स्मृति शेष : सात्विक पत्रकारिता के पोषक थे कमल दीक्षित!
देश के जाने माने वरिष्ठ पत्रकार एवं माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में पत्रकारिता विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. कमल दीक्षित का भोपाल में निधन हम सबको चौकाने वाला है।
प्रो. कमल दीक्षित का जीवन मूल्य आधारित पत्रकारिता को समर्पित रहा। उन्होंने मूल्यानुगत मीडिया अभिक्रम समिति की स्थापना की और देशभर में मूल्य आधारित पत्रकारिता का आगाज किया।उन्होंने ब्रह्माकुमारीज की सात्विक सोच को जहां स्वयं आत्मसात किया वही ब्रह्माकुमारीज के मीडिया विंग के सहयोग से मीडिया के लोगो मे सात्विक पत्रकारिता को विकसित करने में मदद की। कमल दीक्षित ने अपने कठिन परिश्रम, सरल स्वभाव और कुशल संचार कला से पत्रकारिता एवं मीडिया शिक्षण में राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान प्राप्त किया। माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय के वे संस्थापक प्राध्यापक रहे और अपने शिक्षण काल में उन्होंने बेहतरीन पत्रकारों की पौध तैयार की।
प्रोफेसर कमल दीक्षित से मेरा परिचय अधिक पुराना नही था।यदि मैं प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय से न जुड़ता तो शायद कभी उनसे मुलाकात भी न हो पाती।सन 2012 में जब पहली बार मैं अपनी युगल सुनीता पुण्डरीक और अब दिवंगत हो चुके पत्रकार मित्र एस एस सैनी व उनकी दिवंगत हो चुकी युगल सुनीता सैनी को लेकर आबू रोड के शांति वन गया तो उदघाटन सत्र में ही प्रोफेसर कमल दीक्षित का मुख्य सम्बोधन सुनने को मिला।बड़े ही सहज रूप में पत्रकारिता से जुड़े मानदण्डो और मूल्यनिष्ठता की शब्द गंगा उनके मुख से ऐसी बह रही थी,जैसे वह मूल्यनिष्ठ पत्रकारिता के भागीरथ बनकर ब्रह्माकुमारीज रूपी शिव शीर्ष से सदाचार का प्रवाह लेकर देश दुनिया के सामने से निकले हो।उनके मुख से निकली मधुर वाणी,विशुद्ध हिंदी के प्रभावी शब्दो के स्पष्ट उच्चारण ने मुझे अपने मोहपाश में बांध लिया ।मुझे लगा बढ़ती आयु से बेपरवाह यही वह विराट व्यक्तित्व है जो ब्रह्माकुमारीज की मीडिया में सकारात्मक सोच को आगे बढ़ाकर चरित्रवान, सात्विक, सकारात्मक सोच के धनी पत्रकारों की फ़ौज खड़ी करके देश समाज मे आध्यात्मिक क्रांति का माध्यम बन सकता है।क्योंकि प्रोफेसर कमल दीक्षित चाहते थे कि समाज में व्याप्त खामियां और समस्याओं को बदलने की शक्ति होनी चाहिए।अगर अखबार पढ़ने से तनाव पैदा होता है, बेचैनी होती है, तो होनी भी चाहिए।पत्रकारिता के लिए विज्ञापन एक रोग है, किंतु विज्ञापन के बिना पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन कठिन कार्य है।
अगर समाज में लोगों के साथ अन्याय हो रहा है तो उसके लिए बेचैनी होनी चाहिए, उसके साथ खड़े होना चाहिए।
पत्रकारिता की डिग्री के लिए साहित्य पढ़ना भले जरूरी न हो लेकिन एक अच्छा इंसान होने के लिए साहित्य पढ़ना जरूरी है।
साहित्यकारों के बारे में, उनके सृजन के बारे में लोगों को जानकारी देनी चाहिए, अखबारों में साहित्यकारो को प्रमुखता से स्थान देना चाहिए।
आज के अखबारों में नेताओं के बारे में, उनके निजी जीवन के बारे में तो बहुत कुछ छपता है लेकिन साहित्यकारों के बारे में, उनके निजी जीवन के बारे में नहीं छपता है।जिस पर विचार मंथन होना चाहिए।
प्रो. कमल दीक्षित सवाल उठाते हैं कि मीडिया का मूल्यानुगत होना क्यों है जरूरी है?
पिछले कुछ वर्षों में पत्रकारिता सामाजिक सरोकारों और मूल्यों से क्यो दूर हो गई ?उनकी सोच थी कि पत्रकारिता देश और समाज के लिए नहीं होती ,बल्कि मनुष्यता के लिए होती है। इसलिए पत्रकारिता के केंद्र में मनुष्य होना चाहिए।उनका मानना था ,एक पत्रकार के रूप में आज भी नारद जीवित हैं।उनकी नजर में,शब्दों और प्रतीकों का अपना उत्कर्ष और अपकर्ष होता है।
जब रचनाकार रचना करता है तो वह प्रतीकों में रच बस जाता है।
शब्द सिर्फ शब्द नहीं होता है। शब्द संस्कृति होता है, प्रतीक होता है।उनकी राय में,नारद हमेशा कमजोर और शोषित वर्ग के लिए खड़े रहे और संचार संवाद का काम किया।
समाज में असहमति जरूरी है। जहां असहमति नहीं होती है, वहां सत्य का विस्फोट नहीं होता है।
पत्रकार नारद का उदाहरण देते हुए वे कहते थे कि कुछ लोग उन्हें चुगलखोर की संज्ञा देते हैं लेकिन यह सत्य नहीं है।समाज में मूल्यों की गिरावट वर्तमान में अधिक हो गई है। माता, पिता व परिवार के मध्य सामंजस्य का अभाव हो गया है। जिसकी जिम्मेदारी पत्रकारिता पर है, क्योंकि पत्रकारिता की भूमिका सामाजिक मूल्यों में सकारात्मक न होकर नकारात्मक हो गई है। हालांकि सच यह भी है कि मीडिया सूचना का केंद्र होकर अपनी बात समाज के प्रत्येक तबके तक पहुंचाती है। अच्छे कार्यों से दुनिया बदल सकती हैं।
किसी का जीवन सुधारने, निराश व्यक्तियों के मन में आशाओं का दीप जगाने, सभी के अधिकार दिलाना पत्रकार का कर्तव्य है। केवल संवेदनषील पत्रकार ही ऐसी अच्छी पत्रकारिता कर सकता है। संवेदनषीलता लाने के लिए आध्यात्मिकता का समावेष जीवन में जरूरी है। हालांकि जब भी आप आध्यात्म की ओर अपनी रूचि रखेंगे, कदम बढ़ायेंगे तो कोई न कोई व्यंग्य के साथ आपको ऐसा करने से रोकने का प्रयास कर सकता है। लेकिन आपकी दृढ़ता और आध्यात्म की शक्ति से आप एक अच्छे पत्रकार की श्रेणी में आ सकते हैं। उन्होंने अनेक उदाहरण देकर सकारात्मक पत्रकारिता को प्रेरित करने की बात समझाते हुए कहा था कि सकारात्मक खबरें छपती भी हैं लेकिन अवसरात्मक तौर पर। यदि अवसरात्मक के बजाय अभिप्रायपूर्ण हो तो समाज में परिवर्तन जल्दी और निष्चित ही आयेगा। उन्होंने कहा था कि बेइमानों की न्यूज का बखान तो किया जाता है लेकिन परोपकार का कार्य करने वालों को, ईमानदारी, मूल्य व निष्ठा से काम करने वालों को भी लोगों व शासन के सामने लाने का कार्य किया जाना चाहिए। उन्होंने वे चाहते थे कि लगातार कम से कम छ: माह के लिए सकारात्मक खबरों को कोने-कोने से ढूंढ़ कर प्रकाशित करें। इससे पत्रकार को स्वयं में आत्म संतुष्टि प्राप्त होगी।
पत्रकारिता एक विशिष्ट मानसिक कार्यशैली है, व्यवहारशैली है, कार्यकुशलता है, मानवीय मूल्यों को जाग्रत करने का एक व्यवहारिक ज्ञान व कला है, जोकि हमारे अपने अंदर हैं न कि व्यवस्था में। मीडिया किसी के आगे झुके नहीं, किसी के दबाव में आकर कार्य न करें। मीडिया स्वतंत्र रहे और स्वतंत्र लेखनी चलाये। प्रोफेसर कमल दीक्षित की यही नसीहत और प्रेरणा उन्हें आम पत्रकारों से बड़ा बनाती थी।प्रोफेसर कमल दीक्षित ने एक अजूबा ओर कर दिखाया।उन्होंने अपने मुल्यानुगत मीडिया अभिक्रम समिति में केवल ओर केवल सात्विक प्रवर्ति के पत्रकारों को ही सदस्य बनाकर उन्हें मिशनरी पत्रकारिता के मार्ग पर चलने के लिए ब्रह्माकुमारीज जैसा बडा प्लेटफार्म उपलब्ध कराया।जो पत्रकारिता में आध्यात्मिक सोच विकसित हो जाने से सकारात्मक उन्मुखता की ओर अग्रसर हुआ।जिसमे प्रोफेसर दीक्षित के योगदान को भुलाया नही जा सकता।(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और प्रोफेसर कमल दीक्षित के मार्गदर्शन में रहे है)
डॉ श्रीगोपाल नारसन एडवोकेट
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