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बहुमत जिम्मेदारी भी है और एक चेतावनी भी : श्वेता दीप्ति

 

डॉ श्वेता दीप्ति, सम्पादकीय हिमालिनी, अंक अप्रैल । हाल ही में सम्पन्न हुए आम चुनाव के परिणाम तथाकथित पुराने दलों के लिए अप्रत्याशित सिद्ध हुए । उन दलों के नेता और कार्यकर्ता सोशल मीडिया के माध्यम से एक–दूसरे पर आरोप–प्रत्यारोप लगाने में व्यस्त हैं । कभी आम चुनाव में दो–तिहाई मत प्राप्त करने वाला दल, जिसने नेपाल के लोकतांत्रिक आंदोलन के सात दशक लंबे इतिहास को अपने साथ समेटे रखा है, आज अपने अस्तित्व की सबसे कठिन परीक्षा के सामने खड़ा है । इस चुनाव ने कांग्रेस को केवल संसदीय गणित में ही सीमित नहीं किया है, बल्कि उसके वैचारिक आधार और नैतिक धरातल पर भी गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं ।

एक समय था जब कांग्रेस जो कहती थी, देश उसी रास्ते पर चलता था । लेकिन आज जब देश नए रास्ते की तलाश में है, तब कांग्रेस अभी भी पुरानी गलतियों की सुरंग में क्यों फँसी हुई है ? इसका उत्तर खोजने के लिए पार्टी के प्रतिनिधियों को आंतरिक राजनीति, आर्थिक नीतियों और अतीत के कुछ विवादास्पद निर्णयों की गहराई से समीक्षा करना आवश्यक है ।
नेपाल की समकालीन राजनीति में पारंपरिक दलों के प्रति जनता का विश्वास कमजोर होता जा रहा है । ऐसे समय में कुछ नए राजनीतिक चेहरे अचानक प्रभावशाली रूप में उभरे हैं । इनमें विशेष रूप से चर्चा में आए दो व्यक्तित्व हैं—रवि लामिछाने और बालेन शाह ।

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इन दोनों व्यक्तित्वों को कई लोग राजनीतिक परिवर्तन के संभावित वाहक के रूप में देख रहे हैं, जिसे गत फागुन २१ के चुनाव और उसके परिणामों ने भी प्रमाणित कर दिया है । लंबे समय से सत्ता में रहे दलों की कार्यशैली, भ्रष्टाचार के आरोप, राजनीतिक अस्थिरता और प्रशासनिक अक्षमता से निराश नागरिकों ने अब नए चेहरों से उम्मीद लगानी शुरू कर दी है । इसी संदर्भ में लामिछाने और शाह का उदय केवल व्यक्तिगत सफलता नहीं, बल्कि व्यापक राजनीतिक असंतोष की अभिव्यक्ति भी है ।

चुनाव से पहले इन दोनों नेताओं के बीच सहयोग और पार्टी एकता की चर्चा हुई थी । उम्मीदवारों के नामांकन से पहले दोनों नेताओं के बीच सात–बिंदु समझौता हुआ । समझौते के अनुसार पार्टी के केंद्रीय अध्यक्ष रवि लामिछाने ही रहेंगे, जबकि आगामी प्रतिनिधि सभा चुनाव के बाद संसदीय दल के नेता तथा भावी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में बालेन शाह का नाम तय किया गया । इसी समझौते के आधार पर चुनाव अभियान के दौरान बालेन को संभावित प्रधानमंत्री के रूप में प्रस्तुत किया गया था । किन्तु परिणाम के बाद अभी इस पर स्पष्ट धारणा रास्वपा की बाहर नहीं आई है ।
अगर सत्ता दोनों नेताओं के हाथ में जाती है तो उनका सहयोग कितना टिकाऊ होगा ? वैसे अभी इस संबंध में टिप्पणी करना जल्दबाजी होगी । चुनाव से पहले बालेन के साथ समझौता के समय रवि लामिछाने राजनीतिक रूप से कमजोर दिखाई दे रहे थे । जब बालेन के साथ समझौता हुआ, तभी से राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी की लोकप्रियता बढ़ती हुई दिखाई दी । लेकिन लोकप्रियता की लहर अभी भले ही सब कुछ आसान दिखा रही हो, वास्तविक राजनीति अक्सर बहुत कठोर होती है ।

राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी की सरकार कुछ ही दिनों में बनने जा रही है । आठ वर्ष पहले—नेपाल में लगभग दो–तिहाई बहुमत वाली वामपंथी सरकार बनी थी । लेकिन वह सरकार केपी ओली और प्रचंड के बीच ‘अहं’ या ‘आत्मसम्मान’ के टकराव के कारण बीच में ही गिर गई थी । अंतरराष्ट्रीय शक्तियों ने भी उस टकराव को और बढ़ाकर अंततः उसे औपचारिक विभाजन तक पहुँचा दिया था । किन्तु आज आम जनता एक बार फिर से रास्वपा से स्थायित्व, निवेश का माहोल, शांति चाहती है साथ ही अपने संतानों की प्रवासी होने की पीड़ा से मुक्ति चाहती है । चुनाव में राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी को मिला बहुमत उसके लिए सुविधा भी है, बोझ भी है, जिम्मेदारी भी है और एक चेतावनी भी ।

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नेपाल इस समय एक दुर्लभ राजनीतिक क्षण से गुजर रहा है । राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी को मिला व्यापक जनादेश राजनीति को साफ करने और शासन की विश्वसनीयता को पुनः स्थापित करने की गहरी जन–इच्छा को दर्शाता है । लेकिन इतिहास चेतावनी भी देता है । नेपाल में १९९० की लोकतांत्रिक पुनस्र्थापना से लेकर गणतंत्र में परिवर्तन और उसके बाद की घटनाओं तक कई बार बड़े जनादेश “बहुमत के अभिशाप” के कारण कमजोर पड़ गए हैं । जब अत्यधिक शक्ति प्राप्त होती है, तब संस्थाओं को सुरक्षित रखने के लिए आवश्यक अनुशासन के कमजोर पड़ने का खतरा बढ़ जाता है ।
अब यह देखना होगा कि इस चुनाव के जनादेश के बाद नेपाल फिर से निराशा के उसी पुराने चक्र को दोहराता है या अंततः उस चक्र को तोड़ देता है । हम सब राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी की भावी सरकार के प्रति आशावादी हैं ।

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डॉ श्वेता दीप्ति 
सम्पादक
हिमालिनी

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