याददाश्त और प्रजनन शक्ति घट रही प्रदुूषण से : वीरेन्द्र बहादुर सिंह
वीरेन्द्र बहादुर सिंह, बहुत कम लोगों को पता है कि उच्च वायु प्रदूषण वाले इलाकों में रहने वाली बुजुर्ग महिलाओं को अल्जाइमर यानी याददाश्त कमजोर होने की बीमारी हो सकती है। शोध से पता चला है कि प्रदूषित वायु में सांस लेने से महिलाओं के दिमाग में सिकुड़न होती है, जैसा अक्सर अल्जामइर में होता है। वैज्ञानिकों के अनुसार कम दिमागी वाल्यूम डिमोशिया और अल्जाइमर के मुख्य कारकों में से एक है। प्रदूषित वायु दिमागी तंत्र में बदलाव पैदा कर नर्व सेल नेटवर्क को बाधित करती है। इससे अल्जाइमर की बीमारी के लक्षण बढ़ते हैं।
वायु प्रदूषण स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है, यह तो हम सभी जानते हैं, पर यह प्रजनन संबंधित समस्याएं भी खड़ी करती है, इसकी जानकारी बहुत कम लोगों को है। प्रदूषित हवा में आक्सीजन की मात्र बहुत कम होती है, जिससे यह शुक्राणुओं और अंडाणु ओं को नुकसान पहुंचा सकती है। अगर कोई अधिक समय तक प्रदूषण में रहता है ते शुक्राणुओं और अंडाणुओं की संख्या को तो नहीं, पर उसकी गुणवत्ता निश्चित रूप से प्रभावित हो सकती है। खराब हो रही एयर क्वालिटी इंडेक्स (एक्यूआई) धीरेधीरे बहुत ज्सादा गंभीर मामला बनता जा रहा है, जो फेफड़े की प्रणाली, हृदय और आंखों को प्रभावित करने के साथ-साथ हार्मोन में बदलाव भी लाता है।
0 प्रदूषण के कारण महिलाओं को बंधत्व का खतरा
महिलाओं का भी प्रजनन तंत्र वायु प्रदूषण के कारण खतरे में पड़ता जा रहा है। प्रदूषण अंडाणुओं का जहां विकास होता है, उस अंडाशय की कोशिकाओं पर प्रतिकूल असर डालता है। अगर कोई महिला लंबे समय तक वायु प्रदूषण के संसर्ग में रहती है तो फोलिक्स की गुणवत्ता में ही नहीं, अंडाणुओं के जिनेटिक मेकअप में भी समस्या पैदा हो सकती है।
प्रदूषित हवा में ऐसे तमाम प्रदूषक हैं, जो खास कर के प्रजनन संबंधित स्वास्थ्य के लिए हानिकारक साबित हो सकते हैं। इसमें माइक्रोंस (पीएम 10) से छोटे सूक्ष्म कण, नाइट्रोजन आक्साइड और सल्फर डायोआक्साइड का समावेश होता है। ये प्रजनन क्षमता पर प्रतिकूल असर डालते हैं और ये असमय डिलीवरी तक करा सकते हैं।
ये प्रदूषक आईवीएफ ट्रीटमेंट की दर में भी महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। परंतु इस संबंध को स्थापित करने के लिए अभी तक औपचारिक अध्ययन नहीं किया गया है। पर बंधत्व के मामले की संख्या में धीरेधीरे अधिकता देखने को मिल रही है, जो पर्यावरण संबंधित वातावरण में गेट टूगेदर होने के कारण हो सकते हैं।
0 पुरुषों में देखने को मिल रहे बंधत्व के पीछे का वातावरण
शुक्राणुओं की कोशिकाओं के विकृत होने और कमजोर पड़ने के साथ जुड़े यंत्ररचना एंडोकाइन डिस्रप्टर एक्टिविटी (हार्मोन संबंधित असंतुलन) के रूप में भी जानी जाती है। हम सांस के रूप में जो हवा अंदर लेते हैं, उसमें छोटे-छोटे कण (मनुष्य के बाल से भी छोटे) कण होते हैं। जिसमें कापर, जिंक, शीशा आदि होता है, जो एस्ट्रोजनिक और एंटी एंड्रोजनिक होते हैं। अगर इन्हें लंबे समय तक सांस में लिया जाए तो ये टेस्टोस्टेरोन और शुक्राणुओं के कोष के उत्पादन में अवरोध पैदा कर सकते हैं।
इस समस्या के मूल में तथ्य यह है कि इस प्रकार की जहरीली हवा को सांस में लेने से ये शुक्राणुओं को अवनति और शुक्राणुओं के काउंट के गर्भ के लिए आदर्श रूप में जरूरी संख्या की अपेक्षा एक निश्चित स्तर तक नीचे ले जाता है। इतने कम काउंट, गतिशीलता और संकेंद्रण के साथ शुक्राणु फेलोपिन ट्यूब के अंदर पहुंचने के लिए सक्षम नहीं रहते। जिसके परिणामस्वरूप असंख्य प्रयास के बावजूद जीवनसाथी गर्भ नहीं धारण कर सकता।
टेस्टोस्टेरोन के स्तर में कमी होने से सहवास की इच्छा भी कम हो रही है। इस तरह वैवाहिक जीवन असफल हो जाता है। डीजल का उत्सर्जन और ओजोन के बढ़ रहे स्तर तथा हवा में मिश्रित सल्फर डायोक्साइड और छोटे-छोटे कण रक्त में रासायनिक प्रतिक्रिया पैदा करते हैं। जिसके कारण मुक्त मूलक (फ्री रेडिकल्स) में वृद्धि होती है, जो प्रजनन की क्षमता रखने वाले पुरुष के भी शुक्राणुओं की गुणवत्ता को परोक्ष रूप से प्रभावित करते हैं। अधिक वायु प्रदूषण के स्तर के संसर्ग मेे आने वाले नवजात का कम वजन, कमजोर विकास, नियत समय से पहले प्रसूति और नवजात की मौत के लिए जिम्मेदाार है, जो शुक्राणुओं के खराब गुणवत्ता का परोक्ष परिणाम है।
0 सुरक्षित रहें
पीएम 10 क्षमता वाले सुगंधित हाइड्रोकार्बंस शरीर में हार्मोन संबंधित बदलाव के लिए प्रत्यक्ष रूप से जिम्मेदार हैं। टेस्टोस्टेरोन और एस्ट्रोजन की अवनति वाले स्तर समागम की इच्छा कम करने के साथसाथ प्रजनन क्षमता को कम करते हैं।
प्रदूषण को पूरी तरह तो टाला नहीं जा सकता, पर जीवनशैली में कुछ बदलाव कर के और खानपान पर नियंत्रण कर के गर्भधारण के लिए आदर्श माने जाने वाले शुक्राणुओं का काउंट उचित स्तर बनाने के लिए मददगार हो सकता है। नीचे बताइ्र गई विधि अपनाने से तनदुरुस्त शुक्राणु विकसित करने के लिए, शुक्राणुओं की गुणवत्ता, मात्र, संकेद्रण और गतिशीलता बनाने में मददगार हो सकती है।
आहार में विटामिंस, खनिज और जरूरी पोषक तत्वों का समूह हो, इस तरह के एंटी आक्सिडेंट की मात्र बढ़ाएं, जो शुक्राणुओं को स्वस्थ रखने मेें मददगार होने के लिए जाने जाते हैें। एंटी आक्सिडेंट के सेवन को बढाने से शंक्राणुओं की गुणवत्ता सुधरने के साथसाथ कोशिकाओं की लंबी उम्र के लिए शरीर में जहां भी मुक्त मूलक (फ्री रेडिकल्स) होते हैं, उन्हें नष्ट कर के शरीर में सुरक्षा यंत्ररचना के रूप में काम करते हैं।
बंधत्व को दूर करने वाले डाक्टर अपने रोगियों को मास्क पहनने, अपने घर में ही नहीं वाहनों में भी प्यूरीफायर्स इंस्टाल करने की सलाह देते हैं। वे कहते हैं कि जहां तक संभव हो, वहां तक घर के अंदर ही रहें। सबसे उचित उपाय प्रदूषित क्षेत्र को छोड़ देना हैै। पर लोग इसके लिए कोई प्रयास नहीं करते। इसके लिए लोगोें को जाग्रत होना चाहिए और आफिसों में भी एयर प्यूरीफायर इंस्टाल करवाना चाहिए।
वीरेन्द्र बहादुर सिंह

