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श्राद्ध,अतृप्ति के कारण, प्रमुख दान, पितृ शाप,- एक उपयोगी विश्लेषण : मनीषा मारू

 

है 🙏”पितृ देवता”🙏 ,आप के बाद भी
हर घड़ी हम ने,
आप के साथ ही गुज़ारी है ।
नमन- वंदन है, हर कदम आपको।
पुरखो में शामिल होकर भी,
हर पथ -हर पल पर्चा दिया सबको भारी है।
भुला नहीं सकते ,हम आपको
हर दिन दीप प्रज्वलित होता आपके नाम का
यह जीवन तो आपका ही,
ऋणी हैं ,आभारी है।🙏🙏

“श्राद्ध # अतृप्ति के कारण #प्रमुख दान #पितृ शाप– मनीषा मारू

पितरों के लिए श्रद्धा से किए गए मुक्ति कर्म को श्राद्ध कहते हैं ।तिल मिश्रित जल अर्पित करने की क्रिया को तर्पण कहते हैं। कर्मों के अनुसार किसी भी आत्मा को गति मिलती है। देह छोड़ गए लोगों में से बहुत से अतृप्त होते हैं। कहते हैं कि अतृप्त आत्मा को सद्गति नहीं मिलती है और वह भटकता रहता है इसलिए श्राद्ध कर्म करके उसके वंशज उसके लिए सद्गति का मार्ग खोलते है
अतृप्ति के कारण
1. पहला :     व्यक्ति किसी भी उम्र या अवस्था में मरा हो उसकी इच्छाएं यदि बलवती है तो ई भूखा, प्यासा, संभोगसुख से विरक्त, राग, क्रोध, द्वेष, लोभ, वासना आदि इच्छाएं और भावनाएं लेकर मरा है अवश्य ही वह अतृप्त होकर भटकता रहेगा। गीता पाठ अवश्य करना चाहिए ।  गीता का छठा व सातवां अध्याय पढ़ने का विशेष महत्व बताया गया है ।
2. दूसरा :    अकाल मृत्यु अर्थात असमय मर जाना। पूर्ण उम्र जिए बगैर मर जाना। जिन्होंने आत्महत्या की है या जो किसी बीमारी या दुर्घटना में मारा गया है। वेदों के अनुसार आत्मघाती मनुष्य मृत्यु के बाद अज्ञान और अंधकार से परिपूर्ण  अतृत होकर भटकते हैं जब तक की उनके जीवन का चक्र पूर्ण नहीं हो जाता।
3. तीसरा     : धर्म को नहीं जानना ही सबसे बड़ा  काअतृप्ता का कारण है। जिन्होंने उपनिषद और गीता का अध्ययन अच्छे से नहीं किया वे ज्ञान शून्य  होकर ही मरते हैं क्योंकि वे अपने मन से आत्मा, ईश्‍वर या ब्रह्मांड के संबंध में धारणाएं बना लेते हैं। ऐसे लोगों की भी कर्म गति तय करती है कि वे किस तरह का जन्म लेंगे।
4. चौथा :    शास्त्र कहते हैं कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि आप क्या सोचते, क्या समझते, क्या बोलते और क्या सुनते हैं। फर्क इससे पड़ता है कि आप क्या करते, क्या मानते और क्या धारणा पालते हैं। क्योंकि यह चित्त का हिस्सा बन जाती है।  हमारी चित्त की गति ही प्रारब्ध और वर्तमान के कर्मों पर आधारित होती है।
5. पांचवां :     हर कोई अपनी जिंदगी में अनजाने में अपराध या बुरे कर्म करता रहता है। लेकिन वे लोग सचमुच ही बुरे हैं जो जानबुझकर किसी की हत्या करते, बलात्कार करते, हर समय किसी न किसी का अहित करते रहते हैं या किसी भी निर्दोष मनुष्‍य या प्राणियों को सताते रहते हैं। चोर, डकैत, अपराधी, धूर्त, क्रोधी, नशेड़ी और कामी आदि लोग मरने के बाद बहुत ज्यादा दुख और संकट में रहते हैं।
श्राद्ध पक्ष 2 सितंबर से शुरू हुआ है और 17 सितंबर को समाप्त होगा।

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“श्राद्ध पक्ष में प्रमुख दान”
इस दौरान इस पितृ पक्ष  दान से पितरों की आत्मा को संतृष्टि मिलती है, कालसर्प दोष और पितृ दोष भी समाप्त होता है। प्राचीनकाल में तो कई तरह के दान किए जाते थे जैसे गौ-दान, भूमिदान, स्वर्ण दान और चांदी दान परंतु इस कलिकाल में ये तो संभंव नहीं है। श्राद्ध पक्ष में अन्न दान तो करते ही हैं परंतु इसके अवाला भी ये 10 प्रमुख दान हैं जो श्राद्ध पक्ष में किए जा सकते है।

बिना संकल्प के कोई भी दान व्यर्थ है …….इसलिए
अमुक ऋतु महीना ,शुक्ल या कृष्ण पक्ष अमुक तिथि ,वार ,नक्षत्र ,राशि ,जिस राशि में चन्द्र और सूर्य हो उसका नाम ,गुरु जिस राशि में स्थित हो उसका  भी नाम, अपने गौत्र तथा स्वयं का नाम  ले और हाथ में जल लेकर इतना कहकर जल छोड़ें।

1. जूते-चप्पल का दान : पूर्वजों के निमित्त और उनकी आत्मा शांति हेतु जूते या चप्पलों का दन करने से पितरो प्रसन्न होते हैं। मान्यताओं के अनुसार ऐसा करने से घर में सुख-शांति और खुशहाली आती है। शनि और राहु दोष भी समाप्त हो जाता है।

2.वस्त्र दान : जिसे भी भोजन कराया जा रहा है उसे जूते चप्पल के अलावा वस्त्रों का दान भी करना चाहिए। वस्त्र दान में धोती, टोपी या उत्तरीय (गमछा) दिया जाता है। कहते हैं कि पितर अपने वंशजों से वस्त्र की भी कामना करते हैं।

3. छाता दान :     श्राद्ध-कर्म में मान्यता है कि यममार्ग में पितरों की छाते से ग्रीष्म के ताप और वर्षा से रक्षा होती है। यह भी कहता जाता है कि इससे पितरों की छत्र छाया बनी रहती है।

4. काला तिल दान :    काले तिलों का दान करने से से व्यक्ति को ग्रह और नक्षत्र बाधा से मुक्ति तो मिलती है ही साथ ही यह दान संकट, विपदाओं से रक्षा करता है। तर्पण करने के दौरान यह कार्य किया जाता है।

5. घी दान :    गाय का घी पात्र सहित दान करने से पारिवारिक जीवन खुशहाल हो जाता है।

6. गुड़ दान :     इसे पितरों को विशेष संतुष्टि प्राप्त होती है। इससे घर में सुख-शांति का वातावरण बना रहता है. ऐसा करने से गृह-क्लेश भी दूर है। घर में लक्ष्मी का वास होता है।

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7. धान्य दान :    इसमें किसी अनाज, दाल, चावल या आटे आदि का दान किया जाता है। इससे वंश वृद्धि में किसी भी प्रकार की रुकावट नहीं होती है।

8. नमक का दान :     नमक का दान करने से प्रेत बाधा और आत्माओं से मुक्ति मिलती है।

9. चांदी या स्वर्ण का दान :    स्वर्ण दान करने से सूर्य एवं गुरु संबंधी बाधा के अलावा रोगों से मुक्ति मिलती हैं वहीं चांदी दान करने से चंद्र ग्रह संबंधी बाधा दूर होती है और परिवार में शांति, सुख एवं एकता बनी रहती है। स्वर्ण के आभाव में पीतल या दक्षिणा दे सकते हैं और चांदी के अभाव में कोई सफेद वस्तु दान कर सकते हैं।

10. गौ-दान :     इस दान को करने से मुक्ति की प्राप्ति होती है।  इस दान को संकल्प से प्रतिकात्मक रूपस से भी कर सकता है।

11. भूमि दान :     भूमि दान की जगह एक गमले में पौधा लगाकर भी दान किए जाने का आजकल प्रचलन है।

आमान्न दान :     श्राद्ध में जो लोग भोजन कराने में अक्षम हों, वे आमान्न दान देते हैं। आमान्न दान अर्थात अन्न, घी, गुड़, नमक आदि भोजन में प्रयुक्त होने वाली वस्तुएं इच्छा‍नुसार मात्रा में दी जाती हैं। श्राद्ध का भोजन 4 लोगों को खिलाया जाता है। ब्राह्मण, कुत्ते, गाय और कौए। श्राद्ध के भोजन में बेसन का प्रयोग वर्जित है। सूतक में ब्राह्मण को भोजन नहीं कराना चाहिए। केवल गाय को भी खिलाना चाहिए।

अपनी भाषा में प्रार्थना करे… हे पितृगण, मेरे पास श्राद्ध के लिए उपयुक्त अन्न-धन नहीं है, मेरे पास है तो केवल श्रद्धा-भक्ति है, …इसे आप स्वीकारें। हम आपकी संतान हैं। हमें आशीर्वाद दें तथा ग‍लतियों एवं कमियों के लिए क्षमा करें…श्राद्ध पूरा करने की शक्ति प्रदान करें।

पितृ शाप : कहते हैं कि यदि किसी जातक ने गतजन्म में अपने पिता के प्रति कोई अपराध किया है तो उसे इस जन्म संतान कष्ट होता है। यह दोष या योग सूर्य से संबंधित है। इसके अलावा अष्टम स्थान में राहु या अष्टमेश राहु से पापाक्रांत हो तो इसको पितृ दोष या पितर शाप भी कहा गया है।

ज्योतिष के अनुसार जन्मपत्री में यदि सूर्य पर शनि राहु-केतु की दृष्टि या युति द्वारा प्रभाव हो तो जातक की कुंडली में पितृ ऋण की स्थिति मानी जाती है। इसके अलावा भी अन्य कई स्थितियां होती है। विद्वानों ने पितर दोष का संबंध बृहस्पति (गुरु) से बताया है। यह पितर दोष पिछले पूर्वज (बाप दादा परदादा) से चला आता है, जो सात पीढ़ियों तक चलता रहता है।

हमारे पूर्वज कई प्रकार के होते हैं, क्योंकि हम आज यहां जन्में हैं तो कल कहीं ओर। पिछले जन्म का पितृदोष कुंडली में प्रदर्शित होता है, जैसे गुरु और राहु का एक जगह एकत्रित होना। जन्म पत्री में यदि सूर्य पर शनि राहु-केतु की दृष्टि या युति द्वारा प्रभाव हो तो जातक की कुंडली में पितृ ऋण की स्थिति मानी जाती है।खासकर नौवें से पता चलता है कि जातक पिछले जन्म में क्या करके आया है। यदि नौवें घर में शुक्र, बुध या राहु है तो यह कुंडली पितृ दोष की है।
उपाय : इसके उपाय हेतु पितृश्राद्ध कर्म करना चाहिए। पितरों के लिए किए गए मुक्ति कर्म को श्राद्ध तथा तंडुल या तिल मिश्रित जल अर्पित करने की क्रिया को तर्पण कहते हैं।।

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मरने के बाद आत्मा की तीन तरह की गतियां होती हैं-
1. उर्ध्व गति, 2. स्थिर गति और 3. अधोगति। इसे ही अगति और गति में विभाजित किया गया है। अगति में व्यक्ति को मोक्ष नहीं मिलता है उसे फिर से जन्म लेना पड़ता है।

उसी तरह गति में जीव को किसी लोक में जाना पड़ता है। गति के अंतर्गत चार लोक दिए गए हैं:
1.ब्रह्मलोक, 2.देवलोक, 3.पितृलोक और 4.नर्कलोक। जीव अपने कर्मों के अनुसार उक्त लोकों में जाता है। ब्रह्मलोक वह पहुंचता है जिसने योग और ध्यान करके मोक्ष प्राप्त किया है। देवलोक पुण्‍यात्मा ही पहुंचती है। कुछ काल रहने के बाद उसे पुन: मनुष्‍य योनि में जन्म लेना होता है। पितृलोक में भी पुण्‍यात्मा ही पहुंचती है जहां वह अपने पितरों के साथ सुखपूर्वक समय बिताकर पुन: जन्म लेती है। नर्कलोक में पापी या दुष्‍कर्मी आत्माएं ही पहुंचती है। वे भी यहां कुछ काल रहने के बाद पुन: किसी भी योनि में जन्म ले लेती है।

पुराणों अनुसार आत्मा तीन मार्ग के द्वारा उर्ध्व (उर्ध्व गति) या अधोलोक (अधोगति) की यात्रा करती है। ये तीन मार्ग है-1.अर्चि मार्ग,2.धूम मार्ग और 3.उत्पत्ति-
विनाश मार्ग। अर्चि मार्ग ब्रह्मलोक और देवलोक की यात्रा के लिए है। धूममार्ग पितृलोक की यात्रा के लिए है। उत्पत्ति-विनाश मार्ग नर्क की यात्रा के लिए है। यह यात्रा बुरे सपनों की तरह होती है। जब भी कोई मनुष्य मरता है और आत्मा शरीर को त्याग कर उत्तर कार्यों के बाद यात्रा प्रारंभ करती है तो उसे उपरोक्त तीन मार्ग मिलते हैं। उसके कर्मों के अनुसार उसे कोई एक मार्ग यात्रा के लिए प्राप्त हो जाता है।

देवयान और पितृयान : पहला जन्म साधारण जन्म है। पिता की मृत्यु के उपरांत पुत्र में ओर पुत्र के बाद पौत्र में जीवन की जो निरंतरता बनी रहती है उसे दूसरे प्रकार का जन्म माना गाया है। मृत्युपरांत पुनर्जन्म तीसरे प्रकार का जन्म है।

मनीषा मारू
विराटनगर (नेपाल)

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