ना तख्ती, ना उड़न खटोला : वसन्त लोहनी
ना तख्ती, ना उड़न खटोला
वक्त आहिस्ता आहिस्ता चलता है
और गुजर जाता हैं
हम समझते हैं जल्दी गुजर गया
और कहने लगते हैं
उसकी पंख होती है उड़ने की
वक्त के साथ ऐसे कुछ नहीं होता
सिर्फ होता हैं अपना रफ्तार
उस को कोई न तेज कर सकता है
न लाख चाहने पर भी कम
वक्त अपनी नियम में चलता है
और हम बुद्धिमान बनने की ख्वाहिश में
वक्त की नियम तोड़ते रहते हैं
वजह यही है हम पीछे पड़ जाते हैं
और कोसते रहते हैं वक्त को
तभी तो कहते हैं – वक्त उड़ता है
जी नहीं, वक्त उड़ता नहीं
ना वक्त तख्ती हैं आप चट्टा लगा सके
ना वक्त उड़न खटोला है
आप जब चाहे उड़ा सके।



