लोकतन्त्र पर कोरोना का आवरण : अंशु झा
हिमालिनी, अंक ऑक्टोबर 2020। कोरोना महामारी के कारण विश्व भर का लोकतन्त्र प्रणाली डगमगाया तो है परन्तु हमारे देश का लोकतन्त्र कुछ अधिक हिल गया है । शायद यह सच नहीं, कोरोना महामारी को चादर बनाकर खुद को ढकने का नाटक बडे ही जोर शोर से चल रहा है क्योंकि यहां का लोकतन्त्र तो पहले से ही हिला हुआ है । बिना कील और पेंच का लोकतन्त्र न जाने कब दुर्घटनाग्रस्त हो जाय, यह कहना नामुमकिन है । अगर हम इस विषय पर चिन्तन करेंगे तो पता चलेगा कि हमारा लोकतन्त्र पहले से ही संक्रमित है । कोरोना महामारी को बस एक आवरण बनाया जा रहा है ताकि पुरानी गन्दगी को इस महामारी नाम के चादर से ढका जा सके ।
चुनाव के द्वारा हमने केन्द्र को बहुमत का सरकार दिया । जनता को इस सरकार से बहुत ही अपेक्षाएं थी । जनता को लग रहा था कि वर्तमान सरकार हमारी है और हमारे हित के लिए सदैव तत्पर रहेगी परन्तु जनता के सोच अनुरूप कुछ नहीं हो पाया । नेपाली जनता इस महामारी के वक्त भी हरि भरोसे ही जीवन व्यतीत कर रही है । लोकतन्त्र का मूलभूत मूल्य मान्यताएं सर्वहिताय, सत्यता, समानता, कानून का शासन, न्याय, विविधता, जीने की स्वतन्त्रता, खुशी को ढूंढ पाना, लोकप्रिय सार्वभौमसत्ता और देशभक्ति है । परन्तु इस देश का एक भी नागरिक इन मान्याताओं को महसूस तक नहीं कर रहा है । आखिर क्यों ? लोकतन्त्र की अनुभूति हमें क्यों नहीं हो रही ?
दार्शनिक युवाल नोआह हरारी ने भविष्यवाणी की थी कि कोरोना महामारी से विश्व भर का लोकतन्त्र संकुचित हो जायेगा और सरकारें खुद को शक्तिमान बनाने के लिए नए नए पैतरे अपनाएंगे । उक्त भविष्यवाणी अन्य देशों का तो क्या कहना पर हमारे देश के लिए सही साबित हो रही है । हरारी का कथन हमारे नवगणतान्त्रिक देश में नियति बनकर दिखाई दे रही है । हम जिस परिस्थिति में जीवन जीने के लिए बाध्य हैं उससे अन्दाजा लगाया जा सकता है कि लोकतन्त्र कब से संक्रमित है । पहले से ही या कोरोना काल में यह संक्रमित हुई है । इस वक्त अगर हम उत्तरदायित्व तथा कर्तव्यबोध बीच की दूरी को देखते हैं तो पता चलता है कि राजनीति दृश्य अदृश्य दोनों प्रकार के किटाणुओं से ग्रसित है । २०७२ साल के महाभूकम्प के समय में भी पीडित लाचार आम नेपालियों के शोक से शक्ति अर्जित की गई थी और अभी भी वही हो रहा है । परन्तु अभी की जनता पहले से कुछ सक्रिय दिखाई दे रही है जिसका श्रेय सामाजिक सन्जाल को दिया जा सकता है । मैथिली में एक मुहाबरा है, काठक हडिया एकहिबेर आगि पर चढैत अछि । अर्थात फिलहाल विश्व ही कोरोना महामारी से आक्रान्दित है तो हमारा देश क्यों न हो । परन्तु इस वक्त भी राजनीतिक ठेकेदारों द्वारा निरीह जनता के दुख से शक्ति बटोरने का प्रयास जारी है ।
चुनाव से पहले तो लम्बी लम्बी बात होती है परन्तु संविधान कार्यान्वयन के विकट अवस्था में प्रतिबद्ध नेतृत्व के अभाव से बहुआयामिक संकट दृिष्टगोचर हुआ । फिलहाल संसद के अन्दर राजनीतिक दलों के बीच संविधान सुधार तथा परिकल्पित पद्धति प्रति अलग अलग अवधारणाएं तो है ही संसद के बाहर भी शक्तियों में असन्तुष्टि बरकरार है । पद्धति प्रति की असहमति और उसमें परिमार्जन का कथन भी तो गलत नहीं है । इसके लिए तो लोकतन्त्र में विचार किया जा सकता है ।
जनआन्दोलन के जनादेशों का मूल्यांकन नहीं करने से ही सरकार असफलता का मार्ग प्रशस्त की है । सत्ता सुख में लिप्त किसी ने भी जनआन्दोलन के जनादेश प्रति अडिग अडान नहीं दिखाया । बस राजनीतिक सत्ता–खेल और राजकीय अवसर पाने तक ही सीमित रह गया । इसलिए पद्धति सिर्फ औपचारिक रूप से रह गई है । उसमें उमंग उत्साह का कहीं नामोनिशान नहीं रहा । लोकतन्त्र स्थापना के लिए जनता का त्याग, बलिदान सब असफल ही प्रतीत हो रहा है । जनआंदोलन में हजारों नेपाली महिलाओं की मांग उजडी, हजारों बच्चों ने अपना अभिभावक खोया, कितनी मांओं की गोद सूनी हुई परन्तु यह सब महत्वहीन हो गया बस स्वार्थ पूर्ति के लिए । फिलहाल जनता सरकार की संवेदनहीनता पर दुखी है और इससे लोकतन्त्र प्रति की आस्था में भी कमी होना स्वभाविक है ।
समग्र में जनता दुखी होगी तो अपनी असन्तुष्टि तथा शिकायतें तो करेंगी जो लोकतन्त्र भी कहता है । असन्तुष्टि व्यक्त करना, अपने स्वतन्त्रता का पूर्ण उपभोग करना लोकतन्त्र का ही गुण है । परन्तु फिलहाल की अवस्था कुछ अलग है । असन्तुष्टि जाहिर करने वालों को दबाया जाता है । कोरोनाकाल में सरकार की चरम लापरबाही के कारण निःसहायपन एवं निराशा की अभिव्यक्ति छाई हुई है । सरकार कोरोना महामारी को अपना ढाल बना रही है । जिससे जनता में और अधिक असन्तुष्टि बोध हो रही है ।
संविधान ने संसद् जनप्रतिनिधिमूलक, सरकार जनउत्तरदायी और न्यायपालिका जनअधिकार की संरक्षण हेतु स्वतन्त्र तथा स्वच्छ प्रकृति की परिकल्पना किया है एवं प्रत्येक नागरिक को स्वतन्त्रता और सम्मानपूर्ण जीवन यापन की प्रत्याभूति दिलाया है । परन्तु फिलहाल सदाचार तथा राजनीति में विरोधाभास दिखाई दे रहा है । इस वक्त जनता कुशासन के चक्रव्यूह में फंसी हुई है । संवेदनहीनता, अमानवीयता से त्रस्त नेपाली जनता की आवाज को उठाने वाला कोई नहीं है । अगर कोई उठाने की कोशिश भी करता तो उसे दबाया जाता है और एक ही अस्त्र प्रयोग किया जाता है, कोरोना महामारी का । निर्वाचित नकाब पहनकर भ्रष्टाचार और लूट मचाया रहा है । जनता को गुमराह करने के लिए सुखी नेपाली समृद्ध नेपाल का सपना दिखाया जा रहा है । जो एक ढोंग नजर आ रहा है । प्रतिनिधिसभा, प्रदेशसभा जनता के सुख दुःख का दर्पण होना चाहिए परन्तु कोरोना महामारी से उस दर्पण में पर्दा लगाया जा रहा है ।


