हिंदी भाषा – साहित्य के अप्रतिम व्यक्तित्व – डॉ. कृष्णचंद्र मिश्र जी : विनोदकुमार विमल
हिंदी भाषा – साहित्य के पुरोधा डॉ. कृष्णचन्द्र मिश्र की 30 वीं पुण्यतिथि पर विशेष आलेख

विनोदकुमार विमल, 11 जून, काठमांडू । समय कितनी तेज़ी से बीत जाता है, यह कोई नहीं जानता । आज जब मैं पुराने दिनों को याद करता हूँ, तो ऐसा लगता है मानो वे दिन अब महज़ एक सपना बनकर रह गए हों । लेकिन वो यादें अब भी मेरे मन के किसी कोने में बसी हुई हैं । आज से 33 साल पहले ( वि.सं.2050 ), मैं अंग्रेज़ी केंद्रीय विभाग का छात्र था, उस समय डॉ. कृष्णकृष्ण चंद्र मिश्र जी हिंदी केंद्रीय विभाग (तब केंद्रीय हिंदी विभाग) के प्रमुख थे । मेरे ससुर, बसंत कुमार विश्वकर्मा भी उसी विभाग में सहायक प्रोफेसर थे । इसीलिए मैं उस विभाग में अक्सर आता – जाता रहता था । सबसे पहले मेरी मुलाकात डॉ. कृष्ण चंद्र मिश्र जी से हुई, फिर डॉ. सूर्यनाथ गोप जी से ।
जिस साल मैंने अंग्रेजी की अंतिम परीक्षा दी, उसी साल मुझे हिंदी केंद्रीय विभाग में दाखिला मिल गया । हालांकि हिंदी भाषा के प्रति मेरी रुचि स्नातक स्तर की पढ़ाई के समय से ही थी । स्नातक स्तर की पढ़ाई के दौरान, अंग्रेजी और नेपाली व्याकरण के अलावा, मुझे हिंदी व्याकरण का भी गहरा ज्ञान था । इसी तरह, डॉ. कृष्णचंद्र मिश्र जी और डॉ. सूर्यनाथ गोप जी ने मुझे हिंदी में स्नातकोत्तर की पढ़ाई करने के लिए प्रोत्साहित किया । उनके अस्वस्थ होने के कारण मुझे लगभग 6 – 7 महीने तक उनकी कक्षाएं लेने का अवसर मिला । उनकी विद्वत्ता का वर्णन शब्दों में नहीं किया जा सकता । मैं संक्षेप में यह बताना चाहूंगा कि वे भाषा – विज्ञान की कक्षा में धाराप्रवाह व्याख्यान देते थे । मैं भाषा – विज्ञान का गहन ज्ञान प्राप्त करने और भविष्य में उनकी तरह धाराप्रवाह व्याख्यान देने में सक्षम होने के लिए नियमित रूप से उनकी कक्षाओं में जाता था । उन्होंने जो विषय पढ़ाए थे, वे आज भी मेरे मन में ताज़ा हैं । हालांकि मैंने अंग्रेज़ी पढ़ते समय भाषा – विज्ञान का भी अध्ययन किया था । जब वे अस्वस्थ होते थे, तब विभाग से छुट्टी लेते थे । उस समय मैं उनके क्वार्टर में उनसे मिलने जाया करता था । मुलाकात के दौरान वे मुझे भाषा – विज्ञान में निपुणता हासिल करने की सलाह देते थे । दुर्भाग्यवश, जब मैं प्रथम वर्ष में पढ़ रहा था, तब 28 ज्येष्ठ, 2053 को उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया । उनकी अचानक मृत्यु की खबर सुनकर मुझे गहरा सदमा लगा ।
लगभग 5 – 6 साल पहले, मैंने अपने विभाग में हिंदी शिक्षण से संबंधित कुछ महत्त्वपूर्ण तथ्यों को एकत्रित करने के लिए एक विस्तृत अध्ययन किया था । इस प्रक्रिया में, मैंने मिश्र जी के बारे में कई तथ्य एकत्र किए थे । इस लेख में मैंने मुख्य रूप से उनके व्यक्तित्व के बारे में कुछ तथ्यों को शामिल करने का प्रयास किया है । वि. सं. 2030 (1973 ईस्वी ) श्रावण में मिश्र जी को त्रिभुवन विश्वविद्यालय, कीर्तिपुर के हिंदी केंद्रीय विभाग में सहायक प्रोफेसर के रूप में नियुक्त किया गया था । उस समय प्रोफेसर डॉ. कामेश्वर शर्मा जी विभागाध्यक्ष थे । वह यहाँ सन् 1968 / 1969 में कोलंबो योजना के तहत बिहार विश्वविद्यालय से प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष के रूप में भारत सरकार द्वारा भेजे गए थे । वे इस योजना के अंतर्गत भारत से आने वाले हिंदी के अंतिम विद्वान थे । उनका कार्यकाल समाप्त होने के बाद, वे भारत लौट गए और उसके बाद कोलंबो योजना बंद कर दी गई । डॉ. शर्मा के भारत लौटने के अन्तिम समय के आसपास तक रामचन्द्र साह की अस्थायी लेक्चरर पद पर नियुक्ति हुई । उसी के थोड़े ही दिनों के बाद मिश्र जी की नियुक्ति इस विभाग के स्थायी लेक्चरर पद पर हुई । इससे पहले वह जनकपुर के रामसागर रामस्वरूप कॉलेज में हिंदी के लेक्चरर थे । वि. सं. 2030 श्रावण से त्रिभुवन विश्वविद्यालय ने अनेक प्राइवेट कॉलेज को संबंधन प्रदान कर दिया जिनमें जनकपुर कॉलेज भी एक था । उसी क्रम में मिश्र जी की नियुक्ति जनकपुर से विश्वविद्यालय के हिंदी केंद्रीय विभाग में हुई l उस समय, इस विभाग में प्रो. डॉ. कामेश्वर शर्मा के साथ एसोसिएट प्रोफेसर सूर्यनाथ गोप जी भी कार्यरत थे ।
मिश्र जी लगभग चार वर्षों तक चीन में रेडियो पेकिंग में हिंदी भाषा विशेषज्ञ के रूप में रहे । उस समय सूर्यनाथ गोप जी हिंदी केंद्रीय विभाग के प्रमुख थे । मिश्र जी के चीन से लौटने के बाद, गोप जी ने 1981 में बॉम्बे विश्वविद्यालय में पीएचडी करने के लिए दाखिला लिया, लेकिन खराब स्वास्थ्य और विशेष कारणों से, डेढ़ साल बाद, वे इलाहाबाद विश्वविद्यालय चले गए और वहां से 1983 / 1984 में अपनी पीएचडी पूरी की । उस दौरान मिश्र जी विभागाध्यक्ष बने और उन्होंने लंबे समय तक कुशलतापूर्वक विभागाध्यक्ष के रूप में कार्य किया । उन्होंने लंबे समय तक हिंदी केंद्रीय विभाग के मुखपत्र साहित्य लोक के प्रधान संपादक के रूप में कार्य किया । उनकी प्रमुख कृतियों में ` ट्राइब्स इन महाभारत` ( महाभारत में जनजातियाँ, शोध ग्रन्थ , अंग्रेजी ), `जनकपुर प्रोफाइल` ( अंग्रेजी पुस्तिका),` नेपाल की भाषा समस्या` और` नेपाल में हिंदी` शामिल हैं । संक्षेप में, यह कहा जा सकता है कि उन्होंने वि. सं. 2030 से वि. सं. 2053 तक लेक्चरर, एसोसिएट प्रोफेसर और प्रोफेसर के रूप में हिंदी भाषा और साहित्य में अपनी सेवाएं दीं ।
हिंदी भाषा – साहित्य के पुरोधा तथा मूर्धन्य लेखक मिश्र जी की जन्मभूमि पिपरा है । उनका जन्म वि. सं. 1991 में वर्तमान मधेश प्रदेश के महोत्तरी जिले के पिपरा गांव में मिश्र परिवार में हुआ था । उनकी माता का नाम सीयावती देवी और पिता का नाम श्याम सुंदर मिश्र था । दोनों आस्तिक और धार्मिक स्वभाव के थे । अतः उनकी आस्तिकता और धार्मिकता इन्हें पैतृक दाय के रुप में प्राप्त हुई । वातावरण और परिवेश से ही व्यक्ति का निर्माण होता है, मिश्र जी इसके ज्वलंत उदाहरण थे । मिश्र जी ने मुजफ्फरपुर के धर्म समाज संस्कृत विद्यालय से वेदांत में शास्त्री और साहित्याचार्य की उपाधि प्राप्त करने के बाद, उन्होंने बिहार के दरभंगा स्थित कामेश्वर सिंह संस्कृत विश्वविद्यालय से संस्कृत में स्नातकोत्तर की उपाधि प्रथम श्रेणी ( गोल्डमेडलिस्ट ) में प्राप्त की । इसके बाद उन्होंने बिहार विश्वविद्यालय से हिंदी में स्नातकोत्तर और साहित्याचार्य में डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की ।
मिश्र जी किसी परिचय के मुंहताज नहीं थे । वे एक प्रबुद्ध समीक्षक थे, युगांतकारी विचारक थे तथा मूर्धन्य लेखक थे । इनके व्यक्तित्व में हिमालय की उच्चता, विशालता और चिंतन में जान्हवी – सी अम्लान वेग रहा है । वे नितांत सौम्य प्रकृति के पुरुष रहे हैं । मिश्र जी के बहुआयामी व्यक्तित्व के कई आयाम हैं, जिनपर यत्किंचित चर्चा अपेक्षित है – 1. आदर्श प्राध्यापक के पर्याय — मिश्र जी अध्ययनशील, कर्मठ और कुशल प्राध्यापक रहे हैं । इन्होंने अपने आचरण, व्यवहार और अपनी अध्यापन कला से न केवल छात्र – छात्राओं के हृदय में स्थान बनाया, अपितु अपने सहकर्मियों को भी प्रभावित किया था । लोकप्रियता यदि किसी प्राध्यापक की श्रेष्ठता की कसौटी है या हो सकती है तो, मिश्र जी इसके ज्वलंत उदाहरण थे । 2. निरभिमानता के धनी – मिश्र जी सफलता के शिखर विजित करते चले गए लेकिन कहीं भी किसी प्रकार का अभिमान उनको छुआ तक नहीं । स्वयं भी आगे बढे और और दूसरों को भी आगे बढ़ाया । उनके सान्निध्य में जो भी आया सदैव उचित मार्गदर्शन प्रदान किया । 3. कर्मठता के पर्याय – उन्होंने अपनी कर्मठता और कर्तव्यपरायणता से सब कुछ पाया । मान – सम्मान, ऋद्धि – सिद्धि, उन्नति – प्रोन्नति, लेकिन कभी भी उनको किसी भी प्रकार का अहंकार नहीं हुआ । आज हर कोई प्रसिद्धि चाहता है, लेकिन प्रसिद्धि पाने के लिए अपेक्षित साधना नहीं करता । मिश्र जी ने साधना से सिद्धि और सिद्धि से प्रसिद्धि पाई है । 4. पारस व्यक्ति के धनी – उनका व्यक्तित्व पारस मणि की तरह था जिसके संस्पर्ष से लोहा भी सोना बन जाता । जो भी उनके सम्पर्क में आया, उसे उन्होंने सोना बना दिया । उनके अनेकशः शिष्य और सहयोगी इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं । यही उनके व्यक्तित्व की निजी विशेषता रही है ।
मिश्र जी ने नेपाल में हिंदी को मान्यता दिलाने के लिए जीवन भर अथक संघर्ष किया । जब मैं हिंदी केंद्रीय विभाग में पढ़ रहा था, तब उन्होंने मुझे हिंदी के लिए किए गए अपने संघर्षों के बारे में बताया था, जो आज भी मेरे मन में ताजा हैं । मैं इस लेख के माध्यम से उनके द्वारा उल्लिखित कुछ महत्त्वपूर्ण संघर्षों को साझा करना चाहूंगा । वे इस प्रकार हैं – 10 -12 जनवरी 1975 को नागपुर, भारत में आयोजित प्रथम विश्व हिंदी सम्मेलन के दौरान, मिश्र जी हिंदी केंद्रीय विभाग के प्रमुख थे और उस सम्मेलन में नेपाल की ओर से नेपाल में हिंदी की स्थिति के बारे में जानकारी देना चाहते थे । इसके लिए उन्होंने ‘नेपाल में हिंदी की दुर्दशा‘ शीर्षक से एक विस्तृत कार्यपत्र भी लिखा था । उस समय सम्मेलन में भाग लेने के लिए सरकार से अनुमति लेनी आवश्यक थी । उन्होंने इसके लिए बहुत प्रयास किया, लेकिन सरकार ने अनुमति नहीं दी । इसी बीच उन्होंने एक और घटना सुनाई । पांचवां विश्व हिंदी सम्मेलन 1996 में त्रिनिदाद और टोबैगो के पोर्ट ऑफ स्पेन में आयोजित किया गया था । उस समय नेपाल में गठबंधन सरकार थी और नेपाल सद्भावना पार्टी, जो नेपाल में हिंदी भाषा की मान्यता के लिए संघर्ष कर रही थी, भी इसमें शामिल थी, और पार्टी के अध्यक्ष गजेंद्र नारायण सिंह आपूर्ति मंत्री थे । शिक्षा मंत्रालय, भारतीय दूतावास और गजेंद्र नारायण सिंह से इस सम्मेलन में भाग लेने का अनुरोध करने के बाद, गजेंद्र नारायण सिंह के नेतृत्व वाली मंत्रिपरिषद ने एक सांसद के साथ मिश्र जी के नाम की सिफारिश की । लेकिन दुर्भाग्यवश, सम्मेलन में भाग लेने से पहले ही प्रतिनिधिमंडल से उनका नाम हटा दिया गया ।
किसी सरस्वती पुत्र की सारस्वत साधना का आंकलन तथा मूल्यांकन करना आसान काम नहीं है, विशेषतः उस सरस्वती पुत्र की भाषिक साधना का आंकलन या मूल्यांकन तो और भी कठिनतम कार्य है, जिसका व्यक्तित्व और कृतित्व बहुआयामी हो, जिसके चिंतन का आकाश बहुत व्यापक और विस्तृत हो और जिसकी समझ की गहराई सागरवत् हो और एक साथ हिंदी, संस्कृत और अंग्रेजी भाषाओं में निश्नत हो । ऐसे वाणी साधक का बहिरंग जितना व्यापक होता है, अन्तरंग उससे कहीं अधिक गहरा । मेरी दृष्टि में मिश्र जी ऐसे ही सरस्वती के वरद् पुत्र एवं श्रेष्ठ साधक थे । हिंदी भाषा – साहित्य के पुरोधा, मनीषी चिंतक, आदर्श प्राध्यापक, प्रखर वक्ता एवं सम्पादक मिश्र जी गरिमामय व्यक्तित्व के स्वामी थे । एक साहित्यसेवी के रूप में भी उनका योगदान बहुमूल्य है l उनके गम्भीर सृजन से जहाँ साहित्य की श्रीवृद्धि हुई है, वहीं एक व्यापक समाज में, उसके प्रचार – प्रसार के लिए उन्होंने विपुल योगदान दिया । एक अन्वेषक और गम्भीर आलोचक के रुप में भी उनकी ख्याति रही है ।
अंत में, मैं यह कहना चाहूंगा कि उनकी मृत्यु से हिंदी जगत को अपूरणीय क्षति हुई है । किन्तु ` ईश्वरेच्छा बलीयसी` मृत्यु पर तो किसी का वश भी नहीं है । मिश्र जी का कष्ठसाध्य एवं प्रसन्न व्यक्तित्व सर्वदा सभी को प्रेरणा देता रहेगा । नेपाल में हिंदी भाषा – साहित्य के सर्जन एवं संबर्धन के हेतु उनका सतत् उत्कट, साहसिक तथा अतुलनीय सहयोगात्मक प्रयास ने उन्हें अमर बना दिया । मिश्र जी के द्वारा छोड़ी गयी उद्देश्यपूर्ण गतिविधियों को, सतत् आगे बढ़ाना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी । ईश्वर हम सबको वह क्षमता और अवसर दे । समझ में नहीं आ रहा कि क्या लिखें क्या छोड़ दें । इतने दिनों के संस्मरणों का सागर उमड़ रहा है उन्हें याद करने से नेत्र भी बार – बार सजल होते हैं । लेख की अपनी सीमा है इसलिए इन पंक्तियों के साथ अपने परम आदरणीय गुरू के श्रीचरणों में भाव प्रसून अर्घ्य अर्पित करता हूँ — “तुम्हें याद करने से सद्कर्म वृत्ति पनपेगी ।
आज तुम्हारी यश काया ही हमें प्रेरणा देगी ।।”



डा. कृष्णचंद्र मिश्र के पुण्य तिथि पर श्रद्धांजलि स्वरूप समर्पित एक विकान्सोन्मुख आलेख मार्गदर्शन प्रदान हेतु उत्कृष्ट लेखन के लिए आदरणीय विनोद कुमार विश्वकर्मा सर! का हार्दिक आभार एवं सतत नमन, उत्कृष्ट आलेख हेतु हार्दिक हार्दिक बधाई एवं मंगलमय शुभकामना है आदरणीय!