर्ण कदम लगता है। परन्तु फिर इसकी प्रस्तावना व प्रमुख मुद्दों पर एक बहस चल रही है, जो इस नई नीतिगत उद्देश्य की सार्थकता पर प्रश्न चिन्ह लगाती है जैसे कि पेपर उन्मुख अध्ययन और ज्ञान का मूल्यांकन।

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भारत प्राचीन काल से शिक्षा का केंद्र रहा। भारतीय संस्कृति, सम्पदा, धार्मिक दर्शन, वास्तुकला के साथ-साथ शिक्षा पद्धतियों की प्रसिद्धि दूर-दूर तक फैली हुई थी। ‘ऋग्वेद’ के समय से हमारी प्राचीन शिक्षा प्रणाली ने आंतरिक और बाह्य दोनों का ख्याल रखते हुए व्यक्ति के समग्र विकास पर ध्यान केंद्रित किया । शिक्षा प्रणाली ने जीवन के नैतिक, शारीरिक, आध्यात्मिक और बौद्धिक पहलू पर ध्यान केंद्रित किया। प्राचीन भारत में, शिक्षा प्रणाली के औपचारिक और अनौपचारिक दोनों तरीके मौजूद थे। घर, मंदिरों, पाठशालाओं, टोल्स, चतुष्पद और गुरुकुलों में स्वदेशी शिक्षा दी जाती थी। घरों, गांवों और मंदिरों में ऐसे लोग थे जो छोटे बच्चों को जीवन के पवित्र पथ पर चलने के लिए मार्गदर्शन करते थे। मंदिर भी सीखने समझने के केंद्र थे यही कारण है कि हमारे देश में इतनी संख्या में मन्दिरों की श्रृंखला बनाई गई और प्राचीन प्रणालीगत ज्ञान के आधार पर प्राचीन प्रणालियों को बढ़ावा देने में कारगर साबित हुए। छात्र उच्च ज्ञान के लिए विहार और विश्वविद्यालयों में जाते थे। शिक्षण काफी हद तक मौखिक था और छात्रों को कक्षा में जो पढ़ाया जाता था, उसे वह ध्यान से सुनकर, मनन करके अपने आचरण में समाहित करते। गुरुकुलों को आश्रम के रूप में जाना जाता था और वह सीखने और सिखाने का आवासीय स्थान होता था। इनमें से कई का नाम ऋषियों के नाम पर रखा गया, जो जंगलों में स्थित होते, शांत और सौम्य वातावरण में, सैकड़ों छात्र गुरुकुल में एक साथ सीखते पढ़ते। गुरु और विद्यार्थी दोनों आश्रम में ही रहते । अपने आचरण, व्यवहार, दृष्टिकोण और जीवन शैली के द्वारा गुरु विद्यार्थियों के लिए जीवंत उदाहरण हुआ करते थे।

आधुनिक समय में जिन्हें हम वैज्ञानिक कहते हैं, वह प्राचीन भारत में ऋषि तथा असाधारण गुणों से सुसज्जित गुरु माने जाते थे। कुछ के नाम इस प्रकार है आर्यभट्ट, पाणिनि, कात्यायन, पतंजलि, चरख, सुश्रुत, वेदव्यास, परशुराम, वशिष्ठ, विश्वामित्र, भागीरथ, कृपाचार्य, द्रोणाचार्य, संदीपन और उनके जैसे अन्य बहुत। वैदिक काल में महिलाओं की भी शिक्षा पहुँची। वैदिक विद्वानों में प्रमुख महिलाऐं इस प्रकार जानी जाती है – मैत्रेयी, विशम्भर, अपाला, गार्गी, लोपमुद्रा आदी। विश्व के सबसे पुराने विश्वविद्यालयों में तक्षशिला, नालंदा, वल्लभी, विक्रमशिला, ओदंतपुरी, जगदला थे। इन्हें विहार या विश्वविद्यालय के रूप में विकसित किया गया। बनारस अर्थात् नवदीप और कांची के मंदिरों को सामुदायिक जीवन के केंद्र के रूप में विकसित किया गया। तक्षशिला की स्थापना त्रेता युग में राम (रामायण) के छोटे भाई भरत ने की थी और अंततोगत्वा कोरिया, जापान, पर्शिया, तिब्बत, चीन, ग्रीस, ईरान जैसे सुदूर देशों से विद्यार्थि और शिक्षक इन विश्वविद्यालयों का हिस्सा बने। चाणक्य और चंद्रगुप्त ने वहां अध्ययन किया। आर्यभट्ट को नालंदा विश्वविद्यालय का प्रमुख कहा जाता है। उस दौरान यहां 10000 से अधिक छात्र और 2000 शिक्षकों के रहने का प्रबंध था।

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कई आक्रमणकारियों ने देश में आकर लूटपाट की और इतिहास के पन्नों में समा कर रह गये, लेकिन जो लोग सीखने आए, उन्होंने दुनिया को उजागर किया सही दिशा दि। हमारी ही वह देवभूमि है जहां मानव रूप में भगवान भी, गुरुकुलों में सीखने और अध्ययन करने गए। राम और उनके भाई, गुरु वशिष्ठ आश्रम गए, कृष्ण मथुरा से उज्जैन में संदीपन आश्रम आए और शिक्षा की सभी शाखाओं को सीखा। गुरु न केवल शस्त्र विद्या की शिक्षा देते थे बल्कि आध्यात्मिक, नैतिक और सामाजिक रूप से मार्गदर्शन भी करते थे। अर्जुन हमेशा अपना परिचय इस प्रकार देते थे – “मैं द्रोण शिष्य अर्जुन”। देखा जाए शिक्षक एक नौसिखिए बालक से एक इंसान बनाता है। क्या हमारी शिक्षा प्रणाली “वास्तविक शिक्षा के उद्देश्य” से मेल खाती है।

आज भारत आंकड़ों के मामले में दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी शिक्षा प्रणाली है। जहां 41 करोड़ छात्रों के साथ 1028 विश्वविद्यालय, 45000 कॉलेज, 14 लाख स्कूल हैं। इन सभी में शिक्षा प्राप्त कर रहे छात्रों का एक मात्र उद्देश्य, शिक्षित होने का प्रमाण पत्र या डिग्री पाने का रहता है चाहे वह 12 साल की स्कूली शिक्षा के पश्चात हो या फिर 4 साल के स्नातक पढ़ाई के पश्चात या 2 साल के पोस्ट ग्रेजुएशन के उपरान्त, शिक्षित होने की संतुष्टि के रूप में। शिक्षा को मैकॉले शैली से बाहर आने की आवश्यकता है ।

भले ही हम गुरुकुल शिक्षा प्रणाली की तुलना आधुनिक शिक्षा प्रणाली से करें लेकिन वस्तुस्थिति एक अलग कहानी कहती है। 2019 में भारत में अध्ययन करने वाले विदेशी छात्रों की संख्या 47000 के आस-पास थी, जहाँ विदेशी अध्ययन के लिए जाने वाले भारतीय छात्र लगभग 361000 को छू गई। भारतीय छात्रों के लिए सबसे अधिक मांग जर्मनी, कनाडा, न्यूज़ीलैंड, सिंगापुर और फ्रांस के लिए साबित हो रही है। जबकि शिक्षा में सबसे सस्ता नॉर्वे, ताइवान, जर्मनी, फ्रांस, मेक्सिको है और फिर भारत आता है। विदेशी छात्रों के लिए सबसे बड़ा शिक्षा केंद्र संयुक्त राज्य अमेरिका है जहां पे दूसरे देश से आए छात्रों की संख्या 1078822 हैं, फिर 501045 के साथ ब्रिटेन आता है, 442773 के साथ चीन, ऑस्ट्रेलिया में 327606 विदेशी छात्र है। क्या यह सभी आंकड़े एक अलग कहानी नहीं बताते हैं कि सरकार किस तरह से शिक्षा प्रणाली को देखती है, तथा लगभग उसी नजरिए से छात्र और शिक्षाविद भी और काफी हद तक माता-पिता भी। शिक्षा सभी घटकों के लिए व्यापार उन्मुक्त हो गई है। एक व्यक्ति को परीक्षाओं के स्तर के अनुसार शिक्षित समझा जाता है, या फिर उसके पद या पद की गरिमा के अनुरूप। शिक्षा का उद्देश्य प्रबुद्ध होना है। गीता में कहा है – *बुद्धियुक्तो जहातीह* : बुद्धि का कार्य है, इंसान को मुक्ति की ओर अग्रसर करना है। *योग: कर्मसु कौशलम्* अर्थात खुले मन से ध्यान से, एकाग्रता से (योग:) कार्य-कोशल बनना। क्या हमारी शिक्षा नीति अथवा शिक्षा प्रणाली, बुद्धि को उत्तरोत्तर मार्ग पर प्रशस्त करती दिखाई देति है।

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जहाँ मन भय रहित हो और सिर ऊँचा रहे। जहां सत्य की गहराई से शब्द निकलते हो, ऐसी शिक्षा प्रणाली की ओर सम्भवतः नोबेल पुरस्कार से सम्मानित गुरुदेव टैगोर अपनी पुस्तक ‘गितांजली’ में कह गए। वाल्मीकि, रामबोला (तुलसीदास), कालीदास, कबीर, नानक आदी महानतम शिक्षाविद व पथप्रदर्शक मानें जाते हैं। उच्च कोटि के शिक्षार्थी रहे फिर शिक्षक बने, ऐसे थे हमारे कुछ राष्ट्रपति रहे जिनमें मुख्य नाम लिया जाता है डॉ जा़किर हुसैन, डॉ ऐ पी जे अब्दुल कलाम यहां तक कि देश के दूसरे राष्ट्रपति डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिवस को शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है। अत: यह अनिवार्य है कि हमारी शिक्षा प्रणाली ऐसी हो जो आदमी को इंसान बनाये, मानवता की ओर प्रेरित करें, स्वार्थि न बनाएं निस्वार्थ भावना जगाएं, कल्याणकारी बनाएं।(सौजन्य : हिमालिनी दिल्ली ब्यूरो प्रमुख )

मुकेश भटनागर

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