जसपा की ‘आत्मघाती’, ‘खंडित’ और ‘तटस्थ’ सहयात्रा का अर्थ क्या है ?- जे.पी. आनंद
आपके दोस्त भी थे…वोटर भी..! लेकिन मेरे पास एक प्रश्न है-जे.पी. आनंद
देश को दुर्भाग्य की खाई में धकेल दिया गया। इसके कई पात्र हुए। ‘शिखंडी’ के किरदार और एक पक्ष के तौर पर #जसपा भी रहा। उन्होंने जसपा या इसके पूर्व का राजपा और संघीय फोरम के नाम से विभिन्न सरकारों में बार-बार सहभागी हुए ही है। हरेक बार ‘मधेस के मुद्दों’ को तर्पण करने के लिए सरकार में गए ही हैं। अतीत के सभी मुद्दों का बिसर्जन और सत्ता के सामने आत्मसमर्पण को अबोध और अवचेतन मधेसी समुदाय ने क्या बात कहा ही है। मधेस के नाम पर व्यापार और मधेस भवन से अविच्छिन्न राजपाट सब चला ही है।
हालांकि, कुछ अपवादों को छोड़कर, उनकी गतिविधियों ने देश को बरमूडा टैंगलर में गिराने का काम नहीं किया था। संघीयता को खुद मलजल करने के बजाए उसका गला ऐठने का काम तो नहीं ही हुआ था। खाने की मात्रा से ज्यादा खाने को मिलने पर बक्रतुण्ड हो रहे थे – ये मधेस के कृशकाय, सुदामा और शिशुपाल। उन्हें कभी-कभी गर्व होता था कि मधेसियों ने देश को नहीं बेचा है। जिसके बारे में बोलते समय संसद में दुर्योधनो का सिर झुक जाता था। इज्जत बची हुई थी। लेकिन, ऐसे समय में जब देश में रोजाना दो हजार-पच्चीस सौ निर्दोष नेपाली अल्पायु में मर रहे हैं, ऐसे समय में जब देश में हर तरह के दुर्भाग्य के लिए संघीयता को दोषी ठहराया जा रहा है, ऐसे समय में जब शासकीय प्रतिगामी मजबूत हो रहे हैं; मधेसी दल, जसपा ‘किंगपिन’ हो सकता था। जो अपनी सकारात्मक पहल से राजनीतिक उन्माद को भटकने से रोककर लिक में रख सकता था।

यदि जसपा विकृत राजनीति के बिच दो धार में से किसी एक का समर्थन किया होता, तो या तो एक वैकल्पिक सरकार बनती, या खुले तौर पर प्रधानमंत्री ओली का समर्थन करती तो शायद संसद के विघटन के रास्ते को अवरुद्ध कर सकती थी। एक लोकतान्त्रिक मधेसी दल के एकीकृत प्रयास प्रजातंत्र की ‘सबसे महत्वपूर्ण संस्था’, संसद की अकाल हत्या तो नहीं होती। इसे रोका जा सकता था। रोक नहीं पाते तो भी, विघटन में पुनरुत्थान की बड़ी शक्ति तो जरूर बनते ।

जसपा एक पार्टी के रूप में, या भावनात्मक रूप में भी एक भी नहीं रह सकी। उन्होंने कहा कि वे संविधान में संशोधन करेंगे लेकिन संविधान संशोधन की मातृस्थल संसद का वध करा दिया। उन्होंने कहा कि वे सांसद रेशमलाल चौधरी को रिहा करवा देंगे, लेकिन जब रेशमलाल सांसद बनकर लौटेगे तो उनके साथ हुए अन्याय पर बोलने के लिए संसद ही नहीं होगी। रेशमलाल जेल में होते हुए भी सांसद थे, रेशमलाल की वो शक्ति भी जसपा ने समाप्त कर दिया। मधेसी आंदोलनकारियों के खिलाफ दर्ज सौ-पचास मुकदमे वापस करवाए। क्या यही ऐतिहासिक उपलब्धि है ? आपने क्या हासिल किया ? सौ/पचास मुक़दमे वापिस और स्याही सुखने से पहले ही मिट जाने वाले आत्ममुघ्ततापूर्ण उपलब्धि के नाम पर इतनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ी !
मैं जानना चाहता हूं कि आख़िरकार जसपा द्वारा अपनाई गई ‘आत्मघाती’, ‘खंडित’ और ‘तटस्थ’ सहयात्रा का अर्थ क्या है ?
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