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जब सोनिया गांधी से मिलने पहुंचें पुराने गिरोह अपने नए रंग और कलेवर में…… ?

 

विवेकानंद झा, इंग्लिस से हिंदी अनुवाद श्री शिशिर कुमार,(लेक्चरर,इंग्लिश) रांची | कांग्रेस पार्टी जिसे प्रख्यात लेखिका तवलीन जी ने एक परिवार विशेष के एकाधिकार को देखते हुए अपने एक बिल्कुल सटीक टिप्पणी में एक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी कहा , संभवतः आज अपने सबसे संकटपूर्ण स्थिति में खड़ी है: शायद आज की कांग्रेस अपने अस्तित्व के संकट से अभूतपूर्व रूप से जूझ रही है और संभवतः १९६७ में सुश्री इंदिरा गांधी जी के समय के बाद ये सबसे बड़ा संकट है। यदि १९६७ के कांग्रेस की बात करें तो तत्कालीन संकट कांग्रेस के भीतर कांग्रेस के कद्दावर नेताओं – के कामराज , संजीव रेड्डी,अतुल्य घोष और निलांजीगप्पा की चौकड़ी से मिल रही थी जो कांग्रेस की तत्कालीन कमजोर स्थिति का फायदा उठाने के साथ ही एक कमजोर प्रधानमंत्री के रूप में सुश्री इंदिरा को बिठाने के बावजूद उनकी बागडोर खुद के हाथ में बनाए रखने के षड्यंत्र में तल्लीन थे। दरअसल वो दौर कांग्रेस के लिए संक्रमण का दौर था जब की भारत – चीन युद्ध में मिली विफलता के साथ ही आर्थिक मुद्दे पे मिली चुनौतियों के कारण प्रधानमंत्री के रूप में श्री जवाहर लाल नेहरू जी की प्रतिष्ठा को गहरी चोट पहुंची थी।

इस चौकड़ी के एक संगठित रूप से अस्तित्व में आने का एक अहम कारण तत्कालीन कांग्रेस के वरिष्ठ दिग्गज नेता श्री मोरार जी देसाई द्वारा मिलने वाली चुनौती थी जो कि नेहरू जी के बाद सत्ता में प्रधानमंत्री के रूप में स्थापित होने को पूर्ण रूप से तैयार थें।परन्तु श्री देसाई जी ना सिर्फ इस चौकड़ी पे भारी पड़ रहे थें वरन श्री जवाहर लाल नेहरू को भी अपने वंश से सत्ता दूर जाती दिख रही थी (यदि मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री के पद पे स्थापित हो जाते) । ये एक ऐसा मिलन बिंदु था जहां पे कांग्रेस के कद्दावर नेता चौकड़ी और जवाहर लाल नेहरू के हितों को सिद्ध करने के लिए मोरारजी देसाई को कमजोर करना और सत्ता के पथ से विचलित करना आवश्यक था।

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ऐसे दौर में इस चतुर चौकड़ी में के कामराज ने खुद की स्थिति को केंद्रीय सत्ता में स्थित नेहरूजी की दृष्टि में तारणहार की भूमिका में स्थापित करने के लिए एक राजनैतिक चाल चली जिस से मोरारजी देसाई सत्ता की चौखट तक से बाहर छोड़ दिए जाते।

नेहरू की कैबिनेट के गठन के पूर्व नेहरू ने अभी सभी मंत्रियों को अपने त्यागपत्र देने को कहा और इसके साथ ही नेहरू को नए कैबिनेट के गठन की स्वतंत्रता मिल गई। साथ ही नेहरू जी को जिस बहुप्रतीक्षित राहत की आवश्यकता थी के. कामराज की योजना ने वो राहत मोरारजी देसाई द्वारा उत्पन्न आसन्न चुनौती को समाप्त कर तत्कालीन रूप से दे दी। साथ ही के कामराज ,संजीव रेड्डी,अतुल्य घोष और निलांजीगप्पा की चौकड़ी द्वारा जिस कठपुतली सरकार के लिए प्रधानमंत्री पद पे एक अपरिपक्व या कोमल दृष्टिकोण वाले चेहरे की तलाश थी वो तलाश इन्हे श्री लाल बहादुर शास्त्री पूरी होती नज़र आई।यद्यपि लाल बहादुर शास्त्री जी बेहद अल्प कालीन अवधि (१९६४-६६) के लिए ही सत्ता में रहें जिसके बाद सुश्री इंदिरा गांधी ने भारत के तीसरे और प्रथम महिला प्रधानमंत्री के रूप में सत्ता सम्हाली। इंदिरा गांधी जिसे ‘ गूंगी गुड़िया ‘ के रूप में देखा जा रहा था उन को प्रधानमंत्री बनाने के लिए नेताओं की इस चौकड़ी ने पूरी ताकत लगाई क्योंकि अब इन्हे सत्ता की बागडोर अपने हाथों में दिख रही थी। पर इंदिरा जी ने ना सिर्फ अपनी ‘ गूंगी गुड़िया’ की छवि तोड़ी अपितु अपने साहसिक निर्णयों से इस चतुर चौकड़ी की संभावनाओं पे विराम चिह्न लगा दिया। बड़े ही अल्प अवधि में ही युवा इंदिरा ने कांग्रेस के भीतर और बाहर की सभी चुनौतियों पे विजय प्राप्त की पर कालांतर में इसी इंदिरा गांधी ने स्वयं राष्ट्र को भी अपनी छवि के आगे बौना साबित करने का असफल प्रयास किया जब उन्होंने संवैधानिक प्रजातंत्र पे एक ग्रहण काल समान आपात काल लागू करने का निर्णय लिया।

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इंदिरा गांधी ने भी जवाहर लाला नेहरू की ही भांति वंश परम्परा को जीवित रखने और सत्ता में स्थापित करने हेतु अपने दोनो पुत्रों पहले श्री संजय गांधी तथा कालांतर में श्री राजीव गांधी जी को निरंतर राह दिखलाने का प्रयास किया। माननीय श्रीमती सोनिया गांधी जी को भी बिल्कुल अपनी सास की भांति ही विषम परिस्थितियों में कांग्रेस अध्यक्ष की भूमिका मिली।अपने पति एवं दिवंगत भूतपूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय राजीव गांधी के आठ वर्षो के सत्ता सम्हालने के बाद पार्टी के भीतर हो रहे विद्रोह के तेवर दिखलाने वाले तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष डॉ सीता राम केसरी को किनारे लगाते हुई सोनिया गांधी जी ने कांग्रेस अध्यक्ष का पद सम्हाला।

आने वाले चुनावों में अच्छा प्रदर्शन करने वाली कांग्रेस नीत गठबंधन दुर्भाग्यवश सत्ता के शीर्ष में आने के बाद भी सपा प्रमुख श्री मुलायम सिंह यादव जी द्वारा सहयोग न किए जाने के कारण भी सोनिया इस देश को प्रधानमंत्री न बन सकीं। तब सोनिया गांधी ने अपने पार्टी के वरिष्ठ नेता श्री मनमोहन सिंह जी का प्रधानमंत्री का चेहरा बनाया ताकि इस अस्सी वर्षीय नेता से अगला चेहरा युवा राहुल गांधी का हो।परन्तु उफ़ ये चाहतें किसी के वश में कहां होती।

भारत की २१ वीं शताब्दी में २०वीं शताब्दी की इच्छा रखने की स्थिति नहीं रही थी।गांधी – नेहरू से मंत्र मुग्ध २० वीं सदी में गांधी – नेहरू वंश के लिए सत्ता की राह तुलनात्मक रूप से आसान थी पर २१वीं सदी की जनता २०वीं सदी के नेतृत्व वाले चेहरों पे प्रश्नचिह्न लगा रही थी ।

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शायद अतीत में सर्वाधिक काल तक सत्ता में रहने वाली कांग्रेस और उस के केंद्र में स्थित गांधी नेहरू वंश २१वीं सदी में किसी दुर्भाग्य से कम नहीं समझा जा रहा था और ऐसे में कांग्रेस के लिए चुनाव एक कठिन डगर थी। दूसरा अहम कारण था पंथनिरपेक्षता का वो ताना बाना जिसे कांग्रेस अपनी विरासत समझ बैठी थी । इस पंथनिरपेक्षता के संदर्भ में उठ रहे कठिन सवालों का कांग्रेस समुचित रूप से जवाब नहीं दे रही थी। वहीं हिन्दू मतो का अलग अलग जातियों में बांटना बंद हो गया था।परिणाम स्वरूप कांग्रेस का प्रदर्शन पिछले दो लोकसभा २०१४ और २०१९ के चुनावों में क्रमशः ४४ और ५२सीटों सिमट के रह गई । कोई दोराय नहीं कि आज कांग्रेस में शामिल नेता अपने अपने भविष्य को ले के सशंकित है।इस से भी बुरी बात ये है कि वर्तमान कांग्रेस नेतृत्व (श्रीमती सोनिया गांधी )कांग्रेस में किसी वैकल्पिक नेतृत्व को नहीं उभरने दे रहीं। बिहार चुनाव से उपजी निराशा पार्टी के २३ वरिष्ठ नेताओं द्वारा लिखे उस पत्र की मांग से स्पष्ट होती है जिसमे उन लोगो ने पार्टी की अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी से एक पारदर्शी व्यवस्था और पूर्णकालिक सक्रिय नेतृत्व प्रणाली की मांग की है। ये सोनिया गांधी जी के लिए अत्यंत विषम परिस्थिति है जो राहुल गांधी को प्रधानमंत्री पद पे आरूढ़ करना चाहती हैं। पर जबकि पार्टी का प्रदर्शन निरंतर चिंता व नैराश्य को जन्म दे रहा है वहीं पार्टी के अंदर उठने वाली विरोध की आवाजें प्रबल होते जा रही हैं ऐसे में ये देखना रोचक होगा कि क्या श्रीमती सोनिया गांधी अपनी सास स्वर्गीय श्रीमती इंदिरा जी की तरह परिस्थितियों को नियंत्रित कर पाएंगी या फिर भारतीय कांग्रेस पार्टी के अवसान का शोक संदेश लिखेंगी।

Vivekanand Jha is an author of Yes, I am Bihari, The Living Legends of Mithila. He is an author and a Public Intellectual.

 

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