नेपाल के लिए विनोबा भावे – कोटी कोटी नमन : चन्द्रकिशोर
विनोबा जी ने कहा – ” पैदल जो चलता हूं । उससे धरती का स्पर्श होता है और प्रकृति से नजदीक का संबंध जुड़ता है । मन में नीत नयी स्फुर्ती उत्पन्न होती है ।उसी से नयी नयी बातें सूझती हैं ।”
चन्द्रकिशोर | आचार्य विनोबा भावे की जो बात मुझे सबसे अधिक प्रभावित करती है , वे जमीन से जुड़े हुए थे । पैदल यात्रा करना उनकी विशेषता थी । उन्हें जमीन से जुड़े हुए लोगों की अस्मिता की गहरी पहचान थी तथा यह उनके ब्यवहार और चिंतन में लगातार ब्यक्त भी होती रही है । सरल वेशभूषा, सादगीपूर्ण जीवन तथा सहज ब्यवहार उनके जीवन का अंग रहा । वे अत्यंत खुले चरित्र के ब्यक्तियों में से थे । वे जो कुछ भी सोचते थे, वही कहते थे, और जो कुछ कहते थे, वही करतें भी थे ।
विनोबा जी का समूचा ब्यक्तित्व एक सशक्त विचार लगता है । वे अपने विचार की खुद ही प्रयोगशाला थे । जीवन के उत्तरार्ध मे चूंकि वे अलग थलग से पड़ते गए अतः उनके विचारों को अनदेखा किया जाने लगा, जिनकी आज निहायत जरूरी है । ब्यक्ति से विचार और विचार से कर्म बनने की उनकी दीर्घ जीवन यात्रा निश्चित ही युगों-युगों तक मानव को त्राणमुक्त कर जीवन मंत्र देती रहेगी । वे अपने युग के प्रखर मनिषी थे और उनकी दिब्य दृष्टि अत्यंत पैनी थी । उनके ब्यक्तित्व में संत, आचार्य और तपस्वी का सुंदर समन्वय था। उनमें गीता के कर्मयोगी, स्थितप्रज्ञ एवं भक्त, तीनों के एक साथ दर्शन होते हैं । महात्मा गांधी ने विनोबा जी के बारे में कहा था कि ” वह आश्रम के दुर्लभ मोतियों में से एक है ।”
भारत उनकी जन्मभूमि और प्रयोग भूमि रहा है परन्तु आज दुनिया भर में उनकेे प्रशंसक हैं । ११ सितम्बर को विश्व के बिभिन्न हिस्सा में उनकी १२५ जन्म जयंती मनाई जा रही हैं । विनोबा जी नाम दो शब्दों का पर्याय बन गया है । वे शब्द है – भू-दान और सर्वोदय । उनका उद्देश्य अहिंसा, त्याग और करूणा द्वारा सामाजिक, आर्थिक तथा नैतिक मूल्यों में क्रान्तिकारी परिवर्तन लाकर एक आदर्श समाज की स्थापना करना था । भू-दान से जुड़ी हुई जितना साहित्य मुझे पढ़ने को मिला है , उससे मैंने जो समझा वह यह कि अपने भू-दान यज्ञ के द्वारा विनोबा जी जो चीज चाहते थें वह जमीन से कहीं ज्यादा बड़ी थी । इसके केन्द्र में उनकी कोशिश यह थी कि गांव खुद अपने पैरों पर खड़े हो जाएं तथा अपनी मुलभूत एकता को महसूस करें ।
भूमिहीनों को जमीन देकर वे ऐसी सामाजिक प्रकृया शुरू करने की आशा रखते थे, जिससे प्रेम व सहयोग के बल पर गांव गांव की आत्मा जाग उठेगी तथा हर गांव एक परिवार का रूप ले लेगा । बस्तुत: वे भू-दान के द्वारा सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक क्षेत्रों में समत्व स्थापित करना चाहतें थे । विनोबा जी ने इस संबंध में अपना दृष्टिकोण स्पष्ट करते हुए कहा था कि ” मेरा काम यह नहीं है कि मैं भूखे को रोटी दूं, बल्कि यह है कि जो खा रहा है, उसके अंदर दूसरों को खिलाने की प्रेरणा पैदा करू । लेने के युग में मै देने का वातावरण पैदा करना चाहता हूं ।” ह्यदय परिवर्तन का यह कार्य बहुत ही कठिन था, लेकिन विनोबा जी को इसमें काफी सफलता मिली । वे चाहते थे कि गांव स्वावलम्बि बनें, फिर धीरे-धीरे उनका विकास हो और सारी मानव जाति का इसी स्वावलम्बन के आधार पर संगठन बनें । उनकी मान्यता थी कि यदि हमें हिंसा का मार्ग ग्रहण नहीं करना है, तो गांवों को स्वावलंबी बनाना होगा तथा गांवों का शासन भी लोगों के हाथ में देना होगा ।
वे भूमि समस्या का शांतिपूर्ण हल चाहते थें । नेपाल में भूमि का सवाल काफी समय से लम्बित है । भूमिहीनता का कानूनी ब्यवस्थापन कैसे हो ? इस पर मतांतर है । मुझे लगता है सिर्फ कानून बनाने से इसका हल सम्भव नहीं हैं । हमें विनोबा प्रयोग की ओर दृष्टि देना ही होगा । वे हमारे लिए एक प्रकाश स्तम्भ हैं , ब्यवहारिक जीवन में अहिंसा का प्रयोग करने को इच्छुक लोगों के लिए वे आशा एवं उम्मीद की केन्द्र हैं । उनकेे जीवन यात्रा से हमें रोशनी मिलती हैं ।
अहिंसा के पुजारी विनोबा जी भू-दान यज्ञ यात्रा के क्रम में दो बार प्रबचन करते थे और अपनी प्रबचन में नयी नयी बातें कहते थे । एक दिन उनसे पूछा गया – “बाबा ( विनोबा जी को लोग बाबा कहकर संम्बोधन करते थे ) आप इतने दिनों से भाषण देते आ रहे हैं, लेकिन आपके हर भाषण में कुछ नवीनता रहती हैं । यह कैसे सम्भव होता है ?” विनोबा जी ने कहा – ” पैदल जो चलता हूं । उससे धरती का स्पर्श होता है और प्रकृति से नजदीक का संबंध जुड़ता है । मन में नीत नयी स्फुर्ती उत्पन्न होती है ।उसी से नयी नयी बातें सूझती हैं ।” इस कथा से शिक्षा मिलती हैं कि आप चाहें जिस पेशा में हो यदि सामान्य जनों का सेवा करना चाहते हैं तो पैदल ही उनके खेत खलिहान में पहुंचना होगा । तब ही आप जमीनी सच्चाई से रूबरू हो सकतें है । महंगा गाड़ी से गांव देहात का पर्यटन तो हो सकता है लेकिन जनसंवाद नहीं । नेपाल में इस तरह की सोच की जरूरत है ।” लोकर हितक चिन्ति नित “अर्थात लोकहित का निरन्तर चिंतन करते हुए घूमना है । आज आम आदमी की हित का चिंता लेकर नेपाल के गांव देहात में घूमने की और संवाद करने की जरूरत हैं । इससे बहुत सारे समस्या का हल पता चल जाएगा । गांव देहात को जाने बेगर नेपाल को समझा कठिन है !
विनोबा जी स्वभाव से ही समन्वयवादी थे । उन्होंने वैचारिक क्षेत्र में सर्वधर्म समभाव के लिए बहुत काम किया । वे विज्ञान और अध्यात्म का समन्वय अनिवार्य मानते थे । उनके मतानुसार विज्ञान सिर्फ गति देगा, उस गति को सही दिशा देनी पड़ेगी । नहीं तो यही विज्ञान मानवमात्र का सर्वनाश कर देगा । इस परिस्थिति में विज्ञान गति देगा, अध्यात्म मार्गदर्शन करेगा । वे साध्य और साधन की शुद्धी पर बल देते थे । वे कथनी और करनी में एकरूपता चाहते थे । आज नेपाल में बहुसंख्यक लोग में विरोधाभास की अवस्था हैं ।हम सारे संसार को सुधारने का ठेका लेते हैं और असली मुद्दे की बात अपने को सुधारना भूल जाते है ।
सत्य के रास्ते पर है तो किसी से डरने की जरूरत नहीं । विनोबा जी ने ” जय जगत ” का मंत्र दिया । वे मानव जाति के सच्चे सेवक थे । वे महात्मा गांधी जी की बात हमेशा दुहराते थे कि घृणा को घृणा से तथा द्वेष को द्वेष से कभी भी दूर नहीं किया जा सकता । द्वेष तथा घृणा को मिटाने का एकमात्र उपाय प्रेम है । प्रेम करनें वालों से ही प्रेम नहीं, बल्कि अपने शत्रु से भी प्रेम करनें को कहा ।
आज नेपाल में हर कोई जो सार्वजनिक जीवन में है विलासितापूर्ण जीवन जिना चाहता है । यही कारण है कि नेपाल का कोई भी परिवर्तन जमिनी यथास्थिति में बड़ा हेर-फेर नही कर सका । स्वेच्छा से स्वीकार की हुई गरिवी पर वे जोड देते थे ।
सत्ता से बाहर रहकर भी सामाजिक रूपांतरण का काम किया जा सकता है इसका सर्वोत्तम उदाहरण विनोबा जी का प्रयोग हैं । कोरोना कहर ने हमें सबक सिखाया है कि हम मितब्ययी, सादगीपूर्ण और प्रकृति से जुड़ा हुआ जीवनशैली अपनाएं । विनोबा भावे भले ही भारत के नागरिक रहें हों मूलतः वे विश्व चिंतक एवं साधक थे । उनके कुछेक विचारों को यदि नेपाल स्वीकार कर ले, तो यह प्रकृति का सुंदर उधान नेपाल अनेक विभिषिकाओं से बच सकता है । आज महत्त्वपूर्ण बात यह है कि हम उनके विचारों को समझें तथा उन्हें अपने ब्यवहार में लाने की कोशिश करें ।
नेपाल की जनता ने अनेकों संघर्ष कर के संघीय लोकतांत्रिक गणतंत्र की स्थापना किया है । लोकतांत्रिक शासन ब्यवस्था मानव की गरिमा का सम्मान करने वाली सबसे उपयुक्त ब्यवस्था है । लेकिन कोई भी ब्यवस्था तब अप्रभावी हो जाती है, या उसका दुष्प्रभाव पड़ने लगता है, यदि उस ब्यवस्था के आंतरिक मूल्यों की रक्षा नहीं की जाती । दूसरे के अस्तित्व को स्वीकार करना , कमजोर तप्का की आवाज को सुनना , संवाद के लिए हर खिड़की और किवाड़ों को खोलकर रखना , सब को लगे यह राज्य हमारी है, सेवा – भाव, संयत आचरण आदि वे गुण है , जिन पर लोकतंत्र की आत्मा अवलंबित है । इस देश के प्रत्येक नागरिक का यह परम कर्त्तव्य है कि वे इन लोकतांत्रिक गुणों को अपने अंदर अधिक से अधिक विकसित करें तथा दूसरे के अंदर विकसित करने में अपना सहयोग दें । जनता द्वारा चुने हुए प्रतिनिधियों का यह दायित्व सबसे अधिक हैं ।
नेपाल में संविधान दिवस सन्निकट हैं । इस परिप्रेक्ष्य में समानता, सामाजिक न्याय,और भ्रातृत्व पर आधारित एक नयी संस्कृति की रचना अभी की जानी है । यदि समन्वय काम नहीं किया गया तो आनेवाला कल हमें कभी भी माफ नहीं करेगा । समय की इस मांग को आज ध्यान मे रखना बहुत जरूरी है ।मेरी समझ में आचार्य विनोबा भावे का यह १२५ वी जन्म जयंती का दिवस हम नेपालवासीयो को यही संदेश देता है ।



