भक्ति गीतों में फ़िल्मी गानों की धुन का तड़का: कितना सही?
यूं तो पूजा पाठ और भक्ति के लिए कोई एक समय निर्धारित नहीं है. जिसकी जब श्रद्धा हो वो किसी भी धार्मिक काम में लग सकता है. लेकिन अगर नवरात्र चल रहे हों तो बात ज़रा अलग हो जाती है.
जहां देखो वहीं भजन-कीर्तन या फिर जगराते आयोजित किए जाते हैं. लेकिन क्या इन कार्यक्रमों में भी वही होता है जो आजकल ज़्यादातर हो रहा है?कहने का मतलब ये है कि क्या आपको अपने यहां फ़िल्मी गानों की धुनों पर गाए जाने वाले भजन सुनाई देते हैं, जैसे कि ‘चोली के पीछे क्या है’ की धुन पर कोई भजन या फिर इमरान हाशमी की फिल्म ‘जन्नत’ के गानों की धुन पर कोई भजन.
सच बताइए कि जब आप बॉलीवुड के किसी गाने की धुन पर बने किसी भजन को सुनते हैं तो आपके दिमाग में पहली छवि किस की आती है, माधुरी दीक्षित की या फिर माता की? इन गानों को गाने वालों के बारे में आप क्या सोचते हैं?
संगीत की तालीम नहीं
अनूप जलोटा भक्ति संगीत में अपना नाम बना चुके बड़े गायकों में शुमार किए जाते हैं. बीबीसी ने उनसे भक्ति संगीत में आए इन बदलावों के बारे में पूछा.
अनूप जलोटा कहते हैं, ”ऐसा है कि जिस गायक की जिनती क्षमता होगी वो उतना ही तो करेगा. उसने तो सिर्फ फ़िल्मी गाने ही सुने हैं और गाने उसे आते नहीं तो वो तो ‘मंदिर के पीछे क्या है मंदिर के पीछे’ ये ही गाएगा न. इनमें से ज़्यादातर लोगों ने संगीत की कोई तालीम नहीं ली होती. इनमें ऐसी काबिलियत ही नहीं है कि वो किसी अच्छे भजन को बना सकें इसलिए वो फ़िल्मी गानों का सहारा ले लेते हैं.”
अनूप तो ये भी कहते हैं कि ऐसे गायकों से नाराज़ होने से बेहतर है कि आप उन पर तरस खाएं. साथ ही वो एक हिदायत भी देना चाहते हैं.
अनूप कहते हैं, ”मैं तो ऐसे गायकों को यही सलाह दूंगा कि संगीत की शिक्षा ले लें ताकि खुद से कुछ अच्छा काम पर पाएं.”
जगराते भी, म्यूज़िक एलबम भी
सिर्फ जगराते ही क्यों बाज़ार में आपको ऐसे अनगिनत रिकॉर्ड मिल जाएंगे जिनमें फ़िल्मी गानों की धुनों पर आधारित भजन होंगे.
भक्ति संगीत का एक और जाना माना नाम अनुराधा पौडवाल कहती हैं कि इस चलन के भी दो पहलू हैं.
वो कहती हैं, ”बड़ी कंपनी हो या फिर कोई छोटी कंपनी वो तो यही देखते हैं कि बाज़ार में क्या बिक रहा है. नया गाना बनाकर उसको प्रचलित करना इसमें बहुत पैसा लगता है और हर कोई कम से कम पैसे में काम कर लेना चाहता है.”
अनुराधा कहती हैं, ”हम लोग किस्मत वाले थे कि हमें नए-नए भजन गाने को मिले. आज की तारीख में लाखों गायक हैं पर परेशानी इस बात की है कि इन लोगों को सही कम्पोज़र नहीं मिलते. तो ऐसे लोगों के पास बस एक ही तरीका बचता है कि किसी भी प्रचलित गाने की धुन पर कोई भजन लिखवा लेना और उसे गाना.”
‘फिल्मी गानों का चित्रण अभद्र’साथ ही वो ये भी कहती हैं कि फ़िल्मी गानों पर आधारित भजन गाने की वजह ये भी होती है कि ऐसे गाने पहले से ही लोगों की ज़ुबान पर होते हैं और गायक के लिए लोगों के साथ ताल-मेल बिठाना आसान हो जाता है.
लेकिन क्या ऐसे गानों को सुनकर अनुराधा जी को कोई आपत्ति नहीं होती?
इसके जवाब में वो कहती हैं, ”आपत्ति इस बात से होती है कि ज़्यादातर फ़िल्मी गानों का चित्रण बड़े ही अभद्र तरीके से किया जाता है. जब ऐसे गानों पर आधारित भजन हम सुनते हैं तो हमारे दिमाग में वही फ़िल्मी गाने आ जाते हैं. धुन से कोई समस्या नहीं है पर चित्रण की वजह से वो गाने अभद्र हो जाते हैं.”
अनुराधा पौडवाल ये भी कहती हैं कि चाहे फ़िल्मी गाने हो या फिर भजन बने तो सात सुरों से ही हैं.स बीबीसी।

