शिक्षा के प्रति गंभीर रहें और आत्मनिर्भर बनें : मीना कौशल

हिमालिनी जैसी विश्व विख्यात पत्रिका द्वारा मार्च अंक को महिला विशेष अंक बनाना अत्यंत प्रसन्नता का विषय है । महिलाएं जिन की उपलब्धियों को समाज अक्सर अनदेखा कर देता है, मार्च अंक में ऐसी स्त्रियों के बारे में पढ़ना प्रेरणादायी होने के साथ–साथ बाकी महिलाओं के लिए भी पथ प्रदर्शक साबित होगा । हिमालिनी टीम को ऐसी पहल के लिए कोटि–कोटि धन्यवाद और आभार ।
विश्व नारी दिवस मनाना एक तरह से क्रांतिकारी आयोजन है जिसका औचित्य और महत्व दुनिया के हर कोने में है । सैकड़ों संघर्ष पारकर जब स्त्री सफल होती है, स्वयं की स्वतंत्र पहचान बनाती है तब ही वह परिवार, समाज और राष्ट्र को एक नई दिशा दिखा पाती है । महिलाओं की प्रगति के बिना कोई भी समाज आगे नहीं बढ़ सकता । स्त्री ही वह धागा है जो पूरे परिवार और समाज को बांधे रखती है । मां, बहन, बेटी, पत्नी स्त्री हर रूप में वंदनीय है जिस की गरिमा और संस्कारों पर समाज खड़ा होता है । साल में मात्र एक दिन ही स्त्रियों की समस्याओं संघर्ष और उपलब्धियों पर बात करना यद्यपि पर्याप्त तो नहीं किंतु सराहनीय अवश्य है ।
मेरा नाम मीना कौशल है । मैं एक गृहिणी हूं और दो बेटों की मां भी हूं । मैं व्यावसायिक रूप से विश्व विख्यात भारतीय संस्थान में अधिकारी के पद पर कार्यरत हूं । शौकिया तौर पर मैं एक लेखिका, कवयित्री, लघु फिल्म निर्देशिका भी हूं । मुझे बचपन से पढ़ने लिखने का बहुत शौक था । पढ़ाई में भी अच्छी थी । यहां तक कि मैं नौवीं कक्षा तक स्वयं की लिखी कविताएं और लेख ही स्कूल में पढ़ा करती थी किन्तु मेरे चाचा जी ने मार–मार कर मेरे लिखने का शौक छुड़वा दिया ।
मैं लेखन की कोई विधिवत शिक्षा नहीं ले पाई, यहां तक कि मैंने नवीं कक्षा तक ही हिंदी भाषा पढ़ी है । परिवार में पति को छोड़ सब का रवैया निराशाजनक था । ससुराल के बाकी लोगों की नजर में लिखना पढ़ना एक फालतू काम है । शादी के बाद अपने सभी दायित्व में कुशलता से पूर्ण कर लेती हूं । समय के सही संचालन और दृढ़ इच्छाशक्ति से कोई भी ऐसा कर सकता है । मेरे दोनों बेटे होने के कारण वह मेरी उपलब्धियों पर खुश तो होते हैं किंतु घर के कामों में कुछ खास मदद नहीं कर पाते । साथ महिला होने के नाते आज भी देर सवेर और निजी जगह पर जाने में मैं बिल्कुल भी सहज नहीं हूं । एक नहीं कई बार मैंने ऐसा महसूस किया है । स्त्रियों की मेहनत और प्रतिभा को कोई गंभीरता से नहीं लेता । उसके बजाय पुरुष सहकर्मी उसे दबाए रखना चाहते हैं और उससे उसके हिस्से का सारा श्रेय छीन लेते हैं ।
मेरा महिलाओं के लिए यही संदेश है कि सर्वप्रथम अपने स्वास्थ्य और शिक्षा के प्रति गंभीर रहें, आत्मनिर्भर बने कभी यह न सोचें कि मेरा पति, मेरा भाई, बाप या मेरा पुत्र समर्थ है तो उसके सहारे जी लूंगी । दूसरी महिलाओं को भी आगे बढ़ने को प्रेरित करें ।
आपकी शुभकामनाओं के लिए हार्दिक आभार ।

