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पुजारी अमन के, पर नोचते कबूतर का : गोलोक विहारी राय

 
तंग गली शहर का

बरबस उतारने लगे, नाग असर जहर का। 
कंगन कलाई की, पूछती भाव खँजर का। 
ज़िंदगी! मैंने देखी, बार- बार कई बार, 
पुजारी अमन के, पर नोचते कबूतर का। 
करतूत अब बखानती, तंग गली शहर का ....

कहते कहानी भौंरे, कलियों के कहर का। 
काँटे लगाते फूलों पर, मरहम नश्तर का। 
शतरंजी प्यार में, पिट गए मोहरे सभी, 
दिखाकर वजीर, चलती गयी चाल नज़र का।
करतूत अब बखानती, तंग गली शहर का ...


करतूत अब बखानती, तंग गली शहर का। 
उगलने लगती भँवरी, राज अब लहर का। 
तरसती रही नदिया, दरिया से मिलने को,
बनकर दीवार खड़े, रहबर अब डगर का। 
करतूत अब बखानती, तंग गली शहर का ....

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