शिक्षकों की हत्या करना क्रान्ति नहीं है : राजनारायण यादव

खुद को सच्चा कम्युनिष्ट पार्टी कहनेवाला नेपाल कम्युनिष्ट पार्टी अर्थात् नेत्रविक्रम चन्द ‘विप्लव’ (जिसको विप्लव समूह के रूप में जाना जाता है) के कारण समाज आतंकित होने लगा है । पार्टी के प्रायः सभी शीर्ष नेता भूमिगत हैं । ऐसी ही अवस्था में विप्लव समूह से आबद्ध कार्यकर्ताओं ने मोरङ जिला मिक्लाजुङ नगरपालिका–१ बर्खे निवासी शिक्षक राजेन्द्र श्रेष्ठ की गोली मार कर हत्या कर दी है । श्रेष्ठ स्थानीय सरस्वती आधारभूत विद्यालय के शिक्षक थे । शिक्षक श्रेष्ठ की एक ही गलती थी कि उन्होंने विप्लव समूह को चन्दा देने से इन्कार किया था ।
विप्लव समूह का कहना है कि श्रेष्ठ सत्ताधारी पूर्व माओवादी समर्थक हैं और वह शिक्षक के नाम में जासूसी का काम करते हैं । लेकिन प्रारम्भिक पुलिस अनुसंधान से पता चला है कि श्रेष्ठ ने चन्दा देने से इन्कार किया था । पिछली बार विप्लव समूह ने श्रेष्ठ के साथ एक खस्सी (बकरा) की मांग की थी । दोनों मांग को इन्कार करने से उनकी हत्या हुई है । श्रेष्ठ की हत्या आतंककारी गतिविधियों का एक नमूना है, जो सशस्त्र माओवादी जनयुद्ध का भी स्मरण कराता है ।
विप्लव समूह को नेतृत्व प्रदान करनेवाले नेत्रविक्रम चन्द दावा करते हैं कि वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था देश और जनता के हित में नहीं, देश में कम्युनिष्ट शासन व्यवस्था होनी चाहिए, इसीलिए क्रान्ति आवश्यक है । लेकिन इसतरह के हिंसात्मक आन्दोलन को क्या क्रान्ति कह सकते हैं ?नहीं । एक निर्दोष शिक्षक की इसतरह हत्या करना क्रान्ति नहीं हो सकती । यह तो सिर्फ राजनीति के नाम में मंचित एक बर्बरतापूर्ण आतंक है ।
जब कोई व्यक्ति खुद कमजोर होता है, तब वह इसतरह की हिंसात्मक घटना के लिए प्रेरित होता है । राजनीतिक नेतृत्व में नैतिक साहस ना होने से भी ऐसी घटना हो जाती है । विप्लव समूह से घटित यह घटना भी इसी का एक नमूना है । सशस्त्र युद्धकाल में तत्कालीन माओवादी ने शिक्षक मुक्तिनाथ अधिकारी की हत्या इसी तरह की थी । इस तरह की घटना क्रान्ति नहीं, कायरता है ।
आश्चर्य की बात तो यह है कि विप्लव समूह ने घटना को स्वीकार किया है और कहा है कि श्रेष्ठ जासूस हैं । माओवादी विद्रोह के समय में भी अगर किसी व्यक्ति के ऊपर व्यक्तिगत दुश्मनी होती थी तो इसीतरह का आरोप लगाया जाता था और सफाया होता था । आज वैसे ही घटना पुनरावृत्ति हो रही है । समाज और नागरिकों को आतंकित बनानेवाली इसतरह की घटना स्वीकार नहीं हो सकती ।
आज का समय प्रजातान्त्रिक समय है । अगर वर्तमान संविधान, कानून एवं राज्य व्यवस्था के प्रति असंतुष्टि है तो उसको जनमत से परिवर्तन भी किया जा सकता है । इसके लिए जनता में जाना पड़ेगा, चुनाव में बहुमत प्राप्त कर अपनी राजनीतिक दर्शन के अनुसार संविधान और कानून बनाया जा सकता है । ऐसी सर्वस्वीकार्य सुविधा होते हुए भी राज्य के विरुद्ध हिंसात्मक युद्ध करना और निर्दोष नागरिकों को मारना ठीक नहीं है ।
विगत दिनों में माओवादी ने १० साल से अधिक समय सशस्त्र युद्ध किया, उस युद्ध १७ हजार से अधिक नागरिक मारे गए । तब भी युद्धरत माओवादी की चाहत अनुसार नेपाल में कम्युनिष्ट शासन स्थापित नहीं हो सका । अन्ततः माओवादी को शान्तिपूर्ण राजनीति में ही आना पड़ा और संसदीय अभ्यास में अभ्यस्त पार्टियों से ही सहकार्य करना पड़ा । आज तत्कालीन माओवादी संसदीय प्रजातान्त्र का एक हिस्सा है । माओवादी द्वारा शुरु की गई सशस्त्र युद्ध और परिणाम ने भी पुष्टि की है कि हत्या, हिंसा और आतंक से राज्य व्यवस्था में परिवर्तन संभव नहीं है, तत्कालीन समय में उसी युद्ध में शामिल एक हिस्सा होने के नाते विप्लव समूह से आबद्ध लोगों को इतना तो पता होना ही चाहिए ।
शिक्षक श्रेष्ठ की हत्या उस समय में हुई है, जिस वक्त देश में राजावादियों का आन्दोलन जारी है । राजावादी लोगों का भी कहना है कि वर्तमान राज्य व्यवस्था ठीक नहीं है, राजतन्त्र को वापस करना चाहिए । राजावादी समूह हो या विप्लव समूह, दोनों अतिवादी समूह हैं । दोनों की राजनीतिक दर्शन में विधि और प्रक्रिया गौण और व्यक्ति महत्वपूर्ण हैं, जो विश्व के सभी देशों से समाप्त होता जा रहा है । एक व्यक्ति को खुश रख कर सम्पूर्ण देश में शासन–सत्ता संचालन करना है या जनता को खुश कर चुनाव के माध्यम से निर्वाचित होकर शासन–सत्ता चलाना है ? अवश्य ही दूसरा विकल्प ही सर्वस्वीकार्य है । इसीलिए विप्लव समूह को भी इसी विकल्प में आना ही होगा । क्योंकि जनता को आतंकित और निषेध कर राजनीति नहीं हो सकती ।
सरकार को भी इस घटना को गम्भीरता से लेना चाहिए । नागरिकों की सुरक्षा सरकार की जिम्मेदारी है । साथ में अगर विल्लव समूह के पास कोई राजनीतिक मुद्दा और मांग हैं तो उसको सम्बोधन कर शान्तिपूर्ण राजनीति के लिए प्रेरित करना भी होगा ।

