अंगुली जो थामी सरस्वती ने लक्ष्मी ने दिखाया अंगूठा
राजु अग्रवाल:शायद आप सपने में भी नहीं सोच सकते कि अग्रवाल कुल का जाया कोई आदमी नोटों की गड्डी गिनने के बजाय तबले पे थाप मारे। मगर ऐसी अनहोनी भी होती है, आखिर यह तो खुदा की कुदरत जो है। आईए, आज एक ऐसे ही कलाकार से मिलते है, जिन्होंने अपनी जिन्दगी में लक्ष्मी के बजाय सरस्वती को तरजीह दी। ये है, राजु अग्रवाल, वरिष्ठ संगीत निर्देशक -अधिकृत) रेडियो नेपाल के मुलाजिम, मशहूर तबलावादक। राजु अग्रवाल से हिमालिनी के कार्यकारी सम्पादक मुकुन्द आचार्य ने जो अंतरंग बातचीत की, वह कुछ ऐसी रहीः-

० राजुजी, सबसे पहले यह बताएं कि आपको संगीत के क्षेत्र में आने की प्रेरणा कहां से मिली – जब कि सामान्यतया कोई भी अग्रवाल गद्दी में बैठकर नोटों की गड्डी गिनने के सपने देखता है !
– ना जाने कैसे बचपन से ही संगीत की ओर मेरी रुझान रही ! अपने बचपन के कुछ साल मैंने वीरगंज में भी बिताए हैं। पंचायत काल में राजारानी के जन्मोत्सव मनाए जाते थे। उनमें संगीत के कार्यक्रम में बच्चे शरीक होते थे। मैं भी उधर चल पडÞा। तो यहाँ तक पहुँचा हूँ।
० परिवार में कोई संगीत से जुडा था –
– जी नहीं ! वैसे सामान्य भजन कर्ीतन तो चलता था।
० संगीत साधना में परिवार साधक वा बाधक कैसा रहा –
– मेरी बदकिस्मती से इस मामले में मुझे खानदानी मदद न मिल सकी। मां सरस्वती की कृपा से मैं बचपन से ही इस राह पर चल पडÞा। ‘सरस्वती मया दृष्टा वीणापुस्तकधारिणी।’ मां सरस्वती की कृपा न हो तो संगीत में गति नहीं मिलती। परिवार और समाज से मुझे कुलांगार के रूप में देखा गया। परिवार से अलग-थलग, अपने पैरों पर खडÞे होने के सिलसिले में मुझे काफी जद्दोजहद, मशक्कत करनी पडÞी। और एसएलसी के फार्म भरने के लिए भी मेरे पास पैसे न थे, इसी से आप अन्दाजा लगा सकते है कि उस समय मेरी माली हालत कैसी थी।
० आप कौन-कौन से बाद्य यंत्र बजाते है –
– तबले के अलावा मैं हारमोनियम, ढोलक, कीबोर्ड, बेञ्जु, पियानो, इलेक्टि्रकल भाइब्रोफोन आदि बजाता हूँ। साथ-साथ गायन और संगीत निर्देशन भी चलता है।
० आपकी औपचारिक शिक्षा-दीक्षा कैसी रही –
– प्रयाग संगीत समिति इलाहावाद से मैंने तबलावादन में स्नातक किया है। जिसे संगीत प्रभाकर कहते हैं। लेकिन वह पढर्Þाई यही काठमांडू में मंजुश्री संगीत विद्यालय में होती थी। परीक्षा लेनेवाले परीक्षक प्रयाग से आते थे। मैंने कमर्स में डिपलोमा भी किया है।
० लम्बे समय से आप संगीत साधना में हैं। पुरस्कार, प्रोत्साहन तो मिला होगा न –
– बिल्कुल मिला है। सुप्रबल गोरखा दक्षिण बाहु -चौथा), वीरेन्द्र-ऐर्श्वर्य पदक, गद्दी आरोहण पदक जैसे राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कारों के अलावा अनेकों संघ-संस्थाओं ने समय-समय पर मुझे पुरस्कृत की है। वैसे यह क्रम अभी भी जारी है।
० संगीत कार्यक्रमों में किन-किन के साथ आपने तबले में संगती की –
– इसकी तो लम्बी फेहरिस्त होगी। नेपाली कलाकारों में र्सवश्री नारायण गोपाल, भक्तराज आचार्य, तारा देवी, नातिकाजी, शिवशंकर, बच्चू कैलाश, अरुणा लामा, मीरा राणा, अरविन्द मालाकार, दिलमाया खाती, रामा मंडल, हरिशंकर चौधरी, मधु क्षेत्री, प्रकाश श्रेष्ठ- प्रायः सभी नामचीन कलाकारों का मैने तबले पर साथ दिया है। उसी तरह बाहर की बडÞी हस्तियां जैसे गुलाम अली, मेंहदी हसन, जमील युसुफ खान, पं. विश्वप्रकाश चोपडÞा, रुना लैला, पिनाज मसानी आदि के साथ भी मुझे संगति करने का संयोग मिला है।
० क्या इस पेशे से आप संतुष्ट हैं – समाज में स्वजातियों की संपन्नता आपको नहीं सालती –
– मुझे संतुष्टि है। मगर मेरे ही समाज ने, अर्थात मारवाडÞी समाज ने न जाने क्यूं, मेरी ओर नजर उठा कर भी न देखा। मारवाडÞी समाज सरस्वती को नहीं लक्ष्मी को चाहता है। मैं हुआ सरस्वती पुत्र, उनके लिए किसी काम का न रहा। फिर वे मेरे आगे घांस क्यों डालेंगे। हमारा समाज हमेशा शुभलाभ की ओर टकटकी लगाए देखता है। खैर, नजर अपनी अपनी ! बहुत सारे लक्ष्मी के कृपापात्र है, जो दिनरात नोटों से खेलते हैं और पचासों दवा खा कर जिन्दा रहते हैं। यह भी कोई जिन्दगी हर्ुइ – मेरा तो मानना है, अकील जाफरी का एक शेर अर्ज हैः
कर लीजिए उसका भी जहन्न में शुमार
जो उम्र हाय-हाय करते हुए गुजरी
मगर फिर भी मुझे तसल्ली है। किसी शायर ने क्या खूब कहा है-
चाहते तो किसी पत्थर की तरह जी लेते
हमने खुद किसी मोम की मानिंद पिघलना चाहा
० नेपाल में संगीत के क्षेत्र में कौन-कौन सी कमियां देखते है –
– यहाँ पे शिक्षा के क्षेत्र में संगीत को जो दर्जा मिलना चाहिए था, वह उसे नहीं मिल पाया है। संगीत को शिक्षा में अनिवार्य करना चाहिए। नेपाल में ही संगीत की उच्चतम पढर्Þाई होनी चाहिए। लोग यही से संगीत में पिएचडी तक कर सकें। सरकार ऐसी व्यवस्था करे तो कुछ हो सकता है।
० संगीत का भविष्य कैसा है –
– पहले से तो बुहत बेहतर है। लेकिन यह युग प्रतिस्पर्धा का है। संगीत की औपचारिक शिक्षा की ओर ध्यान देना चाहिए।
० संगीत के अंग कौन-कौन से माने गए हैं –
– नाद, तान, स्वर, राग, वाद्य और ताल संगीत के प्रमुख अंग माने गए हंै।
० काव्य और संगीत का सम्बन्ध कैसा मानते हैं –
– काव्य और संगीत का पारस्परिक सम्बन्ध अत्यन्त घनिष्ठ है। संगीत में स्वर और ताल से काम मिलया जाता है तो काव्य में शब्द और अर्थ से।
० संगीत में ँघराना’ की बात खुब आती है। कुछ घराने के नाम –
– गंगू वाई हंगल किराना घराने की थीं। मोगू वाई कर्ुर्डर्ीी आगरा व जयपुर घराना, रसूलन वाई घराना बनारस, असगरी बेगम घराना मेवाती, मल्लिकार्जुन मंसूर घराना जयपुर अतरौली। फैयाज खान घराना आगरा, जितेन्द्र अभिषेकी घराना जयपुर-आगरा, नारायण राव व्यास घराना ग्वालियर, बडे गुलाम अली खान घराना पटियाला, विष्णु नारायण भातखण्डे घराना आगरा, श्रीकृष्ण नारायण रातनजनकर घराना आगरा, गिरिजा देवी घराना सेनिया और बनारस और शन्नो खुराना घराना रामपुर-ग्वालियर इत्यादि। घराने से गायकी की विशेषता झलकती है।
० चलते-चलते एक सवाल और- आप अपनी जिन्दगी को कैसे बयां करेगें –
– शायर अकबर इलाहावादी के शब्दों में कहना चाहूंगा-
दुनिया में हूँ, दुनिया का तलबगार नहीं हूँ
बाजार से गुजरा हूँ खरीदार नहीं हूँ।

