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भारत की सुरक्षा है सबसे बड़ी चुनौती : उदय सी भास्कर, रक्षा विश्लेशक

 

indian__army_chiefजहाँ तक भारत और पाकिस्तान के बीच संघर्ष विराम के उल्लंघन और पाकिस्तान की ओर से कथित तौर पर भारत में दहशतगर्दी फैलाने की कोशिश का सवाल है, मेरा मानना है कि यह पाकिस्तान की सेना की एक ख़ास तरह की रणनीति है.

पाकिस्तान की सेना ने मई 1990 से इसकी शुरुआत की थी. ऐसा करके उसने भारत की क्लिक करें
आंतरिक सुरक्षा की चुनौतियों को बढ़ाने की कोशिश की है.
जिस समय इस रणनीति की शुरुआत हुई उस समय अफ़गानिस्तान की अंदरूनी स्थिति की वजह से क्लिक करें
भारत और पाकिस्तान के रिश्ते
प्रभावित हो रहे थे.

अब क़रीब 23 साल बाद अमरीका अफ़गानिस्तान से बाहर निकलने की कोशिश कर रहा है, हम इसी तरह की लहर देख रहे हैं. अभी दो-चार दिन पहले ही अफ़गानिस्तान में भारतीय वाणिज्य दूतावास पर हमला हुआ था.
दहशतगर्दी
पाकिस्तान की सेना की इस रणनीति के अलावा हम देख रहे हैं
कि पूरे इलाके में दहशतगर्दी का माहौल है. अल क़ायदा के प्रमुख अल जवाहिरी जैसे नेता अपने काडर को कार्रवाई के लिए ललकार रहे हैं. यह भारत की सुरक्षा के लिए एक बहुत ही जटिल चुनौती है.

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अब देखना यह है कि भारत और पाकिस्तान के बीच वार्ता बहाली और शांति कायम करने के प्रयासों के बीच भारतीय क्लिक करें
प्रधानमंत्री किस तरह का क़दम उठाते
हैं.

एक बार फिर भारत उसी मोड़ पर पहुँच गया है, जब जनवरी 2004 में भारतीय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और जनरल परवेज मुशर्रफ़ के बीच एक समझौता हुआ था.

इस समझौते का मुख्य बिंदु यह था कि पाकिस्तान इस बात का आश्वासन देगा की वह किसी भी तरह की दहशतगर्दी को समर्थन नहीं देगा. लेकिन पिछले नौ साल से हम एक ही तरह की कार्रवाई का सामना कर रहे हैं.

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मुझे लगता है कि 2014 तक दक्षिण एशिया में काफी उथल-पुथल होगी, क्योंकि अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान में गंभीर मंथन चल रहा है.

भारत और चीन भी अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान पर अपनी रणनीति की समीक्षा कर रहे हैं. यह उनकी सामरिक रणनीति का हिस्सा है, क्योंकि इस तरह की दहशतगर्दी चीन की भी समस्या है. वहीं भारत पिछले 23 साल से इस तरह की समस्या का सामना कर रहा है.

इसलिए मुझे लगता है कि इन चारों देशों के लिए अगले दो साल काफी उथल-पुथल भरे होंगे.
कैसे होंगे रिश्ते
भारत में चुनाव होने हैं, इसलिए देखना यह भी होगा कि राजनीतिक पार्टियां इसे किस रूप में लेती हैं.

अभी पाकिस्तान से जिस तरह के संकेत मिल रहे हैं उनसे यह साफ नहीं हो पा रहा है कि वहाँ की सेना और नई सरकार के बीच तालमेल है या नहीं. सेना ने नवाज शरीफ सरकार को स्वीकार किया है या नहीं.

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पाकिस्तान में रोज हमले हो रहे हैं इसमें देखना यह होगा कि पाकिस्तान के अंदरूनी गुटों पर वहाँ की सेना और खुफिया एजेंसियां काबू पा पाती है या नहीं.

ऐसे हालात में भारत सरकार के सामने जो समस्या है, वह यह कि वह नवाज़ शरीफ़ सरकार के साथ किसी तरह के और कहाँ तक संबंध रखे.

भारत को यह भी स्वीकार करना होगा कि अल क़ायदा जैसे संगठन पाकिस्तान की सेना और सरकार की पकड़ से बाहर हैं, क्योंकि यह विचारधारा किसी राजनीतिक दायरे को नहीं मानती है.

(बीबीसी संवाददाता अजय शर्मा से बातचीत पर आधारित)

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