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विचारहीनता और हम : अजयकुमार झा

 

अजयकुमार झा, जलेश्वर । किसी भी देश और समाज में जब नए क्रांति का जयघोष होता है, तो उसके पीछे आधुनिक विचार का अत्यधिक प्रभाव और समसामयिक मनोवैज्ञानिक दबाव भी पड़ता है। वह विचार, जो सर्वजन हिताय और सर्वजन सूखाय है; उसे आम समर्थन प्राप्त होता है। प्रकृति के स्वाभाविक त्रिगुण ‘ सत्व , रजो और तमो ‘ गुण के कारण उग्र, सौम्य और शांत प्रकृति के लोग पाए जाते हैं। जिनका क्रांति में विशेष योगदान रहता है। वि पि कोइराला, राम नारायण मिश्रा और गणेशमान सिंह, ए नेपाली राजनीति के त्रिमूर्ति हैं। इनके विचारों और भावनाओं से खिलवाड़ करने के कारण ही आज कांग्रेस जैसे विशाल वृक्ष ठूठा पेड़ बन गया है। इसी तरह पुष्पलाल श्रेष्ठ, मनमोहन अधिकारी और मदन भंडारी रूपी त्रिदेवों के वैचारिक वहिष्कार का प्रमाण आज का एमाले  है। उधर पुष्पकमल दहाल, बाबूराम भट्टराई और मोहन वैद्य के आपसी वैचारिक विभेद के कारण हजारों नेपाली युवाओं के बलिदान को मिट्टी में मिला दिया गया है। मौलिक रूप में इन वैचारिक विभेद तथा राजनीतिक दुर्घटनाओं के पीछे क्षणिक पदीय लोभ है। जिस के कारण विचारधाराओं में असमय षड़यंत्रपूर्ण संशोधन कर व्यक्ति सत्ता को स्थापित करने का दुष्प्रयास किया गया। यही नेपाली राजनीति और जनता के अस्तित्व के लिए घातक साबित होता दिख रहा है।
हरेक क्रांति के पश्चात मौलिक विचारधारा को जनता के द्वारा खुलकर एकबार समर्थन दिया जाता रहा है। ता की वह अपने विचारधारा को व्यवहार में ला कर जनता के जीवन तथा समाज और राष्ट्र को उन्नति के पथ पर ले जाने में सफल हो सके। यह काम जनता करती है; यह दायित्व भी जनता का है। नेपाल के संदर्भ में कांग्रेस, एमाले, माओवादी और राजावादी सभी को यह अवसर प्रदान किया गया है। लेकिन पंचायती शासन के वाद आजतक किसी पार्टी और नेता ने पांच वर्ष व्यवस्थित सरकार चलाने की क्षमता प्रदर्शन नही कर पाया। इससे साफ जाहिर होता है की हमारे राजनीति कर्मी बुद्धिमान भी नहीं है, प्रज्ञावन होना तो दूर की बात है। संभवतः शकुनी, दु:शासन, दुर्योधन और भीम से ऊपर के समझवाले राजनेता नेपाल के मिट्टी ने पैदा करना छोड़ दिया है।
आकंठ भ्रष्टाचार और निर्लज्ज कमीशनखोरी में डूबे उन्हें लगता ही नहीं कैंसर और हार्ट अटैक जैसे रोग षडयंत्रकारियों के लिए ही आविष्कार हुआ है। युवाओं में इन के प्रति घृणा और वितृष्णा की स्थिति ऐसी सृजना हो रही है की ऐसे लोगों को अब मरने के वाद भी लोग अभद्र शब्दों से श्रद्धांजलि देने में नही हिचकते। भविष्य में न कोई हमारे लिए आदर्श पुरुष बचेगा और न कोई प्रेरक पुरुष। न किसी शहीद के प्रति युवाओं के हृदय में कोई सम्मान बचेगा और किसी विभूतियों के प्रति श्रद्धा। और इसका दोषी भी आज के हमारे राजनेता ही सावित होंगे। इसका खामियाजा भी उन्हें ही भुगतना पड़ेगा। हम देख रहे हैं, आज पृथ्वी नारायण शाह के प्रतिमा और गरिमा के साथ कैसा व्यवहार किया जा रहा है। नेपाली झण्डा को जलाया जा रहा है। ब्रह्मणवाद के खिलाफ कितना आक्रोश और जहर भरा वाक्य अभिव्यक्त किया जा रहा है। मधेसी के प्रति शीर्षस्थ नेपालियों के द्वारा जिस प्रकार से विष व्यंग्य छोड़ा जा रहा है, क्या वह कभी भी अमृत रस में परिणत हो सकेगा? वास्तव में हमें महाभारत के युद्ध की तरह आपस में ही लड़ कटकर मरने के लिए विदेशियों के इशारों पर अपनों के द्वारा ही पूर्णतः दूषित किया जा रहा है। और हम सबाब और कबाब में डूबकर मौज मना रहे हैं। यहां हम का अर्थ, राजनीतिक, प्रशासनिक और न्यायिक सत्ताधारी से है।
वर्तमान में शिक्षित नेपाली युवाओं के विचार में धीरे धीरे जातीय षडयंत्रों को चीरकर सामाजिक न्याय के लिए हो रहे सक्रियता से वैचारिक परिवर्तन का आभास दिख रहा हैं। भीम उपाध्याय जी के द्वारा ज्वाला संग्रौला के समर्थन में किए गए पोस्ट पर सैकड़ो पहाड़ वासियों के द्वारा उनके ऊपर किया गया कड़ा प्रतिवाद बहुत कुछ बयां करता है। इसे वैचारिक परिवर्तन का जबरदस्त संकेत समझना होगा। यही हालत मधेस में महंत ठाकुर और राजेन्द्र महतो के निर्णय के विरुद्ध आम मधेसियों के प्रतिक्रिया से भी जाहिर होता है। जसपा के आंतरिक विवाद से कांग्रेस और मन्युनिष्ट में खुशी का लहर आना स्वाभाविक ही है, लेकिन मधेसी समर्थकों में निराशा और विचलन आना किसी बड़े दुर्घटना का संकेत है। नेपाल के संदर्भ सैद्धांतिक रूप से अब किसी भी पार्टी को जनता से भोट मागने का अधिकार नही रहा, उग्र राष्ट्रवाद तथा भारत विरोधी राष्ट्रवाद को नेपालियों ने ही हवा उड़ा दिया; खुद को ही नंगा कर लिया; रहा व्यवहारिक पक्ष, तो इसके लिए नागरिक और देश के हित में किए गए काम ही आधार होता है; जिसमे सब के सब अयोग्य और भ्रष्ट हो प्रमाणित चुके हैं। अतः जनता के बीच जाने का अब एक ही उपाय है, वो है एक दूसरे पर कीचड़ उछालना। जो जितनी अधिक मात्रा में कीचड़ उछाल पाएंगे, सोसल मीडिया और अन्य मिडियाओं के माध्यम से चिल्ला पाएंगे; जनता के बीच चर्चा के उतना ही करीब रहेंगे। साथ ही व्यक्तिगत रूप से जो जितना सभ्य और समाज के हृदय में होंगे जनता उन्हें उतना सम्मान देगी।

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