कस्ती को तो डूबना ही था : वसन्त लोहनी
कस्ती को तो डूबना ही था
जब वह तुफान वनी
खुद संभल न सके तुम
अब शिकायत न करो दोस्त
कस्ती को तो डूबना ही था
दरिया के धार में बहते रहे
नशे के आदी जो तुम थे
शुक्र करो तुम बच निकले
तूफानी निशा के अंधेरा से
सुबह तो होना ही था, हुआ
उसमें तुम्हारा क्या योगदान ?
नादान तो तुम और बनोगे
जब चलना पड़ेगा आफताब में
आग के साथ नहीं खेलते
तूफान के साथ नहीं चलते
संभलना जब तुम भूले हो दोस्त
संभालना कैसे सीखोगे ।



