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थारू गांवों में दशया यानी दशहरा की परंपरा औरों से अलग,थारू गांवों में हुड़दुंगवा की तैयारी

 

नेपाल के सीमाई हिमालय की तलहटी में बसे थारू गांवों में दशया यानी दशहरा की परंपरा औरों से अलग व अनूठी है। यहां एक माह तक दशहरा का पर्व मनाया जाता है। थारू समाज के लोग घरों में जेवरा (मक्के के कोपलों का समूह) लगाते हैं। उसका पूजन करते हैं तथा महिलाओं के हुड़दुंगवा लोक नृत्य का आनंद लेते हैं। इस समय इस हुड़दुंगवा पर्व की तैयारियां जोरों पर हैं।

भारत-नेपाल सीमा से सटे नेपाल-भारत के सैकड़ों गांवों व तराई क्षेत्र में जंगलों के बीच थारू जनजाति का निवास है।  नेपाल में थारुओं की आबादी तकरीबन 6.6 फीसदी है। थारू जनजाति राणा, कठरिया, चौधरी तीन जनजातियों में बंटी है। नेपाल से सटे देवी पाटन मंडल क्षेत्र में बसे थारू जनजाति के लोग अवध की संस्कृति को अपनाते हुए राजस्थान के राजपूत राजा महाराणा प्रताप सिंह का वंशज मानते हैं।

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नवमी को होती है देवी-देवताओं की पूजा

थारू जनजाति की सभ्यता, संस्कृति, संस्कार, लोक कला अपने आप में लालित्यपूर्ण विधा है। थारू जनजाति में देवी-देवताओं की आराधना का विशेष महत्व है। ये अनेक देवी-देवताओं की पूजा करते हैं। घर में उनके परिवार के देवताओं की पूजा काफी विस्तृत तरीके से की जाती है। इन पूजाओं के साथ विशेष अनुष्ठान जुड़े हुए हैं। इनके देवताओं में मनुसदेव गन (कुलदेवता), बढ़म, महावीर, रसोगुरो, भोलाधामी तथा देवियों में कालिका, वनदेवी, हठीमाई, कुंअरवर्ती आदि प्रमुख हैं। कुछ थारू भोलाधामी को ही अपना कुलदेवता मानते हैं। दशहरा के समय भोलाधामी और रसोगुरो देवता की पूजा खस्सी, परेवा (कबूतर), धूप, फूल, लौंग, सिन्दूर आदि से की जाती है। जबकि नवमी को ही कालिका देवी की पूजा में बकरा, पाठी, परेवा, चुनरी, टिकुली, चोटी, सिन्दूर, काजल और दारु मुर्गा से होती है।

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एक महीने तक चलता है हुड़दुंगवा नृत्य

वनों के झुरमुटों तथा नेपाल की पहाड़ी वादियों के कोख में बसे थारू जनजाति की वेशभूषा व रहन-सहन की अलग पहचान होती है। इनकी सांस्कृतिक धरोहर विवाह उत्सव व तीज-त्योहारों पर गीत व नृत्यों के रूप में झलकती है। थारू समाज में त्योहारों, पर्वों और देवी देवताओं की पूजा, मेलों तथा धार्मिक उत्सवों पर नृत्य का विशेष आयोजन होता है। इसी प्रकार दशहरा त्योहार पर थारू पुरुष और महिलाएं नए कपड़े पहनती हैं। महिलाएं सोने का मंगलसूत्र, झुमकी, बूंदी, नथ और अंगूठी तथा चांदी का हंसली, हवेल, कड़ा, छड़ा, बिजायठ, कनफूल, अगेला, पछेला और करधनी जैसे आभूषण भी पहनती हैं।

थारू महिलाएं लहंगा-चोली पहन कर हुड़दुंगवा नृत्य करती हैं

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थारू महिलाएं लहंगा-चोली पहन कर हुड़दुंगवा नृत्य करती हैं। हुड़दुंगवा नृत्य में पुरुष भी महिलाओं का साथ देते हैं। हुड़दुंगवा नृत्य में गाए जाने वाले गीत के बोल होते हैं-हां, हां रे आई तो गइलो दश्या देवारी, देवारी हुंकरत गवा रे दुहानी रे नाई। इसके अलावा पुत्र की प्राप्ति, शादी समारोह, भाई-बहन के त्योहार, दीपावली के दिन कर्मा नृत्य, नई फसल आने की खुशी में भी नृत्य का आयोजन किया जाता है। थारू लोक नृत्य में मांदर (ढोलक) और झांझ-मंजीरा, घुंघरू प्रमुख वाद्ययंत्रों का प्रयोग किया जाता है। नेपाल के सोनपुर गांव की सुनीता थारू बताती हैं कि दशहरा पर्व का यह नृत्योत्सव विजय दशमी के बाद भी कई दिनों तक चलता रहता है।

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