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लेखनी,विधाता की टल नहीं सकती बस! यूं ही… : लालिमा

 
___सिसकारियां घर की___

मन उदास ,अंतर्मन उलझीत
कुछ ही पल में घर ,होगा समर्पित
सिसक रहे है ,सारे दरवाजे
जिसे खोलती थी, वो प्यार से

सामान सारा तो सिमट चुका था
अब ,बांध आंखों का टूट रहा था
भोर पसरने वाली थी,उस दिन की
बस, दर्दे दिल तो साधे थी चुप्पी

विवश लाचार वो करुणमयी आंखें
पत्थर के ईश्वर, बन गए थे पत्थर
सजी कोठरी,सब हो गये खाली
सिर्फ,दीवार में अटकी कैलेंडर सारी

कह रही कैलेंडर, रुक जा थोड़ी
अरे,रात अभी है थोड़ी सी बाकी
गौशाला हो गई थी पूरी खाली
उदास अपने वो बगीचे और कुंऐ

लद रहा था सामान ,अब ट्रक पर
निकलना तो था ,सब त्याग कर
बरसात सी झर रही मां की आंखें
रो रही , सर को जमीन से छू के

समझाने के कोई शब्द नहीं थे
सारे निस्तब्ध निर्वाक खड़े थे
मजबूरी बस इतनी सी थी
मां को सिर्फ छह बेटियां थी।

हम सब बहना तो ससुराल में थी
समय परिस्थिति कुछ और ही थी
सज्जन थे मेरे आस पड़ोस सारे
पर, दुश्मन बन गए कुछ अपने मेरे

कोशिश थी हमारी स्वस्थ रखने की
अंततः,जीवन का अंत सुखमय ही था
लेखनी,विधाता की टल नहीं सकती
बस! यूं ही सुख दुख से दुनिया चलती। 🙏
लालिमा


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