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आज देश भर में मनाया जा रहा है गाईजात्रा

 

भाद्र कृष्ण प्रतिपदा से अष्टमी तक प्रत्येक वर्ष आठ दिनों तक मनाया जाने वाला पारंपरिक सांस्कृतिक उत्सव ‘गाईजात्रा’ आज विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन कर देशभर में मनाया जा रहा है ।

एक वर्ष के भीतर जिन रिश्तेदारों का निधन हो गया है, उनकी स्मृति में आज एक गाय या व्यक्ति को गाय के रूप में सुशोभित किया जाता है और अपने-अपने क्षेत्रों में परिक्रमा किया जाता है और उन्हें दूध, फल, रोटी, चूडा, दही और साथ ही अनाज दिया जाता है। भक्तों द्वारा पदार्थ एक धार्मिक मान्यता है कि जो लोग वर्ष के दौरान मर जाते हैं वे गाय की पूंछ पकड़कर वैतरणी पार करते हैं।

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यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि राजा प्रताप मल्ल के लोगों को अपने घरों में मृतकों के नाम पर शहर के चारों ओर घूमने के आदेश के आधार पर त्योहार शुरू किया गया था । आज के दिा शोक कम ककरने के लिए  विभिन्न हास्य और व्यंग्य कार्यक्रमों को आयोजित करने के आदेश के अनुसार व्यंग्य का अभ्यास किया जाता है।

प्रताप मल्ल के समय से प्रचलन में आने वाली गाईजात्रा  हनुमान ढोका शुरु होता है। वैसे तो देश के अलग-अलग शहरों में मनाया जाता है, लेकिन घाटी में इसकी खास चमक देखने को मिलती है। कोरोना के चलते शारीरिक दूरी बनाकर त्योहार मनाने की जरूरत है।

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भाद्र कृष्ण अष्टमी के दिन तक मनाए जाने वाले त्योहार के दौरान, मृतक की याद में कॉमेडी, सामाजिक बुराइयों पर व्यंग्य, नृत्य गीत और रामायण के करुणा रस के गीत गाए जाते हैं।

आजकल गाईजात्रा के अवसर पर समाज में विद्यमान विकृतियों और विसंगतियों को उजागर किया जाता है। सार्वजनिक रूप से मनोरंजक और व्यंग्यपूर्ण तरीके से विभिन्न कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं। समाचार पत्र सामाजिक मुद्दों पर व्यंग्यात्मक मुद्दों को भी प्रकाशित करते हैं।

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गाईजात्रा उत्सव काठमांडू घाटी, बनेपा, धुलीखेल, पनौती, बरहवीसे, त्रिशूली, दोलखा, खोतांग, भोजपुर, चैनपुर, इलम, धरान, विराटनगर, बीरगंज, हेतौदा और पोखरा में मनाया जाता है। इस साल पहली बार सरकार ने गाईजात्रा के मौके पर देश भर में नेवार समुदाय को सार्वजनिक अवकाश दिया है। काठमांडू घाटी में आज गाईजात्रा के अवसर पर सार्वजनिक अवकाश दिया गया है।

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