कर्फ्यू : डा रेखा सिन्हा
कर्फ्यू
सड़कों पर फैला है
वीरान सन्नाटा दूर तक
न रिक्शेवाले ,न टाँगेवाले
न खोमचेवाले ,न दिहाड़ी मजदूर
और न ही कोई वाहन ।
नजर आते हैं ,गस्त करती पुलिस
उनकी सरपट दौड़ती गाड़ियां
और कभी कभी
इक्का दुक्का लोग राशन पानी की जुगाड़ में ,
कुछ चेहरे ऐसे भी
जिनपर घनीभूत है विवशता
और आँखों में दर्द का समन्दर ।
सरक रही है जिंदगी
थम गई है रफ्तार जीवन की ,
लगता है इस विशाल लोकतंत्र में
आदमी की भीड़ कहीं खो गई है ,
किसी भयावह अंधेरी गुफा में
जहाँ एक दूसरे की साँसों का स्वर भी
सुनाई नहीं देता ।
शायद कोई अदृश्य सुरसा
बढ़ी आ रही है मानवता को लीलने ,
या क्षुधा का दानव बढ़ रहा है
अपनी रक्तिम आँखों और
लपलपाती जिह्वा लिए ,
उनकी ओर जो पहले ही
बढ़ रहे हैं अनंत आकाश की ओर
अपनी आँखों में एक प्रश्नचिह्न लिए ।
किसे फ्रिक है ,कौन है दोषी
मानवता को विनाश की ओर
ढकेलने के लिए ,या केवल
तबाही का मंजर देखने के लिए ,
घृणा , वैमनस्य और शक्तिशाली बनने की होड़ ने
पहले ही रच दी है विनाश की इबारत ।
फिर किस पर और कैसा शासन
वैसे भी सत्ता और सुख उनके लिए
जो साधन संपन्न हैं और
शोषण और शासन उन पर
जिनका मुख तो है पर आवाज नहीं ,
क्योंकि गुम है कहीं उनकी आवाज
हृदय के गहन गह्वर में
अशांत , पर पत्थर सा प्रहार करती हुई ।

राजगीर नालंदा


