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नेकपा और कुर्सी के वर्चस्व की कहानी : अंशु झा

 

अंशु झा, हिमालिनी,अंक अगस्त 2020 ।२१ कम्युनिष्ट दल मिलकर नेकपा का निर्माण हुआ है । ३ गते ज्येष्ठ २०७५ के दिन तत्कालीन नेकपा एमाले और नेकपा माओबादी के बीच एकीकरण होकर नेकपा का निर्माण हुआ है । जो निर्माण के साथ ही एक जिज्ञासापूर्ण पार्टी बन गई है । फिलहाल सत्तारुढ पार्टी नेकपा ही है । दो तिहाई की सरकार बनाई है नेकपा पार्टी परन्तु जब से सरकार बनी है तब से लग रहा है कि सत्तारुढ पार्टी एक रंगमंच तैयार कर जनता को नाटक दिखा रही है । वर्तमान नेकपा पार्टी में फिलहाल दो अध्यक्ष हैं, एक खड्गप्रसाद शर्मा ओली जो फिलहाल प्रधानमन्त्री पद पर आसीन हैं और दूसरे पुष्पकमल दाहाल प्रचण्ड जी, पर दोनों में समन्वय कम दिखाई दे रही है । नेकपा में और बहुत सारे वरिष्ठ नेता हैं जो कुछ इधर तो कुछ उधर बंटे हुए हैं ।

अब बात आती है प्रधानमन्त्री पद और अध्यक्ष पद की तो इसके लिये नेकपा के सारे वरिष्ठ नेतागण कसरत में लगे हुए हैं । आए दिन इस विषय पर चर्चा हो रही है । कभी बालुवाटार में तो कभी धुम्बाराही में तो कभी भैंसेपाटी के व्यक्तिगत निवास पर दौड़धूप जारी है । कुछ दिन पहले नेकपा के एक वरिष्ठ नेता ने पार्टी एकीकरण कायम रखने तथा समन्वय रखने के लिए ६ बूंदे प्रस्ताव रखा था, इसके बाद से तो उनका निवास दर्शनस्थल जैसा हो गया । कौन प्रधानमन्त्री, कौन अध्यक्ष सब दौड़ रहे हैं दर्शन के लिए तथा चढ़ावा चढ़ाने ।

पार्टी में गत कुछ महीनों से सत्ताधारी नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (नेकपा) के प्रधानमन्त्री तथा अध्यक्ष केपी शर्मा ओली पर दबाब दिया जा रहा है कि ‘प्रधानमन्त्री पद छोड़ो नहीं तो अध्यक्ष पद छोड़ो’ विषय पर खूब बहस चल रही है । कभी–कभी तो उनसे दोनों पद छोड़ने का जिक्र भी किया जा रहा है । किसी को कुर्सी खोने का डर है तो कोई कुर्सी पाने का सपना देखने में लगा है जिसके लिए साजिश पर साजिश हो रही है और भोली भाली जनता की आंखों में धूल झोंकी जा रही है ।

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अगर हम इतिहास पलट कर देंखेंगे तो पता चलेगा कि कुर्सी के लिये कितनी साजिशें हो चुकी हैं और वर्तमान में भी वही हाल दृष्टिगोचर हो रहा है । २०७४ साल के संसदीय और प्रादेशिक चुनाव पूर्व ओली को एमाले और प्रचण्ड को माओवादी केन्द्र द्वारा गठबन्धन कराया गया, संयुक्त रूप में दोनों स्तरों में अपना–अपना वर्चस्व स्थापित किया । वह गठबन्धन वास्तव में माओवादी केन्द्र के लिए संजीवनी बुटी सिद्ध हुई । ओली भी इससे कम लाभान्वित नहीं हुए । वह नेपाल के इतिहास में ही सबसे अधिक शक्तिशाली गठबन्धन के नेता बनें जो उनके लिए एक बहुत बड़ी उपलब्धि है । इस उपलब्धि के कारण उन्हें २०१५ साल के संसदीय चुनाव का अभिनेता कांग्रेस का संस्थापक बीपी कोइराला के साथ तुलना किया गया जो कम भारी बात नहीं है ।

ओली–प्रचण्ड गठबन्धन से सिर्फ कम्युनिस्ट ही लाभप्रद नहीं हुआ बल्कि अखण्ड नेपाल देश ही निर्वाचन पश्चात कम्युनिस्ट शासित देशों की पंक्ति में खड़ा हो गया । यह कम्युनिष्टों के इतिहास में बहुत ही दुर्लभ उपलब्धि हुई । इस उपलब्धि के कारण नेपाल विश्व को ही आश्चर्यचकित कर दिया । नेपाल में ऐसा होना स्वाभाविक होते हुए भी विश्वास करना असहज हो गया । जनमानस की सोच दो भागों बंट गई । कुछ लोगों का मानना था कि कम्यनिष्ट पार्टी निर्वाचन के द्वारा सत्ता में पहुंची है तो सही ही है पर कुछ की नजरों में यह पार्टी संसदीय प्रथा को गन्दा कर रही है जैसी सोच प्रस्फुटित हुई । एमाले और माओवादी दोनों वामपन्थी अर्थात एक ही बिरादरी के होने से दोनों एक दूसरे में मिल गया ।

परन्तु एमाले संसदीय प्रथा के पुराना खिलाड़ी होने के कारण निजी लाभ तथा पारिवारिक सुख प्राप्त करने में पहले से माहिर था । माओवादी देर से आने के कारण उसे व्यक्तिगत लाभ तथा निजी स्वार्थ पूरा करने में कुछ देरी लगी । मजे की बात तो यह है कि इस प्रथा ने एक दूसरे को दुश्मन के रूप में चित्रित कर दिया है । व्यक्तिगत लाभ तो मिल रही है पर आमने–सामने आ जाने पर द्वन्द की भावना उत्पन्न हो रही है । स्वार्थ जब हावी होती है तो वहां झगड़ा होना निश्चित है । भागबन्डा नहीं मिलने पर मतभेद होना तो स्वाभाविक है । यह तो सर्वविदित ही है कि ओली चुनाव जीतने के लिए प्रचण्ड को अपने पार्टी में मिलाया । और प्रचण्ड भी सुरक्षित होने की आस लेकर एमाले में मिश्रित हो गया परन्तु स्वार्थ तो दोनों ओर था । किसी को राजनीतिक आवास चाहिए था तो किसी को जीत । माओवादी भी एमाले द्वारा बनाए गए सांगठनिक महल में प्रवेश कर गया और ओली के पश्चात खुद को प्रमुख बनने का सपना देखने लगा । फलस्वरूप चुनाव से पहले की गई बातों के अनुरूप दोनों पार्टी एकता के औपचारिक बन्धन में बंंध गया । दोनों पार्टी में यह सहमति हुई कि पहले केपी ओली प्रधानमन्त्री बनेंगे और उसके बाद प्रचण्ड प्रधानमन्त्री बनेंगे । पूर्वजों की विरासत की तरह उनलोगों ने प्रधानमन्त्री पद का बंटवारा कर लिया ।

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भागबन्डा तो हो गया परन्तु कुर्सी में इतना फेविकल गिरा है कि जो उस पर बैठ गया शायद उसको उठाने के लिए शल्यक्रिया ही करनी होगी । इसी विषय पर मुझे गोनू झा की एक कथा याद आ रही है । ‘सम्पति का बंटवारा’ जिसमें एक कम्बल और एक भैंस का बंटवारा बांकी रहता है । जो सिर्फ एक एक ही होता है । अब इसको दोनों भाइयों में किस प्रकार बांटा जाय सब सोच में पड़ जाते हैं । तो दोनों का बंटवारा इसप्रकार हुआ कम्बल दिन में एक भाई लेगा और रात में एक भाई, जिससे रात वाला भाई तो कम्बल से लाभान्वित होता था, परन्तु दिन वाला भाई को इसप्रकार के बंटवारा से कोई उपलब्धि नहीं होती थी । इसलिए दिन वाले भाई ने कम्बल को भीगाकर रख दिया । जिससे रात बाले भाई भी उस कम्बल के फायदा को लेने से वंचित हो गया । अब इसी प्रकार भैंस का बंटवारा भी किया गया । भैंस का मुख वाला भाग एक भाई लेगा और पीछे वाला भाग दूसरा भाई जिससे एक भाई भैस को चारा खिलाता और दूसरा दूध दूह ले जाता । कुछ दिनों तक तो यह प्रक्रिया चली पर बाद में जिस भाई के हिस्से में आगे का भाग पडा था वह दूध दुहते वक्त भैस को पीटने लगा जिससे भैंस दूध देना ही बन्द कर देती थी ।

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अब इस सत्ताधारी पार्टी में दोनों में क्या खिचड़ी पक रही है जिससे पार्टी में कुर्सी की खींचातानी चल रही है । फिलहाल देश विपत्ति की घड़ी से गुजर रहा । पर जो देश का संरक्षक है वह अपने कुर्सी के मोह में भक्षक बन गया है । विश्व के विभिन्न राष्ट्रों ने नेपाल के कोरोना कोष में अरबों का सहयोग किया है परन्तु उसका सदुपयोग सही से नहीं हो रहा है । जनता उससे लाभान्वित नहीं हो रही है । जनता भूख से और कोरोना के संक्रमण से मृत्यु को गले लगा रही है । सरकार द्वारा इससे सुरक्षित होने के उपायों का बहुत अभाव है । न आइसोलेशन की व्यवस्था है न ही उचित दवा की व्यवस्था है । सरकार की नजरों में जनता का मूल्यांकन तुच्छ दिखाई दे रहा है । अतः नेपाल की जनता हरि भरोसे चल रही है । अब इस प्रकार के देश की स्थिति में तो जनता को स्वयं सजग होकर रहना होगा अन्यथा परिणाम भयावह दृष्टिगोचर हो रहा है ।
समग्र में इस कुर्सी की लड़ाई में जनता अत्यधिक प्रभावित हो रही है । जनमानस में कोरोना संक्रमण के साथ ही देश की राजनीतिक गतिविधि का त्रास भी कम नहीं है । जनता कोरोना के कारण एक आपस से भी त्रसित है और नेताओं के लोभ लालच को देखकर भी चकित है । फिलहाल विश्व ही संकट में डूबा हुआ है । अभी तक इस कोरोना महामारी से बचने का कोई उपाय सामने नहीं आ पाया है । अर्थतन्त्र घटता जा रहा है । लोगों को बेरोजगारी का सामना करना पड़ रहा है पर बिडम्बना तो देखिये हमारे देश के शासक जनता की देखभाल करने के बजाय कुर्सी के लिये बेचैन हैं ।

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