‘चीन–सीमा–विवाद कमिटी गठन’ महज राजनीतिक शिगुफ़ा तो नहीं : डॉ. श्वेता दीप्ति
डॉ श्वेता दीप्ति, हिमालिनी अंक सितम्बर, 2021। नेपाल की राजनीतिक हलकों में एकबार फिर से नेपाल–चीन–सीमा विवाद पर चर्चा का बाजार गर्म है । किन्तु इस गर्माहट का असर कितना दूरगामी होगा यह कहना फिलहाल मुश्किल है । क्योंकि, यह राजनीति है, जहाँ किसी भी मुद्दे पर कमिटियाँ तो गठित होती हैं किन्तु रिपोर्ट की फाइल कभी दबी रह जाती है, तो कभी गायब कर दी जाती है । वर्तमान देउवा सरकार ने चीन के कब्जे वाले मामले की जाँच के लिए एक हाईलेवल कमिटी का ऐलान किया है । यह कमिटी चीन के साथ सभी सीमा मुद्दों को लेकर अपनी रिपोर्ट सौंपेगी ।
पिछले वर्ष जब चीन का भारत के साथ गलवान में खूनी झड़प हुई थी तभी हुमला में चीन द् वारा नेपाली जमीन अतिक्रमण का मामला भी सामने आया था । उस वक्त भी कमिटी गठन हुई थी किन्तु विवादित स्थल तक कमिटी के सदस्य को पहुँचने ही नहीं दिया गया और उन्हें वापस लौटना पड़ा था । उस समय तत्कालीन प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली की सरकार ने एक सिरे से चीन द्वारा हुए भूमि अतिक्रमण के आरोपों को खारिज करते हुए कहा था कि चीन के साथ किसी भी जगह कोई सीमा विवाद नहीं है ।
यहाँ तक कि उस वक्त की रिपोर्ट भी सार्वजनिक नहीं की गई थी । तभी चीन ने दावा किया था कि उसने नेपाली जमीन पर कोई बिल्डिंग नहीं बनवाया है बल्कि जो भी निर्माण हुआ है वह चीन के तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र के बुरंग काउंटी में हुआ है । यही नहीं उस समय चीन के आधिकारिक मीडिया ग्लोबल टाइम्स ने लिखा था कि, नेपाल के सर्वेक्षणकर्ता कम प्रशिक्षित और गैर पेशेवर हैं, इसलिए सीमा के निर्धारण में उनसे गलती हुई है । चीन ने पिलर नंबर ११ और १२ को निशाना बनाते हुए एक नक्शा बनाया था और इसे अपने मुखपत्र ग्लोबल टाइम्स के माध्यम से सार्वजनिक किया था ।
जबकि चीन के साथ नेपाल सरकार २००५ से सीमा विवाद में उलझी हुई है । इसी विवाद के चलते नेपाल ने २०१२ में हुई सीमा संबंधी बातचीत को भी रद्द कर दिया था । हुमला का मामला कोई नया नहीं है । चीन नेपाल के कई अन्य सीमावर्ती इलाकों में ऐसी हरकत कर चुका है और नेपाल की धरती पर स्थायी निर्माण और सड़क बना चुका है । चीन द्वारा नेपाल के गोरखा जिले के रूई गांव को अपने में मिला लेने की भी खबर आई थी जिसके बाद देश में काफी हंगामा हुआ था । उस वक्त विपक्ष नेपाली कांग्रेस ने नेपाली संसद के निचले सदन में रिजॉल्यूशन भी पेश किया था जिसमें ओली सरकार से चीन की छीनी हुई जमीन वापस लेने के लिए कहा गया था । विपक्ष के नेताओं ने आरोप लगाया था कि चीन ने दोलखा, हुमला, सिंधुपालचौक, संखूवसाभा, गोरखा और रसूवा जिलों में ६४ हेक्टेयर जमीन पर अतिक्रमण कर रखा है –नेपाल और चीन के बीच १४१४.८८ किमी की सीमा पर करीब ९८ पिलर गायब हैं और कइयों को नेपाल के अंदर खिसका दिया गया है । हालांकि उस समय नेपाल के विदेश मंत्री प्रदीप ग्यावली ने चीन के द्वारा नेपाल के किसी भी भूभाग पर कब्जे से सापÞm इनकार कर दिया था और कहा था कि चीन के साथ नेपाल का कोई सीमा विवाद नहीं है ।
विदित हो कि नेपाल और चीन के बीच की सीमा का निर्धारण दोनों पक्षों की रजामंदी से १९६० में हुआ था । इसके बाद दोनों देशों के बीच १९६१ में सीमा समझौता हुआ था और सीमा पर पिलर लगाए गए थे । इस समझौते के बाद दोनों देशों के सीमावर्ती इलाकों में कई बदलाव हुए लेकिन सीमा रेखा नहीं बदली । बाद के वर्षो में दोनों देशों की सीमा पर ७६ परमानेंट पिलर भी खड़े किए गए । लेकिन अब जो सामने आ रहा है उससे साफ जाहिर हो रहा है कि चीन यथास्थिति को बदलने का प्रयास कर रहा है ।
कुछ समय पहले पूर्व सरकार के पाले में कृषि मंत्रालय के सर्वे विभाग ने एक रिपोर्ट तैयार की थी, जिसके मुताबिक सीमावर्ती ११ स्थानों में से १० जगहों में चीन द्वारा अतिक्रमण किया गया दिखाया गया था । तब नेपाली सरकार ने आशंका जताई थी कि आने वाले वक्त में चीन वहां अपनी सेना की पोस्ट तैयार कर सकता है । न्यूज एजेंसी एएनआई की रिपोर्ट की कॉपी में बताया गया था कि चीन तिब्बत इलाके में अपना सड़क नेटवर्क बढ़ा रहा है, जिसके कारण कई नदियों और उनकी सहायक नदियों ने अपना रास्ता बदल दिया है और अब उनका रुख नेपाल की ओर बहने लगी हैं । इसका नतीजा ये हुआ है कि नेपाल की सीमा घटती जा रही है । सर्वे में आशंका जताई गई थी, कि अगर इसी तरह से सीमा घटती जाएगी, तो आने वाले वक्त में देश की जमीन का एक बड़ा हिस्सा तिब्बत से मिल जाएगा । सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक, सीमा के करीब चीन के निर्माण कार्य से बागडेर नदी और कर्नाली नदी का रुख मुड़ गया, जिसके कारण नेपाल के हुमला जिले के करीब १० हेक्टेयर जमीन पर चीन का अतिक्रमण हो गया है । इसी तरह रसुवा जिले में भी ६ हेक्टेयर जमीन पर चीन ने कब्जा जमा लिया है । वहीं संखुवासभा जिले में भी नदी के बहाव में बदलाव के कारण नेपाली जमीन के ९ हेक्टेयर हिस्से पर चीन का अतिक्रमण हो चुका है, जबकि करीब ११ हेक्टेयर जमीन ऐसी है जिस पर चीन दावा करता रहा है कि ये तिब्बत का हिस्सा है ।
हुमला में सूत्रों के अनुसार कई सालों से लाप्चा,लिमी क्षेत्र में चीन अतिक्रमण कर रहा है । यह क्षेत्र बहुत ही महत्त्वपूर्ण रणनीतिक स्थान है और यहां से कैलाश मानसरोवर यात्रा का स्पष्ट नजारा दिखता है । १० साल पहले जब क्षेत्र में सड़क निर्माण किया गया था तो चीन ने वहां एक इमारत का निर्माण किया था । नेपाल के इस पर आपत्ति जताने पर चीन ने इसे पशु चिकित्सा केंद्र बताया और कहा कि वह केंद्र दोनों देशों के लिए उपयोगी होगा । लाप्चा लिमी क्षेत्र देश का सुदूर इलाका है । यहां प्रशासन की प्रभावित उपस्थिति नहीं रहती है । चीन ने इसी बात का फायदा उठाते हुए इमारतों का निर्माण किया और अब खुले तौर पर उसने यह स्पष्ट कर दिया है कि वह जमीन नेपाल की नहीं है । सूत्रों के अनुसार चीन पिछले कई महीनों से तिब्बत में अपने अधिकार क्षेत्र के तहत सड़कों का निर्माण कर रहा है । इससे नेपाल में बहने वाली कुछ नदियों का रास्ता बदल गया है । इस स्थिति ने चीन को नेपाल की जमीन पर कब्जा करने का मौका दे दिया है ।
चीन का कहना है कि नदी उसके क्षेत्र में बह रही तो जमीन भी उसी की है । अगर हालात यही रहे तो आने वाले वक्त में सैकड़ों हेक्टेयर जमीन नेपाल के हाथों से निकल जाएगी क्योंकि नेपाल के पहाड़, मैदानी इलाकों और उसकी नदियों तक चीन की पहुंच हो चुकी है.
चीन की विश्व–सम्राट बनने की लोलुपता
चीन की विस्तारवादी नीति से विश्व परिचित है । सहयोग और विकास के सपने दिखा कर ऋण देना और फिर आहिस्ता–आहिस्ता अपने पंजों को फैलाकर सामने वाले को दबोच लेना, यह उसकी नीति रही है । इसी नीति के तहत आज अफगानिस्तान में वह उस तालिबान का साथ दे रहा है जिसे विश्व स्तर पर आतंक का पर्याय माना जा रहा है और इसमें उसका साथ वो राष्ट्र दे रहा है जो स्वयं चीन के कर्जे तले दब कर अपना कई महत्त्वपूर्ण हिस्सा उसके हवाले कर चुका है । चीन ने तालिबान के खूबियों के कसीदे पढ़ते हुए कहा है कि तालिबान अब बदल गया है जबकि तालिबान की हकीकत कुछ ही दिनों में जाहिर होने लगी है ।
चीन का इतिहास बताता है कि वहाँ चाहे राजशाही रही हो, गणतंत्र रहा हो या साम्यवादी शासन, हर काल में उसने ताकत और हथियार के बल पर अपने साम्राज्य का विस्तार किया है । चीन के कई प्राचीन राजवंशों ने देश की सीमा को कोरिया, वियतनाम, मंगोलिया और मध्य एशिया तक बढ़ाया । १९४९ में जब चीन में माओ त्से तुंग के नेतृत्व में साम्यवादी शासन की स्थापना हुई तो यह विस्तारवादी नीति और उग्र हो गयी । माओ का कथन था, “सत्ता बंदूक की नली से निकलती है । ” माओ ने अपने देशवासियों को भरोसा दिलाया था कि प्राचीन काल में चीन की सीमाएं जहां तक थीं, पीपुल्स लिबरेशन आर्मी उसे जरूर हासिल करेगी । इसके बाद चीन हर हथकंडे अपनाकर अपनी सीमा का विस्तार करने लगा । चीन अपने १४ पड़ोसियों की जमीन पर तो दावा करता ही है वह ८ हजार किलोमीटर दूर अमेरिका के हवाई द्वीप को भी अपना मानता है । चीनियों के मुताबिक चीनी नाविकों ने कोलबंस से बहुत पहले ही अमेरिका की खोज कर ली थी । अमेरिका के न्यू मैक्सिको राज्य के चट्टानों पर बने चित्र इसके प्रमाण हैं । इतना ही नहीं चीन यह भी कहता है कि यूरोप की खोज से शताब्दियों पहले उसके नाविक आस्ट्रेलिया में बस गये थे । चीन अपनी विस्तारवादी नीति के लिए युद्ध अनिवार्य मानता है इसलिए दुनिया के २३ देश उसकी कुटिल चाल से परेशान हैं ।
दुनिया में सबसे अधिक पड़ोसी चीन को मिले हैं । चीन की सीमा १४ देशों से मिलती है । भूगोल ने उसको एक बड़ी नेमत दी है लेकिन जमीन की बढ़ती भूख उसे अपने हर पडोसी से झगड़ा करवा रही है । उससे केवल भारत ही नहीं बल्कि दुनिया के २२ और देश परेशान हैं ।
एक नजर दुनिया के उन देशों पर जो चीन की विस्तारवादी नीति का शिकार बन रहा है ः
अफगानिस्तान ः अफगानिस्तान के बदख्शां प्रांत पर चीन अपना दावा करता है । १९६३ की संधि के बावजूद उसने इस प्रांत में अतिक्रमण कर रखा है ।
भूटान ः भूटान के चेरपिक गोम्पा, धो, डंगमार, गेसूर डोकलाम, सिचुलंग, द्रामना और हा जिले के भूभाग को चीन अपना मानता है । चीन ने भूटान में भी घुसपैठ कर रखी है ।
ब्रुनेई ः दक्षिण चीन सागर स्थित ब्रुनेई के स्प्रैटली द्वीप पर चीन अपना दावा करता है ।
म्यांमार ः चीन का कहना है कि युआन राजवंश (१२७१–१३६८ ) के शासन में बर्मा चीन के अधीन था । म्यांमार से भी चीन का सीमा विवाद है ।
कम्बोडिया ः चीन के मुताबिक कम्बोडिया मिंग राजवंश (१३६८–१६४४) के समय चीन का हिस्सा था । इसलिए उसके बड़े भूभाग पर चीन दावा करता रहा है ।
भारत ः सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश और लद्दाख में चीन घुसपैठ करता रहा है । १९६२ की लड़ाई के बाद चीन ने भारत की ३८ हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर कब्जा कर लिया है ।
इंडोनेशिया ः दक्षिणी चीन सागर में इंडोनेशिया के नातुना द्वीप समूह पर चीन अपना दावा करता रहा है ।
जापान ः पूर्वी चीन सागर में जापान के सेनकाकू द्वीप को भी चीन अपना कहता है ।
कजाकिस्तान ः चीन का दावा है कि कजाकिस्तान चीनी सम्राट कुबलई खान (१२६०–१२९४) के समय उसका हिस्सा था । चीन कजाकिस्तान के बड़े भूभाग पर अपना दावा करता रहा है ।
किर्गिस्तान ः चीन किर्गिस्तान को भी प्राचीन चीन का हिस्सा मानता है । उसका आरोप है कि १९वीं शताब्दी में रूस ने इस पर अपना आधिपत्य जमा लिया ।
लाओस ः चीन के मुताबिक लाओस भी चूंकि युआन राजवंश (१२७१–१३६८) के समय उसका हिस्सा था, इसलिए इस देश की जमीन पर भी उसका दावा है ।
मलेशिया ः दक्षिणी चीन सागर में स्प्रैटली द्वीप समूह में कई द्वीप हैं । यहां के अलग अलग द्वीपों पर मलेशिया, वियतनाम, चीन, ताइवान और फिलीपींस का कब्जा है । मलेशिया के कब्जे वाले द्वीप को चीन अपना मानता है ।
मंगोलिया ः युआन राजवंश (१२७१–१३६८) साम्राज्य के आधार पर मंगोलिया की जमीन पर भी चीन दावा ठोकता रहा है ।
नेपाल ः १७८८–१७९२ के बीच चीन और नेपाल में युद्ध हुआ था । इस युद्ध में चीन ने नेपाल के कई इलाकों पर कब्जा जमाया था ।
उत्तर कोरिया ः चीन युआन राजवंश (१२७१–१३६८) साम्राज्य के आधार पर उत्तर कोरिया के बेकडू पर्वत और जियानदाओ पर दावा करता रहा है ।
पाकिस्तान ः पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के गिलगित बाल्टिस्तान और चीन के शिजियांग प्रांत की सीमा आपस में मिलती है । इस इलाके में चीन ने अपना दावा ठोका । भारत की सुरक्षा खतरे में डालने के लिए पाकिस्तान ने चीन को शक्सगाम घाटी में काराकोरम सड़क बनाने के लिए जमीन दे दी ।
फिलीपींस ः दक्षिणी चीन सागर में फिलीपींस के स्कारबरो शोल और स्प्रैटली द्पीप को चीन अपना मानता है ।
रूस ः चीन ने हाल ही मे दावा किया है कि रूस का व्लादिवोस्टक शहर १८२० में चीन का हिस्सा था । वह पहले भी रूस की हजारों वर्ग किलोमीटर जमीन अपना दावा ठोकता रहा है ।
सिंगापुर ः दक्षिणी चीन सागर के कुछ हिस्से को लेकर चीन का सिंगापुर से भी विवाद है ।
ताइवान ः वन चाइना थ्योरी के मुताबिक चीन, ताइवान को अपना हिस्सा मानता है । १९४९ में जब चीन में साम्यवादी शासन की स्थापना हुई थी तब चीन के तत्कालीन शासक चांग काई शेक ने ताइवान में अपनी निर्वासित सरकार बना ली थी । ताइवान खुद को आजाद देश मानता है और चीन दावे को खारिज करता रहा है ।
तजाकिस्तान ः चिंग राजवंश (१६४४–१९१२) के शासन के आधार पर चीन तजाकिस्तान पर भी अपना दावा करता रहा है ।
वियतनाम ः चीन के मुताबिक मिंग राजवंश (१३६८–१६४४) के समय वियतनाम चीन के अधीन था । इसके अलावा चीन वियतनाम के पारासेल द्वीप पर भी अपना अधिकार मानता है ।
दक्षिण कोरिया ः पूर्वी चीन सागर के कई द्वीपों पर दक्षिण कोरिया का अधिकार है । लेकिन चीन इसे अपना मानता है ।
इतना ही नहीं चीन ने अपनी कर्ज नीति के तहत कई देशों को विवश कर दिया है अपनी बात मनवाने के लिए । चीन ने श्रीलंका के हंबनटोटा बंदरगाह, एयरपोर्ट, कोल पावर प्लांट, सड़क निर्माण में ३६,४८० करोड़ रुपये का निवेश किया था । २०१६ में यह कर्ज ४५,६०० करोड़ रुपये हो गया । श्रीलंका यह कर्ज नहीं चुका सका । इस पर उसे हंबनटोटा बंदरगाह चीन को ९९ साल के लिए लीज पर देना पड़ा यानि श्रीलंका की कई पीढियाँ चीन की आर्थिक रूप से गुलाम हो गई है ।
पाकिस्तान की हालत भी कुछ ऐसी ही है । भारत से दुश्मनी निभाने के लिए चीन के करीब होता पाकिस्तान अपनी बदहाली को दस्तक दे चुका है । चीन ने पाकिस्तान के सीपीईसी प्रोजेक्ट में ४.५६ लाख करोड़ रुपये निवेश किए हैं । इसकी बड़ी रकम कर्ज के तौर पर है । इसकी ब्याज दर ७ फीसदी है । चीन पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट के पास नौसेना का बेस बनाना चाहता है । चीन पाकिस्तान को अपना सबसे अहम साझेदार मानता है ।
चीन की कई महत्वपूर्ण परियोजनाएं यहाँ चल रही हैं । लेकिन इनमें चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारा सबसे अहम और बड़ी निवेश परियोजना है । जिसमें ६२ अरब डालर से अधिक का निवेश होने का अनुमान है । सीपीईसी बलूचिस्तान के बीचोबीच है । लेकिन वहां के नागरिक इस परियोजना को सरकार और चीन की दमनकारी नीति मानते हैं । पाकिस्तान चीन के भारी कर्ज से भी दबा हुआ है । बढ़ते कर्ज से परेशान पाकिस्तान कर्ज के लिए हमेशा अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की ओर देखता रहता है ।
चीन ने बांग्लादेश से बीआरआई प्रोजेक्ट में समझौता किया था । चीन ने बांग्लादेश में २.८९ लाख करोड़ रुपये लगाए हैं और अब बंगला देश को भी चीन की मंशा का पता चल गया है ।
मालदीव ने २०१६ में १६ं द्वीपों को चीनी कंपनियों को लीज पर दिया था । अब चीन इन द्वीपों पर निर्माण कार्य कर रहा है । ताकि हिंद महासागर, अरब सागर और बंगाल की खाड़ी के आसपास होने वाले अंतरराष्ट्रीय व्यापार और भारत पर नजर रख सके । जाहिर तौर पर यह सारे काम चीन अपनी मजबूती और भारत पर लगातार दवाब बनाने के लिए कर रहा है जिसका एक हिस्सा नेपाल भी बन रहा है हालांकि सरकार हमेशा यह कहती रही है कि नेपाल अपनी धरती का प्रयोग भारत विरोधी कार्यों के लिए नहीं होने देगा पर अनदेखा सत्य यह है कि यह हो रहा है ।
एक ओर कर्ज दो और फिर ऐसे हालात पैदा करो कि सामने वाला स्वतः घुटनों पर आ जाय दूसरी ओर अपने सभी सीमा से आबद्ध देशों के साथ विवाद पैदा करो और अपना वर्चस्व जताओ यही चीन की नीति है जिसका उदाहरण सामने है । बावजूद इसके अगर कोई देश स्वयं आगे बढकर उसे अपना हाथ पकड़ने का अवसर देता है तो यकीनन वह पूरे शरीर पर कब्जा अवश्य करेगा जमीनी हकीकत यही बयान करती है ।
इन हालातों में अगर आज देउवा सरकार ने कोई पहल की है तो वह निश्चय ही सराहनीय है । किन्तु आम नेपाली जनता की आशंका अपनी जगह बरकरार है कि क्या सचमुच हमारी सरकार चीन पर दबाव बना पाएगी या यह घोषणा भी महज औपचारिकता में ही सिमट कर रह जाएगी । हम अपनी सरकार से यह तो अवश्य उम्मीद कर सकते हैं कि वह देश के विकास के नाम पर देश को गिरवी ना रखे और सीमा विवाद चाहे वह भारत के साथ हो या चीन के साथ अपना पक्ष मजबूती के साथ रखने के हालात पैदा करें । जनता उम्मीद करती है कि नेपाल अपनी मजबूत स्थिति के साथ चीन के समक्ष खड़ा होगा ।


