झूठा दोषारोपण : भरत मल्लिक
झूठा दोषारोपण
सृष्टियो मे सर्वोत्तम सृष्टि
मानव को, श्री ब्रह्माजी ने बनाया
बल, बुद्धि और विवेक के बल पर
वह सव जीवों पर छाया
सव जीवों मे ज्ञानी होकर भी
वह अज्ञानी सा बन जाता है
हत्या, हिंसा अत्याचारी होकर भी
सत्यमार्गी का ढोंग रचाता है
तत्काल भले ही स्वयं को बेदागी सा लगे
पर देवाें की नजर से बच सकता नहीं
राहाें में कांटे रखकर कोई
उससे बचना कैसे चाहे
समदृष्टि जगत में है कोई
जो निष्पक्ष न्याय करता है
कर्मानुसार फल को देकर
निर्वल को वल देता है
मन, बचन एवं कर्म से
दूसरों को आघात पहुंचाने वाला
प्रार्थी भी नहीं रह जाता है
पश्चात् अपने कृत्य का फल पाकर
करदे मुक्ति, पुकार उठता है
फिर कैसे सुने पुकार
उन नृशंसकों की
जो बल, ब’द्धि पाकर भी
करते रहते अपकार
जब हो जाती, अनसुनी पुकार
तब कहता, देव काम करते हंै
अंधानुसार,
पर पीछे मुड देखता नहीं
क्या किया है तुमने
बिना सोचे बिचार
दोष न दो
तुम उन्हें बेकार


