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क्यों कमजोर होते जा रहे हैं प्रचण्ड ?- लिलानाथ गौतम

 

हाल ही में नेकपा माओवादी केन्द्र के अध्यक्ष पुष्पकमल दाहाल ‘प्रचण्ड’ ने एक टेलिभिजन अन्तरवार्ता में कहा– ‘वि.सं. २०६२–०६४ साल के आसपास विश्व में नेपाल को ‘प्रचण्ड’ का देश’ माना जाता था ।’ उनका कहना था कि उस समय उनके नाम से ही नेपाल को जाना जाता था । यूं कहें तो प्रचण्ड की ओर से व्यक्त इस कथन में कुछ हद तक सच्चाई भी है । क्योंकि उस समय नेपाल को ‘सगरमाथा का देश’, ‘भगवान गौतम बुद्ध का देश’ के अलावा ‘प्रचण्ड’ का देश कहनेवाले भी बहुत सारे लोग मिलते थे ।

तत्कालीन समय में नेपाल में माओवादी द्वारा संचालित सशस्त्र विद्रोह, उसके नेतृत्वकर्ता प्रचण्ड और माओवादी की शान्तिपूर्ण राजनीति में अवतरण सम्बन्धी विषयों को लेकर होनेवाली बहस में प्रचण्ड की एक ‘चमत्कारिक पात्र’ के रूप में चर्चा की जाती थी । प्रचण्ड और नेपाल की राजनीति को लेकर सिर्फ नेपाल में ही नहीं, विश्व जगत में भी चर्चा होती थी । बहुसंख्यक नेपाली नागरिक भी सोचते थे कि नेपाल में अब प्रचण्ड का युग शुरु हो गया हैं । लेकिन वही प्रचण्ड नेपाली राजनीति में आज अन्य राजनीतिज्ञों की तुलना में कमजोर होते जा रहे हैं ।

पिछले एक साल से प्रचण्ड की राजनीति नेकपा एमाले के अध्यक्ष एवं प्रधानमन्त्री केपीशर्मा ओली के विरुद्ध रही है । सारे प्रतिपक्षी राजनीतिक पार्टी को ही नहीं, स्वयम् सत्ताधारी पार्टी नेकपा एमाले के भीतर रहे और ओली समूह से असन्तुष्ट एक समूह को लेकर उन्होंने ओली विरोधी राजनीति की, ओली को प्रधानमन्त्री और पार्टी अध्यक्ष पद से हटाने का प्रयास किया । इस तरह क्रियाशील प्रचण्ड अन्ततः असफल हो गए, आज ओली पुनः प्रधानमन्त्री बन चुके हैं । एक दशक पहले नेपाली राजनीति के मूल–पात्र प्रचण्ड आखिर क्यों इस तरह कमजोर होते जा रहे हैं ?

व्यक्तिवादी चरित्र

वि.सं. २०५२ साल में सशस्त्र युद्ध शुरु करते वक्त प्रचण्ड को साथ देनेवाले शीर्ष नेता आज उनके साथ नहीं हैं । प्रचण्ड के साथ कंधे में कंधा मिलाकर वैचारिक एवं भौतिक रूप में सशस्त्र युद्ध को नेतृत्व प्रदान करनेवाले मोहन वैद्य, डॉ. बाबुराम भट्टराई, नेत्रविक्रम चन्द, गोपाली किराँती जैसे महत्वपूर्ण नेता आज प्रचण्ड से सम्पूर्ण रूप में अलग हो चुके हैं । पिछली बार रामबहादुर थापा, टोपबहादुर रायमाझी, जनार्दन शर्मा जैसे नेताओं ने भी उनका साथ छोड़ दिया है । इसे स्पष्ट होता है कि लगभग २५ साल तक पार्टी नेतृत्व में रहकर भी प्रचण्ड अपने साथियों का दिल जीतने में असफल हो गए हैं । प्रचण्ड से अलग होनेवाले हर प्रमुख नेताओं की माने तो प्रचण्ड व्यक्तिवादी चरित्र के हैं, वह अपनी महत्वाकांक्षा को पार्टी सिद्धान्त से जोड़कर व्याख्या–विश्लेषण करते हैं और महत्वांकाक्षा पूरी करने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं ।

आज सशस्त्र युद्ध में संलग्न अधिकांश शीर्ष नेतागण प्रचण्ड से अलग हो चुके हैं । जिसके चलते नेपाली राजनीति में प्रचण्ड कमजोर हैं । इसका अनुभव प्रचण्ड भी कर रहे हैं । अपने राजनीतिक भविष्य के प्रति विश्वस्त ना होने के कारण ही उन्होंने ४ साल पहले तत्कालीन नेकपा एमाले के साथ पार्टी एकता प्रक्रिया शुरु की थी । लेकिन उनका व्यक्तिवादी राजनीतिक चरित्र उनमें कायम ही रहा । जिसके चलते पार्टी एकता होने के बाद नवगठित पार्टी नेपाल कम्युनिष्ट पार्टी (नेकपा) के दूसरे अध्यक्ष केपी शर्मा ओली के साथ प्रचण्ड का सम्बन्ध शुरु से ही उतार–चढ़ावपूर्ण रहा है ।

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हां, पार्टी एकता के बाद प्रचण्ड एक बार फिर शक्तिशाली कम्युनिष्ट पार्टी के नेतृत्व में तो आ गए थे । लेकिन प्रधानमन्त्री रहे दूसरे अध्यक्ष ओली के कारण वह पहले की तरह पार्टी के भीतर मनमानी नहीं कर पाए । अन्ततः नेकपा को विभाजित होना पड़ा, प्राविधिक कारण बन गया– सर्वोच्च अदालत । आज माओवादी केन्द्र और नेकपा एमाले पूर्ववत अवस्था में है । पिछली बार प्रचण्ड को छोड़ कर एमाले का साथ देनेवाले पूर्व माओवादी नेता भी यही मानते हैं कि प्रचण्ड में अन्तरनिहित चरम व्यक्तिवादी चरित्र के कारण ही अन्ततः नेकपा को विभाजित होना पड़ा है ।

वैसे तो नेपाली राजनीति में व्यक्तिवादी चरित्र आम बात है, हर पार्टी और नेताओं में यही दिखाई देता है । इसीलिए प्रचण्ड की असफलता के पीछे यही एक कारण है, ऐसा मानना ठीक नहीं है । उनकी असफलता के पीछे कई ऐसे कारण है, जिसके चलते आज प्रचण्ड कमजोर होते जा रहे हैं । पूर्व विद्रोही नेता (कई प्रजातान्त्रिक देशों ने आज भी प्रचण्ड को युद्ध–अपराधी एवं आतंककारी सूची से नहीं हटाया है), विरोधी कम्युनिष्ट चरित्र, भारत विरोधी राजनीति, प्रथम बार प्रधानमन्त्री रहते वक्त किए गए कई अपरिपक्व निर्णय आदि ऐसे कई कारण है, जहां प्रचण्ड खुद के द्वारा बिछाए गए जाल में फसते चले गए । अन्ततः आज वह कमजोर दिखाई पड़ रहे हैं । लेकिन उन्होंने सक्रिय राजनीति नहीं छोड़ी है । बताया जाता है कि आज भी प्रचण्ड नेपाली राजनीति में ‘किंगमेकर’ बनना चाहते हैं और प्रयासरत भी हैं । वैसे तो कुछ सालों से प्रचण्ड की राजनीतिक चरित्र में भी परिवर्तन दिखाई दे रहा है, अर्थात् उनमें प्रजातान्त्रिक चरित्र विकास हो रहा है ।

पिछली बार संसदीय राजनीतिक अभ्यास में अग्रसर प्रचण्ड पारिवारिक रूप में भी पीडित पात्र हैं । लोगों को मानना है कि पुत्र प्रकाश दाहाल और बेटी ज्ञानु दाहाल की असामयिक मृत्यु, पत्नी सीता दाहाल की जटिल स्वास्थ्य अवस्था जैसी पारिवारिक पीड़ा से गुजरने के बाद प्रचण्ड के राजनीतिक चरित्र में काफी बदलाव दिखाई दे रहा है । नेपाली राजनीति को करीब से विश्लेषण करनेवाले कई विश्लेषक मानते हैं कि नेकपा एमाले के अध्यक्ष एवं प्रधानमन्त्री ओली की तुलना में प्रचण्ड अधिक प्रजातंत्रवादी और और व्यवहारिक नेता हैं । उन लोगों का यह भी मानना है कि प्रचण्ड पहले की तरह झूठ नहीं बोलते हैं और प्रधानमन्त्री ओली की तरह कुटिल और धोखा–धड़ीपूर्ण राजनीति भी नहीं करते हैं ।

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सर्वोच्च अदालत द्वारा जारी फैसला के अनुसार वर्तमान में प्रचण्ड नेकपा माओवादी केन्द्र के अध्यक्ष हैं । वर्तमान में प्रचण्ड चुनौतियों से जूझ रहे हैं– १. पार्टी को बचाना है, २. जटिल स्वास्थ्य अवस्था से गुजर रही पत्नी का भी खयाल रखना है । ऐसी अवस्था में माओवादी केन्द्र को आगे बढ़ाने के लिए योग्य और विश्वसनीय कोई दूसरे नेता उनके पास नहीं हैं । बताया जाता है कि नेकपा एमाले के साथ पार्टी एकता होने के बाद ना तो प्रचण्ड के पास कोई राजनीतिक सिद्धान्त रहा है, ना ही पार्टी संगठन । तब भी प्रचण्ड खुद को नॉर्मल दिखाने का प्रयास कर रहे हैं ।

एमाले और माओवादी अलग होने के बाद कई सार्वजनिक मञ्चों से प्रचण्ड ने कहा है–फिर भी पुनः माओवादी केन्द्र और नेकपा एमाले के बीच पार्टी एकता सम्भव है । प्रचण्ड निकट व्यक्तियों का कहना है कि पार्टी एकता के लिए ईमानदार प्रयास करने की मनःस्थिति में प्रचण्ड पहुँच चुके हैं । इसके पीछे एक ही कारण है– पुनः नेकपा एमाले और माओवादी केन्द्र पुर्ववत अवस्था में कायम रहना । बताया जाता है कि आज प्रचण्ड खुद को अति कमजोर पात्र के रूप में मान रहे हैं, इसलिए आगे आने का प्रयास कर रहे । लेकिन एमाले अध्यक्ष ओली एवं उनके समर्थक बहुसंख्या नेता–कार्यकर्ता इसके पक्ष में नहीं दिखाई दे रहे हैं । अर्थात् वे लोग पुनः प्रचण्ड को पार्टी अध्यक्ष की भूमिका देकर पार्टी एकता करने के पक्ष में नहीं दिखाई दे रहे है ।

एक समय ऐसा भी था, जहाँ सम्पूर्ण राजनीतिक माहोल को बदलने की क्षमता प्रचण्ड में होती थी । लेकिन आज कई प्रयासों के बावजूद भी वह असफल नजर आ रहे हैं । नेकपा विभाजन होने के बाद नेपाली कांग्रेस और जनता समाजवादी पार्टी से मिलकर ओली को पद से हटाने की कोशिश भी असफल रही । नेकपा एक रहते समय हो या विभाजन के बाद, उनका एक ही उद्देश्य था– ओली को प्रधानमन्त्री पद से हटाना । अपनी सारी क्षमता लगाने बाद भी प्रचण्ड असफल तो हो गए, परन्तु हार नहीं मानी है, प्रयास जारी है ।

माओवादी केन्द्र को स्थापित करना संभव है ?

नेकपा विभाजन होने से पूर्व प्रचण्ड का साथ देनेवाले एमाले नेता माधव नेपाल समूह ही नहीं, सशस्त्र युद्ध लड़नेवाले महत्वपूर्ण नेता तथा कार्यकर्ता भी प्रचण्ड से दूर होते जा रहे हैं । राजनीतिक सहकार्य के लिए प्रमुख प्रतिपक्षी दल नेपाली कांग्रेस हो या जसपा के नेतागण, वे भी प्रचण्ड के प्रति विश्वस्त नहीं हैं । जनता में जाने के लिए पार्टी की सांगठनिक संरचना सम्पूर्ण रूप में ध्वंस्त हो चुकी है । ऐसी परिस्थिति में माओवादी केन्द्र को जनता में पुन स्थापित करना उनके लिए तिल का पहाड़ चढ़ना है ।

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प्रचण्ड की यह हाल देखकर ही तत्कालीन समय में युद्ध लड़नेवाले कई सहकर्मी आज एमाले प्रवेश कर रहे हैं । इसको देखकर लगता है कि प्रचण्ड माओवादी केन्द्र को पुनः स्थापित नहीं कर पाएंगे । लेकिन माओवादी के भीतर एक समूह ऐसा भी है, जो प्रचण्ड, डा. बाबुराम भट्टराई, मोहन वैद्य, गोपाल किराँती और नेत्रविक्रम चन्द के बीच पार्टी एकता के लिए बहस करते हैं । दूसरी और तीसरी पीढ़ी के ये लोग कहते हैं कि प्रचण्ड के अपने राजनीतिक सिद्धान्त छोड़ देने के कारण ही माओवादी की स्थिति दयनीय बन गई है, इसीलिए मुद्दा और सिद्धान्त में प्रतिबद्ध रहकर पूर्व माओवादी के बीच एकता होनी चाहिए, इसी से हम लोग पुनः जनता में स्थापित हो सकते हैं । वर्तमान में पत्रकारिता में सक्रिय पूर्व माओवादी नेता खिलबहादुर भण्डारी ने प्रचण्ड को स्पष्ट शब्दों में कहा है– राजनीतिक भविष्य को सुरक्षित रखना है तो सभी पूर्व माओवादी नेताओं को इकठ्ठा कर पुनः माओवादी पार्टी को आगे बढ़ाया जाए, नहीं तो ओली के साथ ही पुनः पार्टी एकता किया जाए । माओवादी प्रति आस्थावान दूसरी और तीसरी पीढ़ी के अधिकांश नेता और कार्यकर्ताओं का विचार लगभग यही है । यहां एक दृश्य स्मरण हो जाता है– प्रथम संविधानसभा चुनाव में माओवादी प्रवेश करनेवालों की लाइन होती थी, लेकिन आज माओवादी छोड़नेवालों की लाइन है । ऐसी अवस्था में पूर्व माओवादी के बीच एकता भी सम्भव दिखाई नहीं देती ।

तो भी एक सवाल उठता है– प्रचण्ड फिर भी राजनीतिक सिद्धान्त और मुद्दा को प्राथमिकता देकर विभिन्न समूह में विभाजित पूर्व माओवादी नेताओं को इकठ्ठा करने में लगते हैं या नेताओं के व्यक्तिगत स्वार्थ एवं अपने राजनीतिक भविष्य को देखकर आगे बढ़ते हैं ? यह देखना बाकी है । बताया जाता है कि अपनी महत्वाकांक्षा के लिए कम्युनिष्ट राजनीतिक दर्शन के विपरित रहे नेपाली कांग्रेस के साथ भी राजनीतिक सहकार्य एवं चुनावी तालमेल करनेवाले प्रचण्ड अब राजनीतिक सिद्धान्त के साथ आगे बढ़नेवाले नहीं हैं ।

राजनीतिक वृत्त में यहाँ तक चर्चा है कि प्रचण्ड को कमजोर मानकर ही पिछली बार जसपा (महन्थ ठाकुर और राजेन्द्र महतो) समूह ने उनका साथ नहीं दिया है । बताया जाता है कि जसपा द्वारा उठाए गए मुद्दा सम्बोधन के लिए अब प्रचण्ड में क्षमता नहीं है । अर्थात् जसपा के नेतागण प्रचण्ड की तुलना में ओली को ही शक्तिशाली मानते हैं । ऐसी अवस्था में प्रचण्ड अपनी पुरानी चमत्कारिक व्यक्तित्व और शक्ति के साथ पुनः स्थापित हो पाएंगे या नहीं यह सवाल आज भी अनुत्तरित है । क्योंकि राजनीति में असम्भव कुछ भी नहीं है ।

 

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