भूलाकर अपने शहीदों के बलिदान का आज भी हम लगे हैं सत्ता के कुचक्रो में : एस एन ठाकुर
शायद हमेशा के लिये…..
शायद हम ने नही सिखा है कुछ भी,
शायदअपनी गलतियों से अब तक।।
बस डूबे रहे अपने इतिहास की
उन बातों में जो कुछ सुलझी थी और
शायद कुछ उलझी भी ।।
हमने खूब दिखाई दुनिया को अपनी बीरता
और जीता बहुत कुछ शक्ति से तब ।
लेक़िन ये भूल गए की युद्ध में पूर्ण जीत
कभी भी नही होती और शायद
युद्ध जीतने बाले भी कुछ हार जातें हैं ।।
हमने दिखाई सुनाई और खूब पढ़ाई
जनता को दुनिया को अपनी जीत के किस्से।
लेकिन अपनी हार के किस्सो से परहेज किया
सत्ता के समीकरण में पसंद क्रियाओं को बताया खूब
लेकिन अपनी रणनीतिक गलतियों को बताने से गुरेज किया ।।
सच है की हम गुलाम नही रहे कभी भी शायद ।
लेकिन क्या ये पूरा सच है जो बताया गया
राजनीतिक गुलामी से परहेज कर अंग्रेजों ने
क्या हमे पूर्ण रूप से स्वतंत्र रहने दिया ।।
समझ कर देश की कठनाई को
अनूठे भौगोलिक बिबिधिताओं को जानकर ।
बदल दी बुद्धि से रणनीति लड़ने की उन्होने
हथियार से लड़ने की बजाय युद्ध
उन्होंने जीत लिया सब कुछ बुद्धिमानी से ।।
हम कुछ न कर पाये तब सह गए सब कुछ
गंवा दी अपनी भुमि का बहुत सारा हिस्सा
और मान ली सब बाते सरलता से या फिर डर से।
हम सुनाते रहे अपनी जीत के किस्से और
उन्होंने बिठा दिया अपने प्रतिनिधि को दरबार में ।।
तो क्या हम सच में पूरा स्वंत्र थे
कर सकते थे सब स्वन्त्रता से ।
बहुत जानना है जरूरी कुछ बातों को
क्यों खत्म की हमने अपनी संप्रभुता को
चुपचाप बिना बिरोध सहजता से ।।
तब हमारी बीरता का कदर हुआ था
या हमने भी उनका बीरता मान ली थी ।
और फिर रह गए चुप से निःशब्द तब
बचाली अपनी गद्दी कुछ बुद्धिमानो ने ।।
फिर बना दी फौज उन्होंने हमारी अपने लिए
जानकर युद्ध निति की गूढ बातें ।
बन गए वो हमारे मालिक आसानी से
और आज तक हम कर रहें है गुलामी
उनकी उनके लिए बस जीवन के लिए ।।
बेच दी हमने अपनी बीरता और युद्ध कौशल
और लड़े कई युद्ध जायज और नाजायज भी ।
प्राप्त किये धन सम्पति और भूमि उपहार
अपने युद्ध ब्यापार से और बना दी एक
नई किस्म की गुलामी शायद हमेशा के लिए ।।
लड़े हम उनके लिये युद्द कइ सारे
बनाया मजबूत उनको अपने खून पसीने से ।
समझ न सके हम तब ये बातें जो थी गूढ
की उनकी मजबूती बढ़ती गई
और हम कमजोर होते गए ।।
इसी सत्ताके खेल ने जन्म दिया था कई कोत परबों को
और हम बोल न सके कुछ भी गुलामों की तरह ।
इतिहास ने ही सिखाया था बलपूर्वक
सत्ता परिवर्तन या फिर हरण की कला
और बन गए हम गुलाम चुपचाप अपनो का ।।
भूल गए की भबिस्य हमारा गुलाम नही होगा
वो निर्देशित होगा हमारे इतिहास के कर्मो से ।
और बने थे जो स्वतंत्र ग़ुलामी के साथ
रह गए गुलाम स्वतंत्रता से अपनो का ।।
फिर लग गए कई साल निकलने में इस गुलामी से
अपनो का अपनो पर हुए अत्याचार से ।
चुका रहे थे हम कीमत अपनी उस स्वत्रंता की
जो मिली थी उधार में हमे कभी इतिहास में ।।
हम जोड़ देते है सत्ता परिवर्तन को देश के साथ हमेशा
भुलाकर इतिहास के उन प्रयोगों से।
जिसने की थी राह प्रसस्त सत्ता की गली का
बंदूक की नली से कुछ निहित स्वार्थ के लिए ।।
आज भी हम भूलकर हम अपनी समझ को
करते है गुलामी लोगों की अपनों की ।
बनकर गुलाम हम कुछ बिचारोंका किताबो का
सुनाते हैं किस्से अपनी स्वतंअन्त्रता के ।।
भूलाकर अपने शहीदों के बलिदान का
आज भी हम लगे हैं सत्ता के कुचक्रो में ।
जिनके के कारण हम मुक्त हुए स्वतंत्र गुलामी से
याद करते नही कभी उन सपूतो का ।।
याद रखा नही हमने उनके(शहीदों) योगदानो का
पूजते है हम आज के बिसिस्ट नेताओ को ।
सुनकर ली हुई बिदेशी ज्ञानो से
जिनोहने बदल दी देस की दिशा एक तरफ
भूलकर फ़ायदे अपनी तटस्थतआ का
कर लिया अलग थलग अपने को अन्य दिशाओं से ।।
गुलामी की एक नई किस्म को जना है हमने ।
जहां है हम गुलाम किताबों के कुछ खास बिचारों का ।
जिया जिंदगी राजाओं सी उसके बलपर सत्ता ने
करके खुशियों का सौदा हम प्रजाओं की ।।
बनाया है निसाना गरीबों को सत्ता के खातिर
बढ़ाया है संख्या उनकी अपने स्वार्थ के लिए ।
हम समझ न सके कुटिलता उनकी
बढ़ाई शक्ति उनकी और फिर गरीब बनते गए ।।
भूलकर महत्ता उत्पादन का
सिखाया बाँटना अपनी संपदाओं को ।
खत्म कर ली क्षमता हमने सृजन का
कर लिया बिनास खुद ही अपनो का
अपने देश का ।।
भूल गए जीवन के सामान्य ज्ञान को
खत्म करली अपनी सम्पति सारी ।
भूलकर सृजन के प्रयाशों को हमने
कर ली यात्रा गरीब बनने की पथ पर
शायद हमेशा के लिए ।।।
इतिहास को एक नए दृस्टि से देखने की मेरी कोशिश ।

बनैनिया सप्तरी ।हाल विराटनगर..13

