इरादा हो अटल तो आसमाँ है मुट्ठी में, कहानी सारिका जैन की : मुरलीमनोहर तिवारी
कोई भी सफलता आसान नहीं होती लेकिन मन में विश्वास और लक्ष्य के प्रति सर्मपण हो तो हर परीक्षा आसान बन जाती है । भारत के उड़ीसा राज्य के कांताबाजी शहर की रहने वाली आईआरएस (इंडियन रेवेन्यू सर्विसेस) सारिका जैन की कहानी प्रेरणादायक है । आज वो मुंबई में इनकम टैक्स डिपार्टमेंट में डिप्टी कमिश्नर के पद पर कार्यरत हैं ।
सारिका ५० प्रतिशत निःशक्त हैं । १९८५ में सारिका जब वे दो साल की थीं तब दाहिने पैर में पोलियो हो गया, माता पिता कम जागरूक थे । वे भी नहीं समझ पाए, ऐसे में गलत इलाज ने कौमा की स्थिति पैदा कर दी । डेढ़ साल तक कौमा में रहने के बाद चार साल की उम्र में सारिका ने चलना शुरू किया । इस बीमारी के कारण परिवार पर भी संकट आ गया लेकिन माता पिता ने हिम्मत नहीं हारी । सारिका बचपन में डाक्टर बनना चाहती थी लेकिन परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी ।
विकलांगता की वजह से स्कूल में एडमिशन नहीं मिला । मगर वे पढ़ना चाहती थी । जिद के कारण पांच साल की उम्र में सरस्वती शिशु मंदिर में एडमिशन हुआ । एडमिशन मिला भी तो स्कूल के बच्चों ने चिढ़ाना शुरू कर दिया । यहां तक की पत्थर भी मारे लेकिन सारिका ने हौंसला नहीं खोया । वहां १०वीं तक पढ़ाई की ।

घर की आर्थिक स्थिति खराब होने के बाद भी सारिका पढ़ाई में जुटी रही, सारिका को मालूम था कि उसके दुखों को दूर करने की एक मात्र चाबी शिक्षा ही है । बी.का‘म करने के बाद आईएएस बनने का सपना देखा । ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी होने के बाद घरवालों को शादी की चिंता सताने लगी । इसके बाद चार साल तक घर पर ही रही । सारिका को कोई रास्ता नहीं दिख रहा था क्योंकि पोलियो ग्रस्त लड़की से शादी कौन करेगा यह सवाल परिवार और खुद के लिए बहुत बड़ा था ।
विकलांगता की वजह से मोहल्ले वाले कहते थे आईएएस बनना इतना आसान नहीं है और तुम तो बन ही नहीं पाओगी । इस सब की परवाह किए बगैर सारिका ने सीए की पढ़ाई शुरू की । सारिका ने इच्छा शक्ति मजबूत रखकर माता(पिता से कहा “मैं इस माहौल में तैयारी नहीं कर पाऊंगी, दिल्ली में तैयारी करनी होगी” । पिता (साधुराम जैन) और मां (संतोष देवी) ने साथ दिया ।
२०१२ में दिल्ली में तैयारी शुरू की । जिसमें सारिका ने सीए में टॉप किया । सीए बनने के बाद यूपीएससी की तैयारी शुरू किया । वर्ष २०१३ में एक साल की कड़ी मेहनत से ५२७ वीं रैंक हासिल किया । इसके बाद लोगों का नजरिया ही बदल गया । सारिका का कहना है कि लड़कियों को कभी अपने आप को कमजोर नहीं समझना चाहिए अपने लक्ष्य पर केंद्रित रहते हुए आगे बढ़ने से सफलता जरूर मिलती है । २०१३ में पहले प्रयास में आईआरएस में चुनी गईं ।
आईआरएस बनने के बाद अब वे लड़कियों के लिए गाइडेंस प्रोग्राम चलाती हैं । इसमें आईएएस को लेकर लड़कियों का डर दूर कर रही हैं । सारिका ने बताया की “आईएएस बनना हर किसी का सपना रहता है लेकिन रिजल्ट के डर से निगेटिविटी रहती है । मुझे भी पहले यही डर था लेकिन पॉजिटिव नहीं सोचती तो अभी भी कस्बे में ही रहती” । सारिका की मानें तो हर लड़की को अग्निपरीक्षा से गुजरना पड़ता है लेकिन इरादें बड़े और उन्हें पूरा करने का जब जुनून हो तो अग्निपरीक्षा भी छोटी लगने लगती है ।

