दुर्दिन से भी जीतेंगे साथ समय के ढाले हैं : गौरीशंकर वैश्य विनम्र
उजाले
मन में छिपे उजाले हैं।
तम के मुखड़े काले हैं।
कौन भला सच बोलेगा
सबके मुँह पर ताले हैं।
और अभी चलना होगा
हाँ! पैरों में छाले हैं।
बहुत पुराना घर अपना
दीवालों पर जाले हैं।
नहीं किसी से कुछ माँगा
अपने ठाठ निराले हैं।
भाई बनकर रहते जो
करते गड़बड़ झाले हैं।
दुर्दिन से भी जीतेंगे
साथ समय के ढाले हैं।

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