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अवहेलना से बचने के लिए आत्मनिर्भर बनें

 

मेरा स्थायी निवास वीरेन्द्रनगर-१, चितवन है। मैं ३२ वषर्ीया ‘ग’ श्रेणी की जन्मजात अपाङ्ग हूँ। अर्थोपेडिक जूते के सहयोग से चल सकती हूँ। हाल अपाङ्गता पुनर्स्थापना केन्द्र में सिलाई प्रशिक्षक के रुप में कार्यरत हूँ। इसके अलावा अपने ही कमरे में सिलाई-कर्टाई का काम भी करती हूँ। इस काम से मासिक १५-२० हजार तक कमाई होती है। मेरे साथ में छोटी बहन मुना खरेल भी है। काठमांडू निवासका खर्च और बहन की पढर्Þाई खर्च दोनों मेरे कंधे पर हैं। अपाङ्ग लोगों को आत्मनिर्भर बनाना मेरा उद्देश्य रहा है। अपाङ्ग व्यक्तियों को इस प्रकार की तालीम देने में आत्मसन्तोष का अनुभव होता है।
पाँच साल हो गए जब तालीम प्राप्त करने का मैंने काम शुरु किया था। आत्मनिर्भर होने से पहले तक समाज मुझे अच्छी नजर से नहीं देखता था। लेकिन अभी तो मुझे सम्मानित नजर से देखा जाता है। सक्षम लोग भी मुझे इंगित कर कहते हैं- ऐसे लोगें से हमें सीख लेनी चाहिए। ऐसा सुनने पर आत्म गौरव महसूस होता है। इसलिए हरेक अपाङ्ग को आत्मनिर्भर होना चाहिए। इस काम में घर परिवार और समाज सभी का सहयोग अपेक्षित है। मगर क वर्ग के अपाङ्ग ऐसे होते है, जो कुछ नहीं कर सकते हंै। वैसांे को राज्य के द्वारा सम्पर्ूण्ा सहयोग मिलना चाहिए। लेकिन अन्य अपाङ्ग को उन लोगों की क्षमता के अनुसार आय आर्जन करने की तालीम मिलनी चाहिए। तब किसी भी अपाङ्ग को अपहेलित होकर जीना नहीं पडÞेगा।
पर्ूण्ा अपाङ्ग -क वर्ग) को छोडÞकर बांकी सभी काम कर सकते हंै। हो सकता है, किसी के पैर न हों, किसी का हाथ न हो, ऐसे में पैर नहीं होनेवाले हाथ से काम कर सकते हैं, हाथ नहीं होनेवाले पैरों से काम ले सकते हैं। हाथ-पैर दोनों जिनके नहीं है, वे मस्तिष्क के काम कर सकते हैं। प्रत्येक अपाङ्ग खुद ऐसी व्यवस्था नहीं मिला सकतें। इसलिए राज्य द्वारा ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए। साथ ही अपाङ्ग लोगों को भी अपने अधिकार के प्रति सचेत रहना होगा।

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