तिरस्कार नहीं इन्हें प्यार दो (कहानी) : डॉ. हंसराज ‘सुमन’
डॉ. हंसराज ‘सुमन’ । लख्मीचंद पिछले ही साल जुलाई माह में प्रशासनिक अधिकारी के पद से सेवानिवृत्त हुए थे। उन्होंने 40 साल तक सरकार की खूब सेवा की। उसका व्यवहार ऑफिस में सभी के साथ बहुत अच्छा था, कभी किसी से ना झगड़े और ना ही ऊंची आवाज में बोले। इसलिए सब लोग उन्हें प्यार से दादा कहकर पुकारते थे। जिस दिन वे सेवानिवृत्त होकर अपने घर आए उनके दोनों बेटे और उनकी पत्नी ने पूरे गाँव को पार्टी दी। गाँव का हर व्यक्ति उनकी पार्टी की तारीफ कर रहा था और यही कह रहे थे कि जीवन को कैसे जिया जाता है यदि देखना है तो लख्मीचंद से सीखना चाहिए। उसके परिवार की हर कोई मिसाल पेश कर रहा था।
सेवानिवृत्ति के बाद से लख्मीचंद हर रोज सुबह पांच बजे उठकर पार्क में घूमना फिरना और अपने हम उम्र के लोगों के साथ व्यायाम करना और आठ बजे तक घर लौट आना लेकिन पिछले दो महीने से जब से कोरोना महामारी के कारण लॉक डाउन हुआ है वे अपने घर की छत पर ही व्यायाम करते।शनिवार की रात को उन्होंने अपने बड़े बेटे की पत्नी से अपनी इच्छा जाहिर की कि उन्हें आज खीर खानी है। घर में खीर बनी खाना खाने के बाद सभी ने खीर खाई और खाने के बाद अपने-अपने शयनकक्ष में चले गए। रविवार को लख्मीचंद जैसे ही घर की छत से व्यायाम करके लौटे तो उन्हें अचानक अपनी आंखों के सामने अंधेरा सा दिखाई देने लगा और देखते ही देखते तेज बुखार, जुखाम और बार-बार छींकें रुकने का नाम नहीं ले रही थीं। तेज बुखार के साथ छींकों का एक साथ आना ये सारे लक्षण कोरोना पॉजिटिव मरीज के प्रतीत हो रहे थे लेकिन परिवार का हर सदस्य उनके पास जाने से कतरा रहा था यहां तक कि उनकी पत्नी भी ? पत्नी जो सेवानिवृत्त होने से पहले हर शाम उसके इंतजार में बैठी रहती थीं लेकिन आज वह भी जाने से मना कर दी ।
बड़े बेटे ने अपनी पत्नी और दोनों बच्चों को पिताजी के पास जाने से मना कर दिया और कहा कि कोई भी इन्हें खाना या कोई भी वस्तु मांगे तो उन्हें देने नहीं जाना है ।परिवार के हर सदस्यों के चेहरे पर कोरोना का खौफ़ साफ़ दिखाई पड़ रहा था जबकि अभी तक किसी तरह की जांच नहीं हुई है। उन्हें घर से थोड़ी दूर घेर में उनकी चारपाई डाल दी गई।घेर में ही तीन गाय और भैंसों के साथ उनका कालिया नोकर भी रहता था। कालिया इनका वफादार नोकर है जो पिछले बीस सालों से उनकी सेवा करता आ रहा है । कालिया को वे अपनी बहन के यहां से लाए थे, जब वह आठ साल का था उसकी बहन ने बताया था कि बचपन में ही इसके माता पिता एक सड़क दुर्घटना में चल बसे। चाचा-ताऊ ने बोझ समझकर घर से निकाल दिया तो इसे हम अपने घर ले आए। अपने बच्चों की तरह हमने पाला पोसा है। कालिया जब से इस घर में आया है तभी से बाबूजी की सेवा कर रहा है ।

लक्ष्मीचंद जिस कालिया को अपनी बहन के यहां से बीस साल पहले लाए थे उन्होंने उसे अपने बच्चों की तरह परवरिश की ।उसे कभी अलग नहीं माना। आज वहीं बेटा उनकी सेवा कर रहा है। जिसकी खुद की पत्नी जिसके साथ सात फेरे लेते समय जन्म-जन्मांतर तक रहने की कसमें खाई थी आज वह भी संकट की इस घड़ी में मिलने तक नहीं आई, उसने भी दूरी बना ली। वह बार-बार यही सोच रहा था कि उसे मुझसे नहीं बल्कि जो पेंशन मिल रही है उससे प्यार है इसका उसे आज आभास हुआ कि जिन्हें पेंशन के रूप में 50 हजार रुपये दे रहा था वे सबके सब लालची है ,धोखेबाज है ,वे मुझसे नहीं बल्कि मेरे पैसों से प्यार करते है ? इन सबसे बेहतर तो वो कालिया है जो मेरा अपना खून ना होते हुए मेरी सेवा कर रहा है। लख्मीचंद को घेर के कमरे में कैद कर दिया, घर का कोई सदस्य उससे मिलने नहीं जाएगा। घेर में उनकी चारपाई और नोकर कालिया।

लख्मीचंद की पत्नी, दोनों बेटे उनकी बहुओं ने अपने ससुर से दूरी बना ली और बच्चों को भी सख्त चेतावनी दे दी गई कि कोई भी दादा जी के पास नहीं जाएगा। एक बच्चे ने जब यह जानना चाहा कि दादा जी को ऐसा क्या हुआ है , कोई कुछ तो बताओ ? तो चांटा जड़ते हुए उसके पापा ने कहा बड़ों के मुंह लगते हो। एक बार कह देने के बाद भी सवाल करते हो।कह तो दिया है कि कोई नहीं जाएगा, फिर सवाल पर सवाल ।
बड़ा बेटा दीपक जो प्राइवेट सेक्टर में मैनेजर है उसने सरकार द्वारा जारी किये गये नंबर पर फोन करके सूचना दी ।फोन पर सारी बातें बता दी। वह फोन पर बात कर ही रहे थे कि एक बच्चे ने दरवाजे के पीछे खड़े होकर सारी बातें सुन ली।बच्चा ओह इतनी बड़ी बात ! यह तो सरासर—-परिवार के लोगों से कैसा छिपाव ! क्या दादा जी हमारे अपने नहीं ?
अगले दिन वह बच्चा अपने दोस्त प्रदीप से मिलने गया। उसने प्रदीप को सारी घटना की जानकारी दी और यह बताया कि उसके दादा को घेर के कमरे में बंद करके रखा है।उसने कसम दी, वह किसी से बताएगा नहीं। कुछ ही देर बाद वह अपने घर लौट आया। प्रदीप ने यह बात अपनी माँ को बताई तो वह यह सुनकर दंग रह गई। उसने तुरंत अपनी सास- ससुर को बता दी। फिर क्या था —–पहले एक–फिर–दो–तीन के बाद फिर कोई बचा ही नहीं जिसने ना सुना हो। आग की तरह खबर मोहल्ले भर में फैल चुकी थी, हर कोई कहता अरे तीन दिन पहले तो भले चंगे थे, दूसरे ने कहा साफ दिल के नेक इंसान है। लेकिन अभी तक उनसे मिलने कोई नहीं आया।
जिस घेर में लख्मीचंद को बंद करके रखा गया था कोई भी उस गली से नहीं निकलता मानो गली वालों को कोई सदमा लगा हो। कुछ समय बाद अपनी चुन्नी से मुँह लपेटे ,उसके साथ दस, बारह साल का एक बच्चा हाथ में खाना और दूध की डोली लिए दूसरी गली की एक बूढी औरत आई और लख्मीचंद की घरवाली से बोली – ” ये कैसी बीमारी है जो अपनों से भी दूर करे है बेबे । अपना तो अपना ही होवे है, संतोष तेरा तो खसम है और तू भी पास ना ? ले मैं खाना लाई हूँ ,कोई है जो उसे दूर से खाना दे सके ,खिला दो , अगर एनजीओ के अश्विनी को पता चल गया तो अस्पताल में भर्ती करवा देगा ,इसे भूखे को ही उठा ले जाएँगे ,कोई खाना खिला दो मेरे देवर को ।” दोनों बेटों ने घर के हर सदस्य को खाना और घेर में जाने के लिए मना किया हुआ था। एक तरफ भाभी का देवर के प्रति प्यार तो दूसरी तरफ यह बीमारी ।इस बीमारी ने इंसान-इंसान के बीच दूरी पैदा कर दी। सवाल था कि कौन खाना देने जाएगा ,कोई है तैयार ? बड़े बेटे का लड़का सामने आया कि–दादी मैं देने जाऊंगा खाना ? उसकी माँ ने उसे डांटते हुए कहा–क्या हम मर गए हैं ? और उसने बूढ़ी औरत के हाथ से खाना लिया। उसकी सास ने बहू का हाथ पकड़ा और कहा बहू मुझे दे ये खाना।मैं जाती हूँ, देखती हूँ कि कौन रोकता है मुझे !
फिर क्या था–उसने बहू के हाथ से खाना तो ले लिया लेकिन उसके अंदर का डर उसे खाए जा रहा था कि कहीं उसे भी यह बीमारी——ना, ना उसके हाथ कांप रहे थे,उसके पैर आगे बढ़ने से पहले ही लड़खड़ाने लगे ,मानो पैरों की सारी शक्ति खत्म हो गई हो । उसे अपने बेटे की बात याद— कोई नहीं जाएगा ! वह यह सोचने लगी ,बेटे की बात नहीं मानू तो—और मानू तो —–आगे कुंआ तो पीछे खाई।
प्रदीप की दादी यह सब देख रही थीं उसने तेज आवाज लगाते हुए कहा — ” अरी संतोष बहन तेरा तो खसम जो ठहरा ,और तू भी उससे इतना डरती है ? ……..जा । मुँह पर बड़ा सा रुमाल या कोई कपड़ा बाँध के चली जा। दरवाजे के पास से थोड़ा दूर हटकर खाना रख देना ,दूर से आवाज लगा देना , वो अपने आप खाना उठाकर ले जाएगा और खा लेगा।”
कमरे में कैद लख्मीचंद उनकी सारी बातें चुपचाप सुन रहे थे,वह आज अपनी किस्मत को कोस रहे थे, आखिर ऐसा कौन सा पाप किया है मैंने ,क्या ये दिन देखने के लिए ,बार-बार उनकी आंखों से आंसू रुक नहीं रहे थे,उसकी आंखों में गुस्सा फूट पड़ा और कहा कि— चले जाओ ,नहीं चाहिए, नहीं चाहिए। रोते बिलखते हुए उन्होंने कहा कि– ” मेरे पास कोई नहीं आएगा, सबके सब चले जाओ, मुझे भूख नहीं है, संतोष—आज तुम भी।” और जोर-जोर से रोने लगा। वह चालीस साल पहले जो वादे, संकल्प , उन पुरानी यादों में खो गया ,तुमनें एक साथ जीने मरने की कसमें खाई थी और आज इतनी नफ़रत ,धिक्कार है ऐसी जिंदगी को।मेरी अपनी पत्नी भी मुझसे इतनी नफरत ,आखिर क्यों ?
बड़ा बेटा और उसकी पत्नी आपस में बातचीत कर रहे थे कि—पिताजी की बीमारी की सूचना दूसरी गली मोहल्ले वालों को कैसे पता चली, अजी और कौन ,तुम्हारे लाडले ने जो बताया है। इसी बीच पुलिस की दो गाड़ी, गाँव का प्रधान, एनजीओ के सदस्य एंबुलेंस लेकर आ जाते हैं । एंबुलेंस में लख्मीचंद को बैठने के लिए कहा जाता है। उनका नोकर कालिया भी कहता है बाबू जी मै चलूंगा आपके साथ ,आप अकेले नहीं ।उसे पुलिस रोक देती है। लख्मीचंद उन्हें कहता है कि– सामने ही मेरा घर है सिर्फ एक बार, घर को देख लेने दो साहब। घर के दरवाजे पर आकर रुक जाता है ,वह अपने घर को ऐसे देखते हैं जैसे वह घर से विदा हो रहे हो, मानो फिर कभी नहीं आना है। एक टक देखते ही रहे।
दोनों बेटों के बच्चे जो तीसरी मंजिल पर है मास्क लगाए अपने दादा को देख रहे हैं लेकिन बच्चों को डराया धमकाया गया कि अपने दादा के पास जाना नहीं है,वे अपना सा मन मोसकर रह जाते हैं, बोल नहीं पाते,दोनों बहुएं घूंघट में मास्क लगाए एक पल टकटकी लगाए देखती रहती है और घर के अंदर चली जाती है।
घर की पहली मंजिल पर बॉलकोनी में दोनों बेटों के साथ सोशल डिस्टेंसिंग बनाकर उनकी माँ खड़ी है लेकिन मुहं पर मानो किसी ने ताला लगा दिया हो, कुछ नहीं बोली।लख्मीचंद के हृदय में अंदर ही अंदर ज्वालामुखी उमड़ रहा हो।घर के अंदर से पोता और पोती ने अपना हाथ हिलाते हुए गुड़ इवनिंग दादा जी,जवाब नहीं मिलने पर दोनों बच्चे घर के अंदर चले गए।
एक बार तो लख्मीचंद को लगा कि, मेरे अपने ही मुझसे मुंह मोड़ रहे हैं। मेरी अपनी पत्नी , मेरे बच्चे। जीवन में जीने को अब बचा ही क्या ? जिये तो किसके लिए ? रहने को घर नहीं, नहीं पत्नी, बच्चे। उसकी आंखों से आंसू बंद नहीं हो रहे थे।उसने घर के बाहर चबूतरे के पास बने कुलदेवता की मोडी (मंदिरनुमा ) को प्रणाम कर बाहर खड़ी एम्बुलेंस की गाड़ी में जाकर बैठ गए और जोर-जोर से रोने लगे।
लख्मीचंद के चले जाने के कुछ समय पश्चात दोनों बेटों की बहुएं, पोते-पोती और उसकी पत्नी संतोष सभी नीचे उतर आए और कुलदेवता (मंदिरनुमा ) को पानी से अच्छे से धोया उसे सेनेटाइज किया,धूप, अगरबत्ती,देशी घी का दीया जलाया। घर का हर सदस्य खुश नजर आ रहा था जैसे उन्होंने अपने घर से भूत प्रेत की आत्मा को भगा दिया हो। अगर चिंता थी तो लख्मीचंद के पोते-पोती को,दादा जी के साथ कोई क्यों नहीं गया ? उनके साथ अस्पताल में कौन रहेगा ?
जिस लख्मीचंद ने अपने परिवार के लिए इतना सब कुछ किया, और आज उसकी अपनी संतान ,यहाँ तक कि पत्नी ने भी साथ छोड़ दिया, आखिर क्यों ? वह बार-बार इसी सोच में, मैंने इनके लिए क्या कुछ नहीं किया ? आज मैं इनके लिए अनजान हो गया ? इसे क्या कहा जाए तिरस्कार या मजबूरी ? तिरस्कार ,मजबूरी ,तिरस्कार, मजबूरी —कुछ तो है।
बाबूजी जी को ले जाते हुए और किस तरह से परिवार के सदस्यों द्वारा बर्ताव किया गया यह सारा दृश्य देखकर नोकर कालिया फूट-फूट कर रोने लगा। उसने पहले ही एम्बुलेंस के ड्राइवर से अस्पताल का नाम व जगह पता कर ली थी, कुछ ही देर बाद कालिया अपनी साइकिल से अस्पताल जा पहुंचा। अस्पताल के गेट के साथ खिड़की के पास बने सूचना और पेसेंट एडमिट पर जाकर पूछा तो उन्होंने बताया कि लख्मीचंद जी को दो सप्ताह के लिए ऑब्जर्वेशन पीरियड में रखेंगे , अंदर नहीं जा सकते, आवश्यकता होगी तो बुला लिया जाएगा ,बाहर बैठ जाओ। कालिया दो सप्ताह तक अस्पताल के बाहर पड़ा रहा,उसे कमरे के अंदर नहीं जाने दिया, बाहर से ही आवाज देकर हाल-चाल पूछ लेता।
लख्मीचंद अस्पताल में 14 दिनों तक ऑब्जर्वेशन पीरियड में रहे। इस बीच नोकर कालिया के अलावा परिवार का कोई सदस्य उनकी बीमारी का हाल-चाल जानने नहीं आया। वह अपने आप से ही सवाल करने लगे कि मान लो कुछ हो जाए,मौत हो जाए तो भी वह नहीं आएंगे? सोचने लगे कि मेरी परवरिश में शायद कोई कमी रह गई होगी, वरना एक पिता ने अपनी औलाद को सारे सुख दिए ,और आज वह अस्पताल में हाल चाल तक जानने नहीं आए,यहां तक कि मेरीअपनी पत्नी भी ?
लख्मीचंद की 14 दिन के बाद जाँच की गई, उनकी सभी जाँच सामान्य पाई गई । अब वे पूरी तरह स्वस्थ थे। स्वस्थ होने का सर्टिफिकेट बना छुट्टी दे दी गयी। अस्पताल से घर फोन किया गया कि लख्मीचंद जी पूरी तरह स्वस्थ हैं आप इन्हें ले जा सकते हैं लेकिन उधर से कोई जवाब नहीं आया। डॉक्टर ने उन्हें बताया कि आपके घर पर फोन किया गया था लेकिन—-किसी ने कोई जवाब नहीं दिया।
लख्मीचंद कमरे से अपना सामान उठा जब वह अस्पताल से बाहर निकले तो सामने से कालिया को आते देख उनकी आंखों से आंसू बहने लगे,कालिया उन्हें समझाने लगा कि बाबूजी यह क्या ? आप रो रहे हैं ,नहीं बाबूजी रोना नहीं। उनकी आंखों से आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे । वह कालिया से लिपट गया और कहने लगे—काश तू मेरा बेटा ,मेरा बेटा –होता।बाबूजी मैं आपका ही बेटा हूँ, मुझे अपना बेटा ही मानो। लख्मीचंद ने कालिया से कहा चलो बेटे दुनिया से दूर चलते हैं ,बहुत दूर जहां हमे कोई देख ना सके। कालिया ने कहा कि बाबूजी मेरे घर चलो, मैं आपकी सेवा करूंगा। लख्मीचंद, चलो बेटे।अब तो मुझे तेरा ही सहारा है। कालिया शहर से काफी दूर अपने गाँव ले गया।
अगले दिन दोनों बेटे अपने पिता को अस्पताल से लाने के लिए अपनी गाड़ी से पहुंचते हैं, पूछताछ करते हैं लेकिन तब तक उनका पिता अपना नया जीवन जीने का सपना देख बहुत दूर जा चुके थे। बहुत दूर ,जहां कोई ना आ सके, बाकी जिंदगी को अपने ढ़ंग से जियेंगे। अब तो कालिया उनकी सेवा पहले से कहीं ज्यादा करने लगा था।
कुछ दिनों के बाद जब स्थिति सामान्य होने लगी , लख्मीचंद ने बैंक से सारे रुपये निकलवा लाये थे। घर पहुंचकर उसने कालिया को बुलाकर उसे सारे रुपये देने चाहे
पर उसने पैसे लेने से मना कर दिया और कहा, नहीं बाबूजी मुझे तो बस आपका प्यार चाहिए, आप ही तो हो जिसने मुझे पिता से बढ़कर प्यार दिया ,आपका दिया सब कुछ तो है मेरे पास ,नहीं आप अपने पास रखे। उसने कालिया को गले लगा लिया और उनकी आंखों से बहते हुए आंसुओं ने कहा, तुम भी मुझे छोड़ तो नहीं दोगे कालिया ? उसके बाद वे गांव में ही रहे, अपने घर की ओर कभी मुड़कर नहीं देखा। जितना जल्दी हो सके उसे भुला देना चाहते थे।
बड़े पोते ने अपने पिता से कहा कि पापा जी , दादा जी कब आएंगे ? अगले महीने उनका जन्मदिन बड़े धूमधाम से मनाने के लिए कहा था आपने, और हां इस बार तो दादा जी ने लंबी वाली गाड़ी देने का वायदा जो किया था। बताओ ना दादा जी कब –? इस बार तो बड़ी गाड़ी जरूर आएगी !पिता ने बच्चे की ओर आँखे निकालते हुए —चुप हो जा , और बच्चा पिता के सामने कुछ नहीं बोल पाया।
बड़ा बेटा ,रोते हुए माँ से पिता जी को दो महीने हो गए, उनका कोई पता नहीं चला। यह अहसास उन्हें आज हुआ है जब उनके बच्चे दादा जी ,दादा जी कब आएंगे ?उनके जन्मदिन मनाने की तैयारी और लंबी गाड़ी का इंतजार कर रहे हैं।उन्हें पिता के ना होने पर घर कितना सूना सा लगने लगा है ,अब पता चला है। उनकी चिंता है ना होने की नहीं बल्कि 50 हजार पेंशन जो हर महीने लाकर दे देते थे, पर पिछले दो महीने से वह भी बंद। बच्चे भी बार-बार पूछते हैं कि दादा जी कब आएंगे, उन्हें क्या जवाब दे। दोनों भाई पूरी तरह से टूट चुके हैं। माँ का तो मानो सुहाग उजड़ गया हो।
शाम के समय माँ ने अपने दोनों बेटों को बुलाया,बड़े बेटे दीपक को कहा कि, मंगलवार को तुम्हारे पापा का जन्मदिन है मैं चाहती हूँ कि उनके नाम पर हनुमान मंदिर में भंडारा करवाया जाए। छोटे बेटे ने गुस्से में, माँ हमारे पास फालतू में पैसा खर्च करने के लिए नहीं है। हम कोई भंडारा,वण्डारा नहीं करेंगे, एक तो वे हमें बिना बताए अस्पताल से भाग गए, घर छोड़कर चले गए, अब उनके जन्मदिन पर भंडारा करें । छोटा बेटा, माँ तुम गाँव वालों को नहीं जानती ,वे भंडारा भी खा जाएंगे और बाद में वह ताने,उनके ताने हमसे सुने नहीं जाएंगे, वाह रे वाह ये कैसा भंडारा ,बाप तो इनका घर छोड़कर भाग गया, बच्चे उनके जन्मदिन पर भंडारा कर रहे हैं।दोनों भाइयों की राय भंडारा ना करने में थी लेकिन उनकी पत्नी और माँ ने जब जोर देकर कहा कि उनके नाम पर भंडारा तो जरूर होगा, इस भंडारे में तुम्हारे पैसे नहीं लग रहे। माँ फूट-फूटकर रोने लगी ,आखिर में दोनों भाई मान गए।
आखिर मंगलवार का दिन आ पहुंचा, उधर लख्मीचंद गाँव से शहर की ओर अपनी स्कूटी पर आ रहा था। वह कालिया के लिए कपड़े और अपने जन्मदिन पर कोई बड़ा गिफ्ट देना चाहता था ,रास्ते में हनुमान मंदिर पर देखता है कि भंडारा लगा हुआ है, वह थोड़ा पहले रुक जाता है, राहगीर से पूछता है ,यह भंडारा किसने लगवाया है तो वह बताता है कि लख्मीचंद के जन्मदिन पर उनके बेटों ने भंडारा किया है। यह सुनकर वह थोड़ा सा चौकें जरूर ! स्कूटी स्टार्ट कर शहर की ओर चल दिए।
एक सप्ताह के बाद लॉक डाउन में थोड़ी ढील दे दी गई। इसका फायदा उठाते हुए बड़े बेटे ने गाँव के आसपास अपने पिता के गुमसुदा होने के पोस्टर फोटो सहित छपवाकर लगवा दिए। पोस्टर में लिखा था, सूचना देने वाले को 50 हजार का ईनाम दिया जाएगा । नीचे लिखा था–संपर्क करें —फोन—। लख्मीचंद बैंक में अपनी एफडी तुड़वाने आ रहा था कि सड़क के दोनों ओर उसने पोस्टर देखे, पोस्टर में नाम, फोटो और फोन नम्बर देखकर हैरान कि ,ये मुझे नहीं खोज रहे बल्कि मेरी पेंशन, दो प्लॉट और एक सरकारी मकान लेने के लिए यह ड्रामा है। वह पोस्टर को पढ़े जा रहे थे कि, गाँव के व्यक्ति ने पहचान लिया और तुरंत फोन कर दिया कि ,दिल्ली रोड गेट पर तुम्हारे पापा खड़े हैं तुरंत चले आओ, तब तक गाँव के व्यक्ति ने उसे बहला फुसलाकर ,उसे बातों में लगाए रखा। कुछ ही समय में दोनों बेटे गाड़ी लेकर बताई गई जगह पर आ पहुँच। दोनों बेटे पिता के पैरों में गिर पड़े, पैरों को पूरी तरह से पकड़ लिया और फूट-फूटकर रोने लगे, हमें माफ कर दो पिता जी, हमें माफ कर दो, अब ऐसी गलती नहीं होगी।
देखते ही देखते काफी भीड़ इकट्ठी हो गई, जो भी आता, क्या हुआ, क्या हुआ। तभी वह व्यक्ति जिसने सूचना दी थी, कहा, मैंने सूचना दी थी, मुझे मेरा ईनाम दो। आपको ईनाम देंगे ,थोड़ा रुको । भीड़ देख लख्मीचंद ने अपने बेटों को कहा, आज पता चला कि, पिता के ना होने का अहसास! तुम मुझसे नहीं मेरी पेंशन ,प्लॉट और मकान पर निगाह है, उस दिन कहां गए थे तुम ,जब घर के हर सदस्य ने मुझसे दूरी बना ली, चौदह दिनों तक मैंने घुट-घुटकर ,अकेलेपन में काटे है, मेरे अपनों ने दूरी बना ली, मगर कालिया जो बेटों से बढ़कर है, ने मेरी देखभाल और सेवा की। जिस औरत के साथ मैंने सात फेरे लिए वह भी किनारा कर, मुहं छिपा लिया । नहीं ,अब नहीं जाऊंगा, नहीं पिताजी ऐसा ना कहो ,भीड़ में खड़े लोगों ने लख्मीचंद को समझाया , काफी लोगों के कहने के बाद वे मान गए। घर चलने के लिए तैयार हुए,एक शर्त रखी ,आज से मेरे दो बेटे नहीं तीन है, तुम्हारा तीसरा भाई कालिया है, वह घर की हर सम्पत्ति का हिस्सेदार होगा। दोनों भाई मान गए । चलो पहले कालिया को लेते हैं, छोटे बेटे ने गाड़ी से 50 हजार रुपये निकाल, सूचना देने वाले को ईनाम के रुपये दिए।
कालिया ने दूर से आती गाड़ी को देख भांप लिया ,यह तो बाबूजी की गाड़ी है। दोनों भाईयों ने कालिया को गले लगाया और अपना सामान गाड़ी में रखने के लिए कहा, बाबूजी का आदेश मिलते ही कालिया ने सामान गाड़ी की डिक्की में रख दिया। आधा घंटे बाद सभी घर आ पहुँचे, घर पहुंचते ही ,दोनों बहुएं, पोता-पोती ,दादा जी आ गए, दादा जी आ गए। बहुएं ससुर जी के पैर पड़ माफी मांगने लगी। पत्नी की आंखों से आंसू थम नहीं रहे थे। घर में एक बार फिर से सुख शांति आ गई। फिर से बड़े पोते ने धूमधाम से दादा जी का जन्मदिन मनाया, दादा ने अगले दिन पोते के लिए बड़ी गाड़ी बुक करा दी।
रात्रि को बड़ा बेटा सोते-सोते सपने में बड़बड़ा रहा था, 50 हजार रुपये की पेंशन की कीमत क्या होती है उसका अंदाजा दो महीने में ही चल गया। कोरोना, कोरोना ,यह बीमारी किसी को भी हो सकती है लेकिन हमें दूरी बनानी चाहिए, अगर वह अपना है तो ये दूरी इतनी नहीं जितनी हमने पिताजी से बनाई, इतनी भी नहीं कि आंख से आंख ना मिला सके। हैं तो पिता जी, नहीं पिता जी, अब नहीं होगा, बड़बड़ाते देख उसकी पत्नी उठ खड़ी हुई, क्या हुआ ,अजी सुनते हो ? क्या हुआ ,कुछ नहीं ! आज मेरी आंखें खुल गई। ये सपना नहीं हकीकत है। तिरस्कार नहीं इन्हें प्यार दो।
सुबह हुई, सभी ने चाय नाश्ता करने के बाद बड़े बेटे ने परिवार के सभी सदस्यों को बुलाया और हाथ जोड़कर माफी मांगते हुए परिवार के सदस्यों से कहा, कोरोना ने मुझे सिखाया है–बीमारी है इससे लड़ना सीखो, ठीक है हमें इससे दूर रहना चाहिए लेकिन इतना दूर भी नहीं कि आप अपने संबंधों को भूल जाए, क्या पत्नी अपने पति को भूल सकती है, बेटे अपने पिता को, बच्चे अपने दादा को, बहुएं अपने ससुर को ,नहीं ऐसा नहीं करना चाहिए विपत्ति में उन्हें हमारी मदद की आवश्यकता है, उसे यह अहसास नहीं होना चाहिए कि परिवार ने दूरी बना ली है।
अगले दिन अखबार में पढ़ा, कोरोना होने पर परिवार के सदस्यों ने दूरी बनाई। दिल्ली में कोरोना के मरीज बढ़े, कोरोना के मामले में दिल्ली तीसरे नंबर पर। हे कोरोना, तेरा यह मौत का तांडव कब तक लोगों की बलि लेता रहेगा,तुन्हें इस बीमारी के माध्यम से वास्तव में जीवन का सार समझा दिया। तेरे सामने छोटा-बड़ा ,अमीर-गरीब ,औरत-मर्द सब बराबर है, तुन्हें कोई भेदभाव नहीं किया, तेरी नजर में सब बराबर है।
मानव-मानव में कोई भेद नहीं, असली धर्म मनुष्यता है।आधुनिकता के इस दौर में हमें अपनी मानसिकता बदलनी होगी।सुख, दुःख में एक दूसरे की मदद करे ताकि उसे बीमारी का अहसास ना हो, अपनत्व का भाव अपनाये, स्नेह और प्रेम करे यहीं मानवीयता है।फिर कोरोना तो क्या हर बीमारी से लड़ सकते हैं।

हिंदी विभाग–श्री अरबिंदो कॉलेज ,दिल्ली विश्वविद्यालय
मालवीय नगर ,नई दिल्ली–110017
फोन–9717114595

